डॉ. श्रीगोपाल काबरा के मुताबिक, जिस प्रकार जैन मुनि जीवन की सार्थकता और उपादेयता के चुकने का भान होने पर संथारा कर देह त्यागते हैं, उसी प्रकार प्राणी शरीर में 'संत' कोशिकाएं भी संथारा करती हैं। वे इसलिए संथारा करती हैं, ताकि अन्य अपना सार्थक जीवन जी सकें।
भ्रूण के सृजन काल में जब अंगों का विकास हो रहा होता है, तब चयनित कोशिकाओं का अंग में समायोजन और शेष का संथारा कर विलुप्त होना एक सतत प्रक्रिया है। अंगों में समायोजित न हुई कोशिकाएं अपनी उपादेयता चूक जाने पर संथारा द्वारा अपना जीवन त्यागकर अवशोषित हो जाती हैं। हथेली में अलग-अलग उंगलियां बनती हैं, क्योंकि उनके बीच की कोशिकाएं संथारा कर विलुप्त हो जाती हैं।