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Coronavirus Vaccine: एक अरब से ज्यादा लोगों तक कोरोना वैक्सीन कैसे पहुंचाएगा भारत? जानिए इसके बारे में सबकुछ

Mon, 30 Nov 2020 12:47 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भारत में कोरोना वैक्सीन - फोटो : Pixabay
जब वैक्सीन बनाने और देने की बात होती है, तो भारत उसके लिए बड़े एक पावरहाउस की तरह है। भारत में बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाए जाते हैं, यहां दुनियाभर की 60 प्रतिशत वैक्सीन बनती हैं और यहां आधे दर्जन वैक्सीन निर्माता मौजूद हैं, जिनमें दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड शामिल है। इसमें हैरानी की बात नहीं कि भारत सरकार अरबों लोगों तक कोविड-19 की वैक्सीन पहुंचाने की इच्छा रखती है। भारत की अगले साल जुलाई तक वैक्सीन की 50 करोड़ डोज बनाने और 25 करोड़ लोगों का टीकाकरण करने की योजना है। भारत का ये आत्मविश्वास तब और बढ़ जाता है जब वो हर साल बड़ी संख्या में टीकाकरण के अपने पिछले रिकॉर्ड को देखता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixabay
देश का 42 साल पुराना टीकाकरण अभियान दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य अभियानों में से एक है जिसे 55 करोड़ लोगों तक पहुंचाया जाता है। इनमें खासतौर पर नवजात शिशु और गर्भवती महिलाएं शामिल हैं, जिन्हें हर साल कई बीमारियों से बचाव के लिए वैक्सीन की करीब 39 करोड़ मुफ्त खुराकें मिलती हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
भारत के पास इन वैक्सीन को संग्रहित करने और उन पर नजर रखने का एक बेहतरीन इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम भी है। इन सबके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि पहली बार लाखों वयस्कों सहित अरबों लोगों तक कोरोना की वैक्सीन पहुंचाना सरकार के सामने एक असाधारण चुनौती होगी। भारत में विकसित की जा रहीं 30 वैक्सीन में से पांच का क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है। इनमें से एक है ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन जिस पर फिलहाल भारत के सीरम इंस्टीट्यूट में ट्रायल चल रहा है। भारत बायोटेक एक स्वदेशी कोरोना वैक्सीन विकसित कर रही है। 


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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भारत के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की सचिव डॉक्टर रेणु स्वरूप बताती हैं, 'एक स्वदेशी वैक्सीन का होना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।' वहीं माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉक्टर गगनदीप कांग कहती हैं, 'कई वैक्सीन में से एक को चुनना और फिर उसे चुने गए समूहों तक पहुंचाना, ये सब बड़ी चुनौतियां हैं।' गगनदीप कांग रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन की फेलो चुनी जाने वालीं पहली भारतीय महिला हैं। वह कहती हैं, 'हम इस काम की जटिलता को समझते हैं। भारत की आधी आबादी का टीकाकरण करने में ही कुछ साल लग जाएंगे।' ऐसे में ये समझने की कोशिश करते हैं कि टीकाकरण के बेहतरीन अनुभव के बावजूद भारत सरकार के सामने कोविड-19 की वैक्सीन लोगों तक पहुंचाने में क्या चुनौतियां हैं।  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वैक्सीन की आपूर्ति और संग्रहण

वैक्सीन प्रभावी रहे इसके लिए जरूरी है कि उसे उचित तापमान पर स्टोर किया जाए। भारत में 27,000 कोल्ड स्टोर्स हैं, जहां से संग्रहित की गईं वैक्सीन को 80 लाख स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है। लेकिन, क्या ये पर्याप्त होगा? देश में जितनी संख्या में वैक्सीन की जरूरत होगी, उतनी ही संख्या में अपने आप नष्ट हो वाली सीरिंज (इंजेक्शन) की भी जरूरत होगी ताकि उनके दोबारा इस्तेमाल और किसी तरह के संभावित संक्रमण को रोका जा सके। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दुनिया के सबसे बड़े सीरिंज निर्माता का कहना है कि वो वैक्सीन की मांग को पूरा करने के लिए अगले साल तक एक अरब सीरिंज बनाएगा। इसके अलावा कांच की उन शीशियों की आपूर्ति को लेकर भी सवाल हैं जिनमें वैक्सीन की खुराक रखी जाएगी। वहीं, उस मेडिकल कचरे के निपटारे को लेकर क्या किया जाएगा जो इस टीकाकरण अभियान से बड़े स्तर पर निकलेगा? इन सबके अलावा भारत में आम तौर पर होने वाले टीकाकरण कार्यक्रम को पूरा करने के लिए करीब 40 लाख डॉक्टर और नर्सों की जरूरत होती है, लेकिन कोविड-19 के टीकाकरण के लिए और ज्यादा लोगों की जरूरत पड़ेगी। देश की प्रमुख बायोटेक्नोलॉजी कंपनी बायोकॉन की संस्थापक किरन मजूमदार शॉ कहती हैं, 'मुझे चिंता है कि ग्रामीण भारत तक इन संसाधनों का विस्तार हम कैसे करेंगे।'  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
किसे पहले मिलेगी वैक्सीन

सरकार के लिए ये फैसला लेना भी चुनौतीपूर्ण होगा कि सबसे पहले किसे वैक्सीन दी जाए। स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का कहना है कि निजी और सरकारी स्वास्थ्यकर्मियों और अन्य विभागों के फ्रंटलाइन वर्कर्स को पहले वैक्सीन दी जाएगी। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा करना आसान नहीं होगा। एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉक्टर चंद्रकांत लहरिया कहते हैं, 'हमारे पास वैक्सीन की पर्याप्त आपूर्ति कभी नहीं होगी। ऐसे में किसे पहले वैक्सीन दी जाए ये तय करना अपने आप में बड़ी चुनौती बनने वाला है।' 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एक और बात का ध्यान रखा जाना जरूरी है। भारत एक ऐसा देश है जहां बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी निजी क्षेत्र से जुड़े हैं, तो क्या एक निजी क्षेत्र के स्वास्थ्यकर्मी को सरकारी स्वास्थ्यकर्मी के मुकाबले प्राथमिकता दी जाएगी? क्या स्थानीय कर्मियों को अनुबंध पर काम करने वालों के मुकाबले प्राथमिकता दी जाएगी?

अगर पहले से दूसरी बीमारियों से जूझ रहे बुजुर्गों को पहले वैक्सीन दी जाएगी तो उसमें अलग-अलग बीमारियों के हिसाब से किन्हें प्राथमिकता मिलेगी? जैसे भारत में सात करोड़ लोगों को डायबिटीज है, ये आंकड़ा पूरी दुनिया में दूसरे नंबर है। तो क्या इन सभी लोगों को पहले वैक्सीन दी जाएगी। वहीं सभी 30 राज्यों में कोरोना की वैक्सीन पहुंचाना संभव नहीं है, तो क्या उन राज्यों में वैक्सीन पहले दी जाएगी जहां कोरोना वायरस के ज्यादा मामले हैं? 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
लाखों खुराकों की निगरानी

वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट में स्वास्थ्य देखभाल आपूर्ति श्रृंखला का अध्ययन करने वाले डॉक्टर प्रशांत यादव के मुताबिक, वैक्सीन के अच्छे पोर्टफोलियो वाले वैक्सीन निर्माताओं से विनिर्माण अनुबंध करने से भारत को लोगों तक जल्दी पर्याप्त वैक्सीन पहुंचाने में मदद मिलनी चाहिए। लेकिन वो कहते हैं कि नियमित टीकाकरण में सफलता मिलना कोविड-19 वैक्सीन के मामले में सफलता की गारंटी नहीं देता। डॉक्टर प्रशांत यादव का कहना है, 'नियमित टीकाकरण में सरकार के पास पहले से बनी हुई व्यवस्था है, लेकिन ये ज्यादातर सरकारी क्लीनिक्स के लिए है। फिलहाल वयस्कों के लिए बड़े स्तर पर कोई टीकाकरण कार्यक्रम नहीं है और वयस्क सरकारी स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों में नियमित तौर पर नहीं जाते।' 

किरण मजूमदार शॉ और इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि सुझाव देते हैं कि भारत को वैक्सीन की हर खुराक का रिकॉर्ड रखने और निगरानी के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल करना चाहिए। नंदन नीलेकणि ने एक अखबार से कहा, 'हमें एक ऐसी प्रणाली बनाने की जरूरत है जिससे देशभर में एक दिन में एक करोड़ लोगों को वैक्सीन दी जा सके लेकिन ये सब एक डिजिटल आधार द्वारा एकीकृत हो।' 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
धोखाधड़ी की आशंका

इस बात को लेकर भी चिंता जताई जा रही है कि वैक्सीन पहुंचाने में भ्रष्टाचार भी हो सकता है। प्रशासन उन लोगों की पहचान कैसे करेगा जो नकली दस्तावेजों के आधार पर उन लोगों में शामिल होने की कोशिश करेंगे जिन्हें शुरुआती टीकाकरण के लिए चुनाव गया है। वहीं, दूर-दराज के बाजारों में बेची जा रही नकली वैक्सीन को कैसे रोका जाएगा? 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दुष्प्रभावों की निगरानी

कुछ लोगों में वैक्सीन के दुष्प्रभाव भी सामने आ सकते हैं। भारत के पास टीकाकरण के दौरान सामने आने वाले प्रतिकूल प्रभावों की जांच करने के लिए 34 साल पुराना निगरानी कार्यक्रम है। लेकिन, शोधकर्ताओं ने पाया है कि दुष्प्रभावों के बारे में बताने के लिए मानक अभी भी कमजोर हैं और गंभीर प्रतिकूल घटनाओं की संख्या अभी भी अपेक्षित संख्या से कम है। वैक्सीन के प्रतिकूल प्रभावों की पारदर्शी रूप से रिपोर्ट करने में विफलता के कारण इसे लेकर डर पैदा हो सकता है।  

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
किसे देने होंगे पैसे

ये संभवत: एक बड़ा सवाल है। क्या सरकार वैक्सीन की सभी खुराकें लेकर उसे निशुल्क या सब्सिडी के साथ टीकाकरण अभियान में लोगों को देगी? या फिर टीके को निजी वितरण और बिक्री के माध्यम से बाजार की कीमत पर दिया जाएगा? डॉक्टर लहरिया जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को हर भारतीय को टीका लगाने के लिए भुगतान करने को तब तक तैयार रहना चाहिए जब तक कि महामारी खत्म न हो जाए। डॉक्टर किरण मजूमदार शॉ का कहना है कि निजी कंपनियां अपने कर्मचारियों को टीका लगाने के लिए खुद भुगतान कर सकती हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
नंदन नीलेकणि कहते हैं कि शुरुआत में वैक्सीन की कीमत तीन से पांच डॉलर (लगभग 220 से 369 रुपये) होती है तो हर भारतीय के लिए इसकी दो खुराक की कीमत 10 डॉलर (करीब 739 रुपये) और भारत के लिए 13 अरब डॉलर (लगभग नौ खरब रुपये से ज्यादा) हो सकती है। ये बहुत मंहगा होगा। इसलिए डॉक्टर गगनदीप कांग कहती हैं कि भारत के लिए एक अच्छी वैक्सीन की लागत 50 सेंट (करीब 2.25 रुपये) प्रति खुराक से कम होनी चाहिए। ये भरपूर मात्रा में उपलब्ध हो और इसकी एक खुराक की जरूरत हो। 
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