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क्या एचआईवी की तरह कोरोना वायरस भी खत्म नहीं होगा?

Fri, 15 May 2020 09:10 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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प्रतीकात्मक तस्वीर
कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में आकर अब तक दुनिया में दो लाख 97 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं, संक्रमित लोगों की संख्या 43।5 लाख के करीब पहुंच चुकी है। एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों में अभी भी वायरस का प्रसार जारी है। भारत जैसे देश में विशेषज्ञों ने आने वाले दिनों में वायरस का प्रसार तेजी से बढ़ने की आशंकाएं जताई है।

कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए दवा या वैक्सीन को लेकर कई जगह काम चल रहा है लेकिन अभी तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है। बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के विशेष दूत डेविड नाबारो ने भी कहा था कि लोगों तक वैक्सीन पहुंचने में ढाई साल का समय लग सकता है। इसी बीच डब्लूएचओ ने कहा है कि ये वायरस एचआईवी की तरह इंसानी दुनिया का हिस्सा बनकर रह सकता है। 
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कोरोना की जांच के लिए नमूना एकत्र करती महिला स्वास्थ्य कर्मी(फाइल फोटो) - फोटो : PTI
विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से आए इस बयान ने कई चिंताओं और सवालों को जन्म दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक शीर्ष अधिकारी माइकल रायन ने कहा "हमें सच्चाई जानने की जरूरत है और ये वायरस हमारे बीच बना रह सकता है।" 

इमरजेंसी चीफ माइकल रायन कहते हैं, ''हमें इसे लेकर स्पष्ट और तैयार रहने की जरूरत है। संभव है कि कोरोना वायरस हमारे बीच क्षेत्र विशेष का एक अन्य वायरस बन जाए और यह कभी नहीं जाए। मुझे लगता है कि इसे लेकर कोई वादा नहीं किया जा सकता कि यह कब खत्म होगा। इसकी कोई तारीख नहीं है। यह बीमारी हम लोगों के लिए लंबी अवधि का संकट बन सकती है।''

रायन ने ये बात कहते हुए एचआईवी का भी नाम लिया। उन्होंने कहा, "ये वायरस एक नया एंडेमिक वायरस बन सकता है। आशंका है कि ये वायरस कभी खत्म न हो। एचआईवी वायरस खत्म नहीं हुआ है। लेकिन हमने इस वायरस के साथ जीना सीख लिया है। हमने इसके लिए थेरेपी और बचाव ढूंढ लिए हैं और अब लोग पहले जितना डर महसूस नहीं करते हैं।"
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कोरोना वायरस (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
बीबीसी ने संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ डॉक्टर जय प्रकाश मुलियलि से ये समझने की कोशिश की है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से आई इस सूचना को किस तरह लेते हैं। डॉ. मुलियलि बताते हैं, "विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिकारी जो कह रहे हैं, मैं उससे पूरी तरह सहमत हूं। ये बिल्कुल सही है।" 

डॉ. मुलियलि हर्ड इम्युनिटी कॉन्सेप्ट के पक्षधर माने जाते हैं। वो मानते हैं कि लॉकडाउन लगाकर इस वायरस से निजात नहीं पाया जा सकता है और इससे निजात पाने के लिए आपको हर्ड इम्युनिटी की ओर जाना होगा। हर्ड इम्युनिटी से आशय उस स्थिति से है जब किसी जगह की 60 फीसदी जनसंख्या इस वायरस का संक्रमित होने के बाद इस वायरस से लड़ने में कामयाब हो गई हो।

अमरीकी हार्ट एसोसिएशन के चीफ मेडिकल अफसर डॉक्टर एडुआर्डो सांचेज ने अपने ब्लॉग में हर्ड इम्युनिटी को समझाने की कोशिश की है। वो लिखते हैं, "इंसानों के किसी समूह (अंग्रेजी में हर्ड) के ज्यादातर लोग अगर वायरस से इम्यून हो जाएं तो समूह के बीच मौजूद अन्य लोगों तक वायरस का पहुंचना बहुत मुश्किल होता है और एक सीमा के बाद इसका फैलाव रुक जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया में समय लगता है। साथ ही 'हर्ड इम्युनिटी' के आइडिया पर बात अमूमन तब होती है जब किसी टीकाकरण प्रोग्राम की मदद से अतिसंवेदनशील लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर ली जाती है।"

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प्रतीकात्मक तस्वीर
एचआईवी का जिक्र
माइकल रायन ने इस बारे में एचआईवी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जैसे एचआईवी खत्म नहीं हुआ है, वैसे ही संभव है कि ये वायरस भी खत्म न हो। लेकिन एचआईवी और कोविड-19 में जमीन आसमान का अंतर नजर आता है। क्योंकि कोविड-19 से काफी बचाव करना पड़ता है। इसके प्रसार को रोकने के लिए दुनिया भर की सरकारों को लॉकडाउन जैसे कदम उठाने पड़े हैं लेकिन एचआईवी को लेकर ऐसा नहीं था। एचआईवी एक दूसरे को छूने से नहीं फैलता है।

हालांकि, ये बात सही है कि कोरोना वायरस की तरह एचआईवी की भी कोई वैक्सीन अब तक सामने नहीं आई है लेकिन एचआईवी को लेकर लोगों के बीच एक बेहतर समझ विकसित हुई है। सरकारों से लेकर गैर-सरकारी संस्थानों ने इसके लिए दशकों लंबे अभियान चलाए हैं जो अभी भी जारी हैं।

वहीं, कोरोना वायरस के मामले में ये सब करना एक चुनौती जान पड़ता है। सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों के बीच एक राय बनी हुई है कि इस तरह से जिंदगी आखिर कब तक जी जा सकती है और लोग इसके खत्म होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
डॉक्टर मुलियलि बताते हैं कि ऐसी बीमारियों के मामले में एक सामान्य लॉकडाउन वायरस के प्रसार की रफ्तार धीमी कर सकता है। लेकिन लॉकडाउन खुलने के बाद संक्रमण तेजी से बढ़ते हैं। वो कहते हैं, "इस स्थिति में हमें लोगों के मरने की संख्या को घटाना है और मौतों की संख्या घटाने का बस एक तरीका लोगों को बेहतर इलाज मुहैया कराना है।"
  • क्या अब कुछ नहीं हो सकता?
विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से आई इस जानकारी के बाद लोगों में निराशा का भाव है। लेकिन डॉक्टर मुलियलि बताते हैं कि अभी भी उम्मीद की एक किरण शेष है। वो कहते हैं, "जब जनसंख्या में रोग प्रतिरोधक क्षमता 60 फीसदी के आसपास पहुंच जाती है तो कुछ समय के लिए इस बीमारी का संक्रमण रुक जाएगा। लेकिन ये कहीं जाएगा नहीं। ये उसी तरह हमारे बीच रहेगा जैसे मीजल्स है। जैसे चिकन पॉक्स है। अब इस पैंडेमिक के दौरान वे बीमारियां कहीं चली नहीं गई हैं। वे हमारे बीच मौजूद हैं। बस धीमे-धीमे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में पहुंच रही हैं। इसे ही बीमारी का एन्डेमिक स्टेज कहते हैं।"
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