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Stress & Obesity: ज्यादा स्ट्रेस लेने वालों का क्यों बढ़ने लगता है वजन? जानिए इसके पीछे का पूरा साइंस

Fri, 30 Jan 2026 04:02 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Emotional Eating Disorder: अध्ययनों में पाया गया है कि जो लोग स्ट्रेस अक्सर स्ट्रेस में रहते हैं उनमें नींद विकारों के साथ हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारियों और डायबिटीज का जोखिम अधिक होता है। लगातार बनी रहने वाली स्ट्रेस की दिक्कत आपमें मोटापे का खतरा भी बढ़ाने वाली हो सकती है।
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इमोशनल ईटिंग और मोटापे का खतरा - फोटो : Freepik.com
मेंटल हेल्थ की समस्याएं मौजूदा समय में तेजी से बढ़ती जा रही हैं। स्ट्रेस-एंग्जाइटी हो या डिप्रेशन, ये दिक्कतें पहले की तुलना में अब काफी आम हो गई हैं। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं लंबे समय तक बनी रहने वाली ये परेशानियां शरीर के लिए कई तरह की नुकसानदायक हो सकती हैं।

अध्ययनों में पाया गया है कि जो लोग अक्सर स्ट्रेस में रहते हैं उनमें नींद विकारों के साथ हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारियों और डायबिटीज का जोखिम अधिक होता है। क्या आप जानते हैं कि स्ट्रेस की दिक्कत आपमें मोटापे का खतरा भी बढ़ाने वाली हो सकती है? इसे कंट्रोल में रखना जरूरी है।

लगातार स्ट्रेस की स्थिति में शरीर फाइट मोड में चला जाता है जिससे कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। यह हार्मोन शरीर को तुरंत ऊर्जा देने के लिए फैट स्टोर करने का संकेत देता है। इसी वजह से तनावग्रस्त लोग ज्यादा खाना शुरू कर देते हैं और अक्सर पेट और कमर के आसपास चर्बी बढ़ने की शिकायत करते हैं। इतना ही नहीं स्ट्रेस की समस्या इमोशनल ईटिंग का भी कारण बनती है, जिसकी वजह से भी आपका वजन बढ़ने लगता है।
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मोटापा और वजन बढ़ने का खतरा - फोटो : Adobe stock
स्ट्रेस और इमोशनल ईटिंग से मोटापे का खतरा

बैरिएट्रिक सर्जन और ओबेसिटी मेडिसिन फिजिशियन डॉ  केविन जेंड्रेउ ने हाल ही में सोशल मीडिया पर खुद के वजन बढ़ने की समस्या के बारे में बताया। एक वीडियो में उन्होंने बताया कि स्ट्रेस, लंबे समय तक काम करने और इमोशनल ईटिंग की वजह से उनका वजन बढ़ गया था। हालांकि सिर्फ 18 महीने में उन्होंने अपना वजन 56 किलो तक कम कर लिया है। 

 

अब आपके मन में भी दो सवाल होंगे कि आखिर इमोशनल ईटिंग क्या है और स्ट्रेस में शरीर का वजन आखिर क्यों बढ़ने लग जाता है। आइए इस बारे में विस्तार से समझते हैं।
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स्ट्रेस से इमोशनल ईटिंग - फोटो : Adobe Stock
स्ट्रेस के कारण बढ़ जाता है इमोशनल ईटिंग

इमोशनल ईटिंग को स्ट्रेस ईटिंग भी कहा जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, तनाव, गुस्सा, डर, बोरियत, उदासी और अकेलेपन जैसी नेगेटिव भावनाओं को दबाने या शांत करने के लिए लोग अधिक खाने लगते हैं। जिंदगी की बड़ी घटनाएं या रोजमर्रा की परेशानियां नेगेटिव भावनाओं को ट्रिगर कर सकती हैं, जिससे इमोशनल ईटिंग होती है।
 
  • साइकोलॉजिकल अध्ययनों के अनुसार, इमोशनल ईटिंग में दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम एक्टिव हो जाता है। 
  • मीठा या जंक फूड खाने से दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है, जिससे थोड़ी देर के लिए अच्छा महसूस होता है। यही वजह है कि व्यक्ति बार-बार इस तरह की चीजें खाने लगता है।
  • आमतौर पर इमोशनल ईटिंग में खाई जाने वाली ज्यादातर चीजें हाई कैलोरी वाली होती हैं, जिसके कारण तेजी से वजन बढ़ने का खतरा हो सकता है।

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स्ट्रेस में ज्यादा खाने-पीने की आदत - फोटो : Freepik.com
इमोशनल ईटिंग होता क्यों है?

जब व्यक्ति लंबे समय तक मानसिक दबाव में रहता है, तो शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ जाता है। ये हार्मोन भूख बढ़ाता है और हाई-कैलोरी वाली चीजों की क्रेविंग भी बढ़ने लगती है।
  • विशेषज्ञ कहते हैं, जो लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते या उन्हें समझ नहीं पाते, वे अधिक खाने को एक आसान तरीका मान लेते हैं।
  • धीरे-धीरे दिमाग यह सीख लेता है कि किसी भी नेगेटिव भावना से निपटने का सबसे आसान तरीका खाना है।
  • यही आदत आगे चलकर इमोशनल ईटिंग में बदल जाती है।
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पेट की चर्बी और वजन बढ़ने का जोखिम - फोटो : Freepik.com
इमोशनल ईटिंग से बढ़ सकता है मोटापा

इमोशनल ईटिंग का सीधा असर वजन पर पड़ता है। इस दौरान खाई जाने वाली चीजें हाई कैलोरी वाली होती है, जिससे कैलोरी इनटेक बढ़ जाता है। 
  • अतिरिक्त कैलोरी शरीर में फैट के रूप में जमा होने लगती है। इससे पेट और कमर के आसपास फैट बढ़ने लगता है।
  • स्ट्रेस मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देता है, जिससे फैट बर्न कम होता है, जो और तेजी से वजन बढ़ाने लगता है।
  • बार-बार ओवरईटिंग से मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा भी बढ़ जाता है। 



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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