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Herd Immunity: क्या कोरोना को 'हर्ड इम्यूनिटी' से रोका जा सकता है, भारत में कितनी संभावना?

Thu, 23 Apr 2020 06:09 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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Coronaindia - फोटो : PTI
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि "जब तक कोरोना वायरस का कोई टीका विकसित नहीं हो जाता, तब तक सोशल डिस्टेंसिंग ही इससे बचने का सबसे कारगर तरीका है।" लेकिन वैज्ञानिकों का एक तबका लगातार ‘हर्ड इम्यूनिटी’ के जरिए इस वायरस को कंट्रोल करने की बात कर रहा है। कोरोना वायरस संक्रमण से प्रभावित ज्यादातर देशों ने सोशल डिस्टेंसिंग को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए लॉकडाउन का रास्ता चुना है लेकिन मुख्यधारा के इस चुनाव को कुछ वैज्ञानिक ये कहते हुए चुनौती दे रहे हैं कि "आखिर कब तक वायरस से छिपकर बैठा जा सकता है?"

लॉकडाउन की वजह से ठप हुए उद्योग-धंधों और सुस्त होती अर्थव्यवस्थाओं को देखते हुए इन वैज्ञानिकों की दलील है कि "इससे पहले भुखमरी ज्यादा बड़ी समस्या बने, हमें कोरोना वायरस के खिलाफ 'सर्जिकल स्ट्राइक' करके हर्ड इम्यूनिटी विकसित करने के बारे में सोचना चाहिए।" लेकिन इस विचार के आलोचकों की संख्या फिलहाल ज्यादा है जिनका मानना है कि इससे बहुत सारे लोगों की जान को खतरा हो सकता है। आपको बताएंगे कि इस विषय पर कौन क्या सोच रहा है, लेकिन पहले समझें कि ‘हर्ड इम्यूनिटी’ आखिर है क्या।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
‘हर्ड इम्यूनिटी’
इस वैज्ञानिक आइडिया के अनुसार अगर कोई बीमारी किसी समूह के बड़े हिस्से में फैल जाती है तो इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस बीमारी से लड़ने में संक्रमित लोगों की मदद करती है। जो लोग बीमारी से लड़कर पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, वो उस बीमारी से ‘इम्यून’ हो जाते हैं, यानी उनमें प्रतिरक्षात्मक गुण विकसित हो जाते हैं।

इम्यूनिटी का मतलब यह है कि व्यक्ति को संक्रमण हुआ और उसके बाद उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ने वायरस का मुकाबला करने में सक्षम एंटी-बॉडीज तैयार कर लिया। जैसे-जैसे ज्यादा लोग इम्यून होते जाते हैं, वैसे-वैसे संक्रमण फैलने का खतरा कम होता जाता है। इससे उन लोगों को भी परोक्ष रूप से सुरक्षा मिल जाती है जो ना तो संक्रमित हुए और ना ही उस बीमारी के लिए ‘इम्यून’ हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
अमरीकी हार्ट एसोसिएशन के चीफ मेडिकल अफसर डॉक्टर एडुआर्डो सांचेज ने अपने ब्लॉग में इसे समझाने की कोशिश की है। वे लिखते हैं, “इंसानों के किसी झुंड (अंग्रेजी में हर्ड) के ज्यादातर लोग अगर वायरस से इम्यून हो जाएं तो झुंड के बीच मौजूद अन्य लोगों तक वायरस का पहुँचना बहुत मुश्किल होता है और एक सीमा के बाद इसका फैलाव रुक जाता है।

मगर इस प्रक्रिया में समय लगता है। साथ ही ‘हर्ड इम्यूनिटी’ के आइडिया पर बात अमूमन तब होती है जब किसी टीकाकरण प्रोग्राम की मदद से अतिसंवेदनशील लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर ली जाती है।” एक अनुमान के अनुसार किसी समुदाय में कोविड-19 के खिलाफ ‘हर्ड इम्यूनिटी’ तभी विकसित हो सकती है, जब तकरीबन 60 फीसद आबादी को कोरोना वायरस संक्रमित कर चुका हो और वे उससे लड़कर इम्युन हो गए हों।

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क्या ये भारत में संभव है?
वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर डिजीज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी के डायरेक्टर और अमरीका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के सीनियर रिसर्च स्कॉलर डॉक्टर रामानन लक्ष्मीनारायण ने भारतीय संदर्भ में इसे समझाने की कोशिश की है। उनका मानना है कि "भारत लॉकडाउन को बढ़ाते रहने और कोरोना वायरस के टीके का इंतजार करने की बजाय कोविड-19 को कंट्रोल करने की तरफ बढ़ सकता है जो कि हर्ड इम्यूनिटी नाम की वैज्ञानिक अवधारणा के जरिए संभव है।"

डॉक्टर रामानन लक्ष्मीनारायण ने बीबीसी को बताया, “अगर भारत की 65 प्रतिशत आबादी कोरोना वायरस से संक्रमित होकर ठीक हो जाए, भले ही संक्रमण के दौरान उनमें हल्के या ना के बराबर लक्षण हों, तो बाकी की 35 प्रतिशत आबादी को भी कोविड-19 से सुरक्षा मिल जाएगी।” लेकिन देश की बुजुर्ग और पहले से डायबिटीज या दिल की बीमारी झेल रही आबादी को खतरे में डाले बिना क्या ये संभव है?
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इसके जवाब में डॉक्टर रामानन कहते हैं, “भारत की जनसांख्यिकी इस स्थिति में सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकती है। भारत में 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है और केवल 6 प्रतिशत लोगों की आयु 65 वर्ष से अधिक है जबकि इटली में 22 प्रतिशत और चीन में 10 प्रतिशत लोग ज्यादा जोखिम वाले आयु वर्ग के हैं, यानी 65 वर्ष से अधिक उम्र के हैं।”

“वहीं युवाओं में संक्रमण के ज्यादातर मामलों में या तो मरीज में मामूली लक्षण देखने को मिल रहे हैं या फिर उनमें कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहे। अगर इस तबके को सीमित तरीके से कोरोना वायरस से एक्सपोज किया जाए तो भारत के अस्पतालों को शायद मरीजों का उतना बोझ ना झेलना पड़े।”
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‘युवाओं के दम पर बुजुर्गों को बचा सकता है भारत’
डॉक्टर रामानन लक्ष्मीनारायण इस संबंध में कुछ सुझाव भी देते हैं। वे कहते हैं, “ऐसा करने के लिए भारत को अपनी टेस्टिंग की क्षमता को बढ़ाना होगा, ताकि जिन तबकों में हम कोविड-19 को सीमित रखना चाहते हैं, वहाँ तेजी से संक्रमण का पता लगाया जा सके और जिनको स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत हो, उन्हें जल्द से जल्द ये सेवाएं दी जा सकें। साथ ही सोशल डिस्टेन्सिंग और साफ-सफाई का ध्यान तो रखना ही होगा।”

डॉक्टर रामानन एंटी-बॉडीज टेस्टिंग को भी जरूरी मानते हैं ताकि उन लोगों का पता लगाया जा सके जिनमें कोविड-19 से लड़ने वाली एंटीबॉडी विकसित हो चुकी हैं। वे कहते हैं, “मुझे लगता है कि लॉकडाउन ने भारत में कोविड-19 के पीक को एक महीने के लिए टाल दिया है। हमें इस समय का उपयोग यह समझने के लिए करना चाहिए कि हम अपने उद्देश्य तक कैसे पहुँचेंगे।“

“हमें स्वास्थ्य सेवाओं को तेजी से मजबूत करना होगा और साथ ही ये भी समझना होगा कि हम कोविड-19 के डर के साये में पूरा जीवन नहीं बिता सकते। इसलिए अगर लॉकडाउन खुल भी जाता है तो हमें सोशल डिस्टेन्सिंग, मास्क वगैरह का खास ध्यान रखना होगा। हर्ड इम्यूनिटी की बात करें तो अपने युवाओं के बल पर भारत अपने बुजुर्गों को बचा सकता है, पर इम्यूनिटी को हासिल करने में जोखिम क्या-क्या होंगे, ये समय ही बता सकता है।”
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‘हर्ड इम्यूनिटी की कोई गारंटी नहीं’
मगर विश्व स्वास्थ्य संगठन के टॉप इमरजेंसी एक्सपर्ट माइक रयान का बयान कोरोना वायरस के संबंध में ‘हर्ड इम्यूनिटी’ की थ्योरी पर सवाल खड़े करता है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रेस वार्ता में माइक ने कहा कि ‘अभी पूरे यकीन के साथ ये नहीं कहा जा सकता कि जो लोग नए कोरोना वायरस से संक्रमित हुए और ठीक होने के बाद उनके शरीर में जो एंटीबॉडी बनी हैं, वो उन्हें दोबारा इस वायरस के संक्रमण से बचा पाएंगी भी या नहीं।’

माइक ने कहा, “अब तक मिली सूचनाओं के अनुसार कोविड-19 से पूरी तरह ठीक हुए लोगों में से बहुत कम में ही एंटीबॉडी बन पाई हैं। अगर इन्हें प्रभावी मान भी लें तो इसके संकेत फिलहाल बहुत कम हैं कि किसी समुदाय के अधिकांश लोगों में बीमारी के बाद एंटीबॉडी विकसित होने से, बाकी बचे लोगों को हर्ड इम्यूनिटी का फायदा होगा।”

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अमेरिकी न्यूज वेबसाइट ‘बिजनेस इनसाइडर’ के अनुसार हाल ही में ऑनलाइन यह अफवाह शेयर की गई कि कैलेफॉर्निया और वॉशिंगटन ने कोरोना वायरस के खिलाफ हर्ड इम्यूनिटी हासिल कर ली है, इन शहरों के अधिकांश लोगों में एंटीबॉडी विकसित हो गई हैं, इसलिए वायरस अब और नहीं फैलेगा।

जबकि वेबसाइट ने अपनी इस रिपोर्ट में जानकारों के हवाले से लिखा है कि अमरीका कोरोना वायरस से ‘हर्ड इम्यूनिटी’ हासिल करने के करीब भी नहीं है क्योंकि अब तक सिर्फ 2-3 प्रतिशत अमरीकी ही कोविड-19 से रिकवर (पूरी तरह ठीक) हुए हैं, और वायरस से इम्यूनिटी पाने के लिए कम से कम देश की 50 प्रतिशत आबादी को कोविड-19 से इम्यून होना पड़ेगा।
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बोरिस जॉनसन - फोटो : social media
ब्रिटेन में भी थी ‘हर्ड इम्यूनिटी’ की चर्चा
13 मार्च 2020 को, जब ब्रिटेन में कोरोना वायरस के मामलों ने एक तेज उछाल लिया तो यूके सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार सर पैट्रिक वेलांस ने बीबीसी रेडियो-4 से बातचीत में कहा था कि ‘इस वायरस के प्रकोप को सीमित करने के लिए देश को कुछ हद तक हर्ड इम्यूनिटी विकसित करनी होगी।’ इसके बाद एक टीवी न्यूज चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि ‘देश में हर्ड इम्यूनिटी विकसित हो, इसके लिए जरूरी है कि संक्रमण कम से कम 60 प्रतिशत आबादी में फैले।’ 

लेकिन उनका ये बयान तुरंत ही विवादों में घिर गया और यूके के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले कम से कम 300 वैज्ञानिकों ने 14 मार्च 2020 को यूके सरकार को पत्र लिखकर कहा कि “ब्रिटेन कोरोना वायरस महामारी के शुरुआती दौर में है, ऐसे में हमें सख्त प्रतिबंधों के बारे में सोचना चाहिए, ना कि ‘हर्ड इम्यूनिटी’ जैसे विकल्प के बारे में जिससे बहुत सारे लोगों की जान को अनावश्यक खतरा हो सकता है।”

अंत में ब्रिटेन की सरकार को लॉकडाउन का ही विकल्प चुनना पड़ा। लॉकडाउन की घोषणा यूके के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने 23 मार्च को की थी जिसे ब्रिटेन की सरकार ने 16 अप्रैल के बाद तीन सप्ताह के लिए बढ़ाया भी है।

 
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