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Autism Risk: गर्भावस्था में इस चीज पर दे लिया ध्यान तो 60% तक कम हो सकता है बच्चों में ऑटिज्म का खतरा

Tue, 30 Sep 2025 05:48 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • गर्भावस्था के दौरान की गड़बड़ आदतें जैसे धूम्रपान-शराब के सेवन, असंतुलित आहार, मानसिक तनाव या संक्रमण  बच्चे के मस्तिष्क विकास को प्रभावित कर सकती हैं। 
  • हालिया अध्ययन में बताया गया है कि गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबिटीज की स्थिति बच्चों में ऑटिज्म का खतरा बढ़ सकती है।
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गर्भावस्था में बरतें सावधानियां - फोटो : Freepik.com
Gestational Diabetes Risk: वैश्विक स्तर पर बच्चों में कई प्रकार की बीमारियों का जोखिम तेजी से बढ़ता हुआ देखा जा रहा है। कुछ समस्याएं जन्म के शुरुआती महीनों में विकसित होती हैं जबकि कुछ का खतरा जन्मजात हो सकता है। ऑटिज्म ऐसी ही तेजी से बढ़ती समस्या है। सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) की रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 36 में से 1 बच्चे को ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार (एएसडी) का निदान किया गया है। 

ऑटिज्म एक ऐसी न्यूरो-डेवलपमेंटल समस्या है, जो बच्चे के सोचने-समझने, बोलने और दूसरों से जुड़ने की क्षमता को प्रभावित करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, हर साल दुनियाभर में करीब 1 करोड़ बच्चे ऑटिज्म के साथ पैदा होते हैं। ये समस्या बच्चों के जीवन की गुणवत्ता को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती है। 

ऑटिज्म होने के लिए कई कारणों को जिम्मेदार माना जाता रहा है जिनमें समय से पहले जन्म, जन्म के समय वजन बहुत कम होना और माता-पिता की उम्र अधिक होना शामिल है। इसी से संबंधित एक हालिया रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने बताया है कि गर्भावस्था के दौरान बरती गई कुछ लापरवाहियों के कारण भी बच्चों में ऑटिज्म होने का जोखिम हो सकता है।
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गर्भावस्था में डायबिटीज का खतरा - फोटो : Freepik.com
गर्भावधि में डायबिटीज के कारण बच्चों में ऑटिज्म का खतरा

पहले के भी कई अध्ययनों में बताया जाता रहा है कि गर्भावस्था के दौरान की गड़बड़ आदतें जैसे धूम्रपान-शराब के सेवन, असंतुलित आहार, मानसिक तनाव या संक्रमण बच्चे के मस्तिष्क विकास को प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा जेनेटिक फैक्टर, प्रदूषण और जन्म के समय जटिलताएं भी इसके बड़े कारण माने जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबिटीज की स्थिति जैसे गर्भावधि मधुमेह कहा जाता है, इसके कारण बच्चों में ऑटिज्म का खतरा बढ़ सकता है। मोटापे तथा अधिक उम्र की माताओं में गर्भकालीन डायबिटीज की समस्या अधिक देखी जाती रही है, इससे बच्चों में ऑटिज्म का खतरा बढ़ सकता है।
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बच्चों में ऑटिज्म का खतरा (सांकेतिक) - फोटो : Freepik.com
अध्ययन में क्या पता चला?

इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने 48 अध्ययनों की समीक्षा की जिसमें 90 लाख से अधिक गर्भवतियों को शामिल किया गया था। निष्कर्ष में पाया गया कि जिन महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज की दिकक्त थी उनके बच्चे में ऑटिज्म होने का जोखिम लगभग 60 प्रतिशत अधिक था। शोधकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि इस स्थिति का कोई एक कारण नहीं है, यह आनुवंशिकी और पर्यावरणीय प्रभावों से उत्पन्न होती है।

विशेषज्ञों ने कहा, हमें ऑटिज्म को बढ़ावा देने वाले जीवनशैली से जुड़े कारक के बारे में पता चला है, जिसपर अगर समय रहते ध्यान दे लिया जाए तो संभवत: बच्चों को ऑटिज्म से बचाया जा सकता है।

गौरतलब है कि ऑटिज्म के लक्षण 3 साल की उम्र से पहले नजर आने लगते हैं जिसमें बच्चों के आंख से संपर्क न करना, बार-बार एक ही क्रिया दोहराना, भाषा विकास में देरी या दूसरों के साथ खेलना पसंद न करना। विशेषज्ञ कहते हैं कि ऑटिज्म का खतरा बढ़ रहा है, लेकिन अगर गर्भावस्था में सही पोषण, स्वस्थ जीवनशैली और तनावमुक्त वातावरण मिले तो इस रिस्क को काफी हद तक कम किया जा सकता है। गर्भावस्था में डायबिटीज की स्थिति पर भी ध्यान रखने की आवश्यकता है।

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बच्चों में एडीएचडी की समस्या - फोटो : Freepik.com
गर्भावधि मधुमेह से बच्चों में एडीएचडी का भी खतरा

यूरोपियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज में प्रस्तुत अध्ययन में यह भी पाया गया कि गर्भावधि मधुमेह से पीड़ित माताओं के बच्चों में अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) होने का जोखिम भी 36 प्रतिशत अधिक हो सकती है।

गर्भ के दौरान डायबिटीज की स्थिति शिशु में भ्रूण मैक्रोसोमिया या 'जाइंट बेबी सिंड्रोम' विकसित होने की संभावना भी बढ़ा देती है, जिसमें शिशु औसत आकार से कहीं बड़े आकार के पैदा होते हैं।
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गर्भावस्था में रखें सेहत का विशेष ध्यान - फोटो : Freepik.com
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में ऑब्सटेट्रिक्स साइंस के प्रोफ़ेसर डॉ. दिमित्रियोस सियासाकोस कहते हैं गर्भकालीन मधुमेह माताओं और शिशुओं को बहुत से रोके जा सकने वाले नुकसान पहुंचा रहा है। चिंताजनक बात ये भी है कि बहुत सी महिलाओं में इसका निदान ही नहीं हो पा रहा है। 

गर्भकालीन मधुमेह गर्भावस्था के किसी भी चरण में हो सकता है। हालांकि, यह दूसरी और तीसरी तिमाही में ज्यादा आम है। अगर समय रहते इसपर ध्यान दे लिया जाए तो शिशुओं को कई प्रकार की गंभीर समस्याओं से सुरक्षित रखा जा सकता है। गर्भावस्था के दौरान लाइफस्टाइल को ठीक रखना और शराब-धूम्रपान से दूरी बनाना भी बहुत आवश्यक है।



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स्रोत
Gestational diabetes linked to autism in study: what scientists say


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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