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कोरोना वायरस से पीड़ित 30 फीसदी लोग डिप्रेशन के शिकार, स्वास्थ्य मंत्रालय ने जारी किए दिशानिर्देश

Fri, 06 Nov 2020 08:25 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय का कहना है कि कोरोना महामारी के दौरान इस बीमारी से पीड़ित 30 फीसदी लोग अवसाद या डिप्रेशन का शिकार हुए हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना महामारी की वजह से तनाव के बढ़ते मामलों को देखते हुए दिशानिर्देश जारी किए हैं। दिशानिर्देश, कई शोध रिपोर्ट के आधार पर तैयार किए गए हैं। कोरोना वायरस महामारी ने दुनिया भर में लोगों की मानसिक स्थिति पर गहरा असर डाला है। इस बीमारी ने स्वास्थ्य सेवाओं पर जबरदस्त दबाव तो डाला ही है साथ ही मेंटल हेल्थ केयर व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां पेश की हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
स्वास्थ्य मंत्रालय और मेंटल हेल्थ इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस की गाइडलाइन्स में कोविड महामारी में मानसिक रूप से प्रभावित होने वाले लोगों के तीन समूहों का जिक्र किया गया है। पहले समूह में वो लोग है जों कोरोना-19 से पीड़ित हुए हैं। इसके मुताबिक जो मरीज कोविड-19 से संक्रमित हुए थे उन्हें मानसिक दिक्कतें आ सकती हैं। कोविड से पीड़ित होने वालों में 30 फीसद लोगों में अवसाद या डिप्रेशन और 96 फीसदी में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसी समस्या देखी जा रही है, और ये समस्या बढ़ भी सकती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
  • दूसरे समूह में वो मरीज हैं जो पहले से ही मानसिक रोग से पीड़ित हैं या थे। इनमें कोविड की वजह से वे पुरानी स्थिति में लौट सकते हैं। इतना ही नहीं इस समूह के मरीजों की स्थिति और खराब होने के साथ-साथ वे नई मानसिक समस्या से भी ग्रसित हो सकते हैं।
  • तीसरा समूह आम लोगों का है। आम लोग अलग-अलग तरह की मानसिक समस्या जैसे तनाव, चिंता, नींद की कमी, हैल्यूस्लेशन या अजीब ख्याल आना जिनका सच्चाई से कोई वास्ता न हो जैसी समस्याएं झेल रहे हैं। इस समूह के लोगों में आत्महत्या तक के ख्याल भी आ रहे हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली (एम्स) में मनोचिकित्सक श्रीनिवास राजकुमार कहते हैं कि ये शोध काफी चिंताजनक है क्योंकि आम मानसिक बीमारियों के मुकाबले ये आंकड़ा कहीं ज्यादा हैं। लेकिन शोध के लिए आंकड़े कहां से लिए गए हैं, वो स्पष्ट नहीं है। वे कहते हैं कि एम्स कोविड ट्रामा सेंटर में काफी बंदोबस्त किए गए हैं, जहां मनोचिकित्सक लगातार मरीजों से बातचीत कर रहे हैं और जैसी शोध में बातें आई हैं वैसी ही समस्याएं अस्पताल में भर्ती मरीज के साथ भी हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
उनके अनुसार, "कोविड के मरीजों में असुरक्षा की भावना रहती है कि वे अपने परिवार के पास लौट पाएंगे या नहीं। नींद नहीं आने की शिकायत भी आम है। वहीं ये भी देखा गया है जो मरीज ठीक होकर जा चुके हैं वे डिप्रेशन, एंग्जाइटी और पैनिक एटैक की समस्याओं के साथ हमारे पास वापस आ रहे है। वे कहते हैं कि नींद में उन्हें लगता है कि वे आईसीयू में हैं और बीप की आवाजे सुन रहे हैं या लोगों से घिरे हुए हैं। ऐसी समस्या लेकर आने वालों की उम्र 20- 40 के बीच है। ऐसे में जहां जरूरत हैं, वहां दवाइयां दे रहे है और इनका इलाज कर रहे हैं।"
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दिल्ली की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. पूजाशिवम जेटली का कहना है कि कोविड के दौरान लोगों का मानसिक स्वास्थ्य एक चिंता का विषय है और उनके पास करीब 50-60 फीसदी ऐसे मामले आ रहे हैं जहां लोग अकेलापन, एंगजाइटी, मूड में उतार-चढ़ाव और एकाग्रता की कमी महसूस कर रहे हैं। वे कहती हैं कि कोविड की वजह से अनिश्चितता का माहौल है। रोज नए आंकडे आते हैं, नए मामले सामने आ रहे है और अभी तक इसका कोई पुख्ता इलाज सामने नहीं आया है, तो लोगों के मन में दहशत बैठी हुई है।
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Mental Health - फोटो : Pexels
उनके अनुसार, "लोगों की रोज की जिंदगी में बदलाव आया है, उसका असर भी मानसिक सेहत पर पड़ा है। लोगों की नौकरियां चली गईं हैं, अस्थिरता का माहौल है, वर्क फ्रॉम होम की वजह से घर में अलग तरह की डिमांड बढ़ गई है जिसमें बच्चों, बुजुर्गों की देखरेख करने के साथ-साथ घर संभालना शामिल है। लोग आपस में मिल नहीं पा रहे हैं, बाहर जाकर रिलेक्स करने या मनोरंजन के जरिए बंद हो गए हैं, हालांकि अब अनलॉक हुआ है चीजें खुली हैं लेकिन फिर भी लोगों में डर है और ऐसे में मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर के लिए एक माहौल बन रहा है।"

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कोरोना काल में मानसिक स्वास्थ्य (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : social media
हालांकि सरकार ने मानसिक स्थिति से निपटने के लिए कई दिशानिर्देश जारी किए जिनमें कहा गया है कि कोरोना के मरीजों के इलाज करने वाले अस्पतालों में एक मनोचिकित्सक शारीरिक रूप से या टेलीफोन के जरिए कंसल्टेंसी के लिए मौजूद रहेगा। एनजीओ जो मेडिकल के क्षेत्र में काम कर रहे हैं, उनसे मदद ली जाएगी। कोविड का कोई मरीज अगर मानसिक रोगी है तो उसे भर्ती होने के 24 घंटे के भीतर मनोचित्सिक देखेगा।

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अवसाद (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : पिक्साबे
डॉ. श्रीनिवास राजकुमार कहते हैं कि सरकार ने दिशानिर्देश तो जारी किए हैं लेकिन जैसे पूरी दुनिया में अब केवल मनोचिकित्सकों पर निर्भरता को छोड़ कर दूसरे डॉक्टरों को भी मेंटल हेल्थ केयर के मामलों से निपटने के प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं, वैसे ही प्रशिक्षण अब भारत में डॉक्टरों को दिए जाने की जरूरत हैं। वे कहते हैं कि भारत में मेंटल हेल्थ से जुड़े कानून है लेकिन अब इस क्षेत्र में निवेश करने की जरूरत है क्योंकि मनोरोगियों से निपटने के लिए मनोचिकित्सकों की संख्या पर्याप्त नहीं है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
डॉ. पूजाशिवम जेटली कहती है कि जिस तरह से कोविड के दौरान लोगों में डिप्रेशन या एंगजाइटी के मामले आ रहे हैं, इससे भविष्य में भयावह स्थिति बन सकती है। कदम नहीं उठाए गए तो ऐसे मामले बढ़ेंगे ही क्योंकि लोग इसे एक समस्या के तौर पर समझ नहीं पा रहे हैं और मदद भी नहीं ले रहे हैं।

वे मानती है कि सरकार के साथ-साथ सोसायटी एक बड़ी भूमिका निभा सकती है। यहां समुदाय के लोग अपनी दिक्कतें साझा कर सकते हैं क्योंकि ये सिर्फ किसी व्यक्ति या परिवार की समस्या नहीं है बल्कि कई लोग ऐसी ही समस्याओं से जुझ रहे हैं। एक दूसरे से समाधान पर चर्चा करना मददगार साबित हो सकता है।
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