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Screen Time: रोज एक घंटे से ज्यादा देखते हैं मोबाइल तो हो जाइए सावधान, रिपोर्ट में सामने आई डराने वाली जानकारी

Thu, 27 Feb 2025 07:33 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सभी उम्र के लोगों में रील देखने की लत तेजी से बढ़ती जा रही है, इसे आदत के चलते स्क्रीन टाइम में भी बढ़ोतरी हुई है। स्क्रीन टाइम को ब्रेन हेल्थ और अन्य शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए भी जिम्मेदार माना जाता रहा है। इस आदत के कारण निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) के मामले भी काफी तेजी से बढ़ गए हैं।
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ज्यादा मोबाइल चलाते हैं तो हो जाइए सावधान - फोटो : AI Generated
बढ़ता स्क्रीन टाइम मौजूदा समय में हमारी सेहत के लिए सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बना हुआ है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को इसका शिकार पाया जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, मोबाइल फोन पर रील्स स्क्रॉल करते रहने, वीडियो देखने या गेम खेलते रहने की आदत के कारण लोग अक्सर बैठे या लेटे रहते हैं। इस तरह से बढ़ती शारीरिक निष्क्रियता के कारण मोटापा, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और हृदय रोगों का जोखिम कम उम्र भी देखा जाने लगा है।

स्क्रीन टाइम को ब्रेन हेल्थ और अन्य शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए भी जिम्मेदार माना जाता रहा है। यही कारण है स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को मोबाइल या किसी भी अन्य डिजिटल स्क्रीन से दूरी बनाए रखने की सलाह देते रहे हैं। 

डॉक्टर्स कहते हैं, सभी उम्र के लोगों में रील देखने की लत तेजी से बढ़ती जा रही है, इस आदत के चलते स्क्रीन टाइम में भी बढ़ोतरी हुई है जिसका आपकी आंखों पर गंभीर असर हो सकता है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) के मामले काफी तेजी से बढ़ते हुए देखे गए हैं। 
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आंखों की बढ़ती समस्याएं - फोटो : Freepik.com
निकट दृष्टि दोष क्या है?

मायोपिया जिसे निकट दृष्टिदोष भी कहा जाता है इसमें आपको पास की चीजें तो साफ दिखाई देती हैं लेकिन दूर की चीजें देखने में कठिनाई होती है। अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 30 वर्षों में बच्चों और किशोरों में मायोपिया के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। साल 1990 में इसके कुल मामले 24 फीसदी थे जो 2023 में बढ़कर 36 फीसदी हो गए हैं।

नेत्र रोग विशेषज्ञों के मुताबिक स्क्रीन टाइम ने बच्चों और युवाओं में मायोपिया के जोखिम को पहले की तुलना में काफी बढ़ा दिया है। 
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मायोपिया और आंखों से संबंधित समस्याएं - फोटो : Freepik.com
अध्ययन में क्या पता चला?

हाल ही में जामा नेटवर्क ओपन जर्नल में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि जो लोग रोजाना एक घंटे से ज्यादा समय तक स्क्रीन देखते हैं, उनमें समय के साथ इस रोग के बढ़ने का खतरा 21 फीसदी बढ़ सकता है।

इसके लिए शोधकर्ताओं ने 45 अलग- अलग अध्ययनों का विश्लेषण किया। इसमें बच्चों से लेकर वयस्कों तक 3 लाख 35 हजार से अधिक प्रतिभागी शामिल थे। एक से चार घंटे तक स्क्रीन के संपर्क में रहने से मायोपिया होने का जोखिम कई गुना तक बढ़ सकता है।

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बच्चों में बढ़ती आंखों की समस्या - फोटो : Freepik.com
हर तीन में से एक बच्चा मायोपिया का शिकार

इससे पहले ब्रिटिश जर्नल ऑफ ऑप्थाल्मोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया कि दुनियाभर हर तीन में से एक बच्चे में मायोपिया का निदान किया जा रहा है। अगर इस बीमारी के बढ़ने की दर ऐसे ही जारी रहती है और रोकथाम के उपाय न किए गए तो अगले 25 साल में ये समस्या दुनियाभर में लाखों बच्चों को प्रभावित कर सकता है। साल 2050 तक 40 फीसदी बच्चे आंखों की इस समस्या के शिकार हो सकते हैं।

कोरोना महामारी की नकारात्मक परिस्थितियों जैसे लोगों का ज्यादा से ज्यादा समय घरों में बीतना, बाहर खेलकूद में कमी और ऑनलाइन क्लासेज के कारण आंखों से संबधित इस रोग के मामले और भी बढ़ गए हैं। 
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मोबाइल फोन पर बढ़ते दुष्प्रभाव - फोटो : Adobe Stock
स्क्रीन टाइम बढ़ने के और भी कई नुकसान

नेत्र रोग विशेषज्ञ कहते हैं, स्क्रीन टाइम बढ़ने के और भी कई गंभीर असर हो सकता है। 
  • लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहने के कारण आंखों में जलन, खुजली, धुंधला दिखने और आंखों में दर्द जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। 
  • लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो जाती है।
  • सोशल मीडिया और वीडियो गेम्स आदि पर अधिक समय बिताने के कारण भावनात्मक अस्थिरता जैसे अधिक चिड़चिड़ापन, गुस्सा आने जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं। 
  • स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन नामक हार्मोन के उत्पादन को बाधित करती है, जो नींद के चक्र को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक होता है।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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