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Coronavirus Vaccine: इम्यूनिटी की गारंटी के लिए एंटीबॉडीज से ज्यादा टी-सेल्स हैं महत्वपूर्ण, जानें इसके बारे में

Sun, 26 Jul 2020 02:56 AM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Blood Cells - फोटो : Britanica
कोरोना वायरस की वैक्सीन विकसित किए जाने के लिहाज से बीते कुछ दिन काफी सकारात्मक रहे हैं। दुनियाभर में काम तो 140 से ज्यादा वैक्सीन कैंडिडेट पर हो रहा है, लेकिन 21 से ज्यादा वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल की प्रक्रिया में होना बड़ी बात है। भारत की पहली देसी वैक्सीन कोवाक्सिन के ह्यूमन ट्रायल शुरू होने से लेकर वैक्सीन को लेकर रूस, चीन के दावे और ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन के ट्रायल में मिली सफलता तक, बीते कुछ दिनों में वैज्ञानिकों ने कई कामयाबियां हासिल की है। इन तमाम सकारात्मक परिणामों का फलाफल है कि जल्द ही वैक्सीन तैयार कर लेने की उम्मीद की जा रही है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
  • पिछले दिनों जारी किए गए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन के ह्यूमन ट्रायल के रिजल्ट में वॉलेंटियर्स के शरीर में एंटीबॉडी और टी-सेल्स, दोनों बनने की बात कही गई है। वहीं, कोरोना के प्रति इम्यूनिटी के लिहाज से टी-सेल्स की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। लेकिन ये टी-सेल्स आखिर होते क्या हैं, कैसे काम करते हैं और क्यों इन्हें कोरोना संक्रमण के खिलाफ एंटीबॉडी से ज्यादा अहम बताया जा रहा है? 
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Coronavirus Vaccine - फोटो : Pixabay/Amar Ujala
कारगर वैक्सीन के लिए अहम हैं टी-सेल्स 
  • दरअसल, कोरोना वैक्सीन के परीक्षण के दौरान अगर शरीर में ऐंटीबॉडी का बनने पर यह माना जाता है कि वायरस के प्रति शरीर में इम्यूनिटी पैदा हो रही है। हालांकि, एस्ट्राजेनेका, फाइजर और और उसके पार्टनर बायोएनटेक के अलावा चीन की कैनसीनो कंपनी की वैक्सीन से जुड़ी रिपोर्ट में एंटीबॉडीज की बजाय टी-सेल्स की मौजूदगी को इम्यूनिटी के लिहाज से ज्यादा अहम बताया गया है।
  • विशेषज्ञों के मुताबिक, शरीर में अगर टी-सेल्स सक्रिय हैं तो यह लंबे समय के लिए इम्यूनिटी की गारंटी देते हैं। कारण कि यही वे कोशिकाएं हैं, जो वायरस की पहचान करते हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
टी-सेल्स होते क्या हैं?
  • टी-सेल्स यानी टी-कोशिकाएं। यह ल्यूकोसाइट यानी वाइट ब्लड सेल यानी श्वेत रक्त कोशिकाओं का एक प्रकार है। यह हमारे इम्यून सिस्टम का अहम हिस्सा होते हैं। टी-सेल्स वायरस की पहचान करते हैं और उसके खिलाफ दूसरे इम्यून सेल्स को सक्रिय कर देते हैं।
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Blood Cells
एंटीबॉडीज कितने समय तक कारगर?
  • कोरोना को लेकर हो रहे शोध अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि मानव शरीर में वायरस के खिलाफ एंटीबॉडीज लंबे वक्त तक सक्रिय नहीं रह पा रहे हैं और उनकी संख्या भी तेजी से कम हो रही हैं। इस संबंध में बीबीसी की भी एक रिपोर्ट आई थी कि वैक्सीन आखिर कितने समय तक हमें कोरोना वायरस से बचाएगी। रूस की एक वैक्सीन के बारे में पिछले दिनों दावा किया गया था कि वह अगले दो साल तक संक्रमण से बचाएगी। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : ट्विटर
एंटीबॉडीज की तुलना में टी-सेल्स
  • साल 2003 में जिस वायरस के कारण सार्स बीमारी फैली थी, वह कोरोना फैमिली का ही वायरस था। उस समय जिनके शरीर में टी-सेल्स रेस्पॉन्स पैदा हुआ था, वह उस बीमारी के 17 साल बाद भी यानी आज भी सक्रिय है, यानी वे लोग फिर से सार्स से संक्रमित नहीं होंगे। दरअसल, टी-सेल्स को कई दशकों तक पुरानी बीमारी याद रहती है और जब कभी शरीर पर उस तरह का हमला होता है तो वह उसी तरह रेस्पॉन्स करते हैं, जैसे पहली बार किया था। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कोरोना वायरस के अबतक कई तरह के रूप सामने आ चुके हैं। किंग्स कॉलेज, लंदन के एक अध्ययन के मुताबिक यह छह तरीकों से इंसानी शरीर पर हमला करता है। किसी को बहुत हल्का संक्रमण होता है, किसी को गंभीर। यहां तक कि कई मरीजों की मौत भी हो जा रही है। वहीं, जो लोग जल्दी इससे उबर जा रहे हैं या फिर अपने आप ठीक हो जा रहे हैं, जैसा कि सीरो सर्वे के परिणाम भी इशारा करते हैं, उसकी वजह मरीजों के शरीर में पहले से टी-सेल्स की मौजूदगी हो सकती है। हालांकि इस पर अभी शोध और गहन अध्ययन की आवश्यकता बताई जा रही है। 
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