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कोरोना वायरस से बचने के लिए आखिर कब तक करनी होगी सोशल डिस्टेंसिंग?

Sun, 05 Apr 2020 07:38 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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'सोशल डिस्टेंसिंग' आखिर कब तक? - फोटो : Amar Ujala
कोरोना वायरस सारी दुनिया के लिए एकदम नया है। ये कहां से आया है? कैसे रुकेगा? इसका इलाज क्या है? अभी किसी को कुछ नहीं पता।

लेकिन एक बात सौ फीसदी सही साबित हो गई है कि इसे सोशल डिस्टेंसिंग से रोका जा सकता है। जिन देशों ने भी इस पर काबू पाया, वहां यही हथियार अपनाया गया है। भारत में भी सोशल डिस्टेंसिंग करने को कहा जा रहा है। और इसीलिए सरकार को लॉकडाउन करना पड़ा। लेकिन ये सोशल डिस्टेंसिंग आखिर कब तक चलेगी?

पिछली सदी की शुरुआत में जिस वक्त पहला विश्व युद्ध खत्म हो रहा था, तो एक वायरस ने दुनिया पर हमला बोला था। जिसने दुनिया की एक चौथाई आबादी को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। इस महामारी को आज हम स्पेनिश फ्लू के नाम से जानते हैं। पूरी दुनिया में इस महामारी से पांच से दस करोड़ लोगों की जान चली गई थी।
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100 साल पहले फैली थी यह खतरनाक बीमारी - फोटो : Social media
स्पेनिश फ्लू
साल 1918 में इस महामारी के दौरान ही अमरीका के कई शहर लिबर्टी बॉन्ड परेड की तैयारी कर रहे थे। इस परेड के जरिए यूरोपीय देशों को युद्ध में मदद करने के लिए पैसे जुटाए जा रहे थे। फिलाडेल्फिया और पेंसिल्वेनिया शहरों के प्रमुखों ने महामारी के बावजूद ये परेड करने का फैसला किया।

जबकि इन शहरों में रह रहे 600 सैनिक पहले से ही स्पेनिश फ्लू के वायरस से पीड़ित थे। फिर भी यहां परेड निकालने का फैसला लिया गया। वहीं सेंट लुई और मिसौरी राज्यों ने अपने यहां होने वाली परेड रद्द कर दी। और लोगों को जमा होने से रोकने के लिए अन्य कदम भी उठाए।

नतीजा ये रहा है कि फिलाडेल्फिया में एक महीने में दस हजार से ज्यादा लोग स्पेनिश फ्लू की चपेट में आकर मर गए। जबकि सेंट लुई जिसने लोगों को जमा नहीं होने दिया था वहां मरने वालों की संख्या 700 से भी कम रही। यानी सेंट लुईस में लोग सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से बच गए।
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इतिहास में इसकी कई मिसालें
न्यूजीलैंड में महामारियों और संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ अरिंदम बसु का कहना है कि सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब दो या दो से ज्यादा लोगों को निजी तौर पर मिलने से रोकना है। और वायरस के फैलने में ये बहुत बड़ी रुकावट का काम करता है। कोविड-19 को रोकने के लिए दुनिया भर में सोशल डिस्टेंसिंग का सहारा लिया जा रहा है।

इतिहास में इसकी कई मिसालें मिलती हैं। 1918 में अमरीका ने भी कई शहरों में सार्वजनिक समारोह पर पाबंदी लगा दी थी। स्कूल, थियेटर, चर्च सब बंद कर दिए थे। पूरी एक सदी बाद दुनिया एक बार फिर उसी दौर से गुजर रही है। लेकिन इस इस सदी में दुनिया की आबादी उस दौर की आबादी की तुलना में 6 अरब ज्यादा हो चुकी है।

कोविड-19 भी स्पेनिश फ्लू के वायरस जैसा नहीं है। वैज्ञानिकों के लिए भी ये वायरस रिसर्च का विषय है। फिलहाल इस पर काबू पाने का एकमात्र उपाय है-सोशल डिस्टेंसिंग। इसके माध्यम से ही कोविड-19 की इन्फेक्शन चेन तोड़ी जा सकती है।

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सोशल डिस्टेंसिंग
लगभग सभी देश लोगों को घरों में रहने, लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की सलाह दे रहे हैं। इसका मकसद सिर्फ और सिर्फ लोगों को संक्रमित लोगों के संपर्क में आने से रोकना है। सेल्फ आइसोलेशन और क्वारंटीन सोशल डिस्टेंसिंग के ही अलग-अलग रूप हैं।

सोशल डिस्टेंसिंग का ये दौर अभी थोड़े और समय तक चलने वाला है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमरीका में सोशल डिस्टेंसिंग का ये अमल 2022 तक जारी रह सकता है। हालांकि ये रिपोर्ट अभी किसी शैक्षिक पत्रिका में छपनी बाकी है। उम्मीद है कि 2022 तक कोविड-19 की वैक्सीन और दवा खोज ली जाएगी।

लेकिन तब तक सोशल डिस्टेंसिंग और क्वारंटीन का पालन करना होगा। अगर मौसम के चक्र का इस वायरस पर कुछ असर होता है, तो संभव है कि साल के अंत में ये वायरस फिर से सक्रिय हो जाए। कोविड-19 से संक्रमित व्यक्ति औसतन 2 से 3 व्यक्तियों को संक्रमित करता है।
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Coronaindia - फोटो : Coronaindia
वायरस के लक्षण
एक स्टडी के मुताबिक स्पेनिश फ्लू के वायरस में प्रजनन की क्षमता 1.8 है। इनफ्लुएंजा वायरस की क्षमता 1.06 से 3.4 है। जबकि नजला करने वाले रिनोवावायरस में प्रजनन क्षमता 1.2-1.83 है। वहीं कोविड-19 में प्रजनन क्षमता 1.4 से 3.9 है जोकि सभी तरह के वायरस की प्रजनन क्षमता के तुलना में सबसे ज्यादा है।

कोडिव-19 पर चीन में हुई एक रिसर्च के मुताबिक इस वायरस के लक्षण 5 दिन में ही शरीर में फैलने लगते हैं और 14 दिन में साफ तौर पर नजर आते हैं। इस बीच अगर कोरोना संक्रमित सामान्य इंसान की तरह लोगों से मिलता जुलता रहता है, तो वो 2 से 3 लोगों को संक्रमित करता है।

और फिर यही 2 से 3 लोग आगे इतने ही लोगों को संक्रमित करते हैं और कोरोना के फैलने का दायरा बढ़ता चला जाता है। इस तरह एक कोरोना संक्रमित एक महीने में लगभग 244 लोगों को संक्रमित बना देता है। अगर रोकथाम न की गई, तो अगले दो महीने में यही आंकड़ा 59 हजार 604 तक पहुंच सकता है।
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साइलेंट ट्रांसमिशन
ये वायरस ऐसे लोगों से भी फैलता है, जो संक्रमित हो चुके हैं लेकिन उनमें कोई लक्षण नजर नहीं आता। इसे साइलेंट ट्रांसमिशन कहते हैं। लगभग 10 फीसद केस में ऐसा साइलेंट ट्रांसमिशन नजर आता है। ऐसे लोग अगर खुद अपने को लोगों से दूर कर लें, तो बहुत हद तक कोविड-19 को फैलने से रोका जा सकता है।

चीन के वुहान शहर में कोरोना वायरस के संक्रमण पर हुई रिसर्च के मुताबिक सोशल डिस्टेंसिंग से इस वायरस के प्रजनन की ताकत को कम किया जा सकता है। इसका असर वुहान में लॉकडाउन के दौरान देखने को मिला भी। सोशल डिस्टेंसिंग से इस वायरस की प्रजनन क्षमता 2.35 से लगभग 1 पर आ गयी।

मतलब एक कोरोना संक्रमित सिर्फ एक व्यक्ति को ही संक्रमित कर सकता था। सोशल डिस्टेंसिंग का एक और मकसद इसकी रफ्तार को कम करना है। यानी अगर ये लोगों तक पहुंचने में समय ज्यादा लेगा तो इसकी ताकत कम हो जाएगी। ये कम से कम लोगों को ही नुकसान पहुंचाएगा।
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बाकी लोगों से अलग रखा जाए
अगर लोग एक दूसरे के करीब आते रहेंगे तो वायरस के प्रकोप फैलता जाएगा। कोविड-19 का संक्रमण रोकने के लिए अलग-अलग देशों ने अलग-अलग तरीके अपनाए हैं। ब्रिटेन ने इसके लिए एक कंप्यूटर मॉडल को अपनाया ,है जिससे पता चलता है कि संक्रमण फैलता कैसे है।

ब्रिटेन के लिए ये मॉडल इम्पीरियल कॉलेज लंदन ने तैयार किया है और इसकी रिपोर्ट 16 मार्च को प्रकाशित हुई थी। इसी तरह अमरीका और ब्रिटेन की आबादी को देखते हुए दो तरह के मॉडल पर रिसर्च की गई। एक मॉडल के तहत इस बात पर जोर दिया गया कि जिन लोगों में संक्रमण है या लक्षण हैं, उन्हें बाकी लोगों से अलग रखा जाए।

दूसरे मॉडल के तहत संक्रमित लोगों और उनके परिजनों को घर पर रखा जाए। और बाकी लोगों से सोशल डिस्टेंसिंग कराई जाए। इस रिसर्च में ये डराने वाली बात सामने आई कि अगर ब्रिटेन में रोकथाम का कोई कदम नहीं उठाया जाता तो वहां 5 लाख 10 हजार लोगों की मौत हो सकती है।

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स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा सकती हैं
जबकि अमरीका में 22 लाख लोगों के मरने की आशंका जताई गई। और अगर पहले मॉडल पर आधारित रणनीति पर अमल किया गया, तो मौत की ये संख्या आधी से भी कम रखी जा सकती है। जबकि स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में दो तिहाई की कमी आ सकती है।

फिर भी इस मॉडल को अपनाने के बावजूद हजारों लोगों की जान जा सकती है और स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा सकती हैं। खास तौर से आईसीयू की भारी कमी हो सकती है। इस रिपोर्ट के आने से पहले ब्रिटेन ने हर्ड इम्युनिटी के फॉर्मूले पर अमल करने की तैयारी की थी। जिसमें ऐसे लोगों की संख्या कम करनी थी जिन्हें संक्रमण हो सकता था।

हर्ड इम्युनिटी में किसी तरह की पाबंदी नहीं लगाई जाती है, जिसके चलते सेहतमंद लोग इस वायरस से जीत हासिल करते हैं और इससे समाज के एक समुदाय की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जाती है।

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संक्रमण की रफ्तार
डॉक्टर अरिंदम बसु कहते हैं कि अभी तक ये पता नहीं है कि जिन लोगों में वायरस से लड़ने की क्षमता है, वो भी दोबारा संक्रमित होंगे या नहीं। कोविड-19 के फैलने में समाज के ताने-बाने और लोगों की उम्र का भी बड़ा हाथ है। मिसाल के लिए इटली में ज्यादातर संयुक्त परिवार हैं और यहां बुजुर्गों की तादाद भी ज्यादा है।

लोग एक दूसरे के नजदीक रहते हैं। इसीलिए यहां कोविड-19 से सबसे ज्यादा मौत भी हुई हैं। इटली में जितने लोग संक्रमण की वजह से मरे हैं, उनमें बड़ी संख्या बुजुर्गों की है। फिर भी इटली में जहां भी सोशल डिस्टेंसिंग का फॉर्मूला अपनाया गया, वहां संक्रमण की रफ्तार काफी कम हुई है।

इटली में संक्रमण पर काबू पाने के लिए दो शहरों में अलग-अलग रणनीति अपनाई गई। लोडी शहर में 21 फरवरी को पहला केस सामने आया था। और इसके दो दिन बाद ही शहर में यात्रा पर पाबंदी लगा दी। 24 फरवरी को सभी स्कूल, यूनिवर्सिटी, स्टेडियम, कल्ब, सार्वजनिक कार्यक्रमों पर पाबंदी लगा दी गई।

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लॉकडाउन की वजह से
वहीं, बरगामो शहर में भी 23 फरवरी को कोरोना के मरीज सामने आने लगे थे। लेकिन यहां पाबंदी लगाने की सिर्फ बातें होती रहीं। 8 मार्च को जब यहां पूरी तरह लॉकडाउन हुआ, तभी इस शहर में पाबंदियां लागू हुईं। 7 मार्च तक लोडी और बरगामो दोनों शहरों में 800 कोरोना मरीज थे।

लेकिन 13 मार्च तक बरगामो में मरीजों की संख्या 2300 तक पहुंच चुकी थी और लोडी शहर में ये संख्या लगभग आधी थी। जबकि दोनों ही शहरों में समान उम्र के लोग रहते हैं। दोनों ही शहरों में मोटे तौर पर 21 फीसद आबादी 65 की उम्र वालों की है। लोडी शहर में मरीजों की संख्या सिर्फ लॉकडाउन की वजह से ही कम थी।

यही फर्क 1918 में अमरीका के फिलाडेल्फिया और सेंट लुई में देखने को मिला था। अमरीका के वॉशिंगटन स्टेट में हुई एक और स्टडी बताती है कि किसी भी तरह के रेस्पिरेटरी वायरस को रोकने में सोशल डिस्टेंसिंग अहम रोल निभाती है। मुश्किल तब आती है जब एक वक्त के बाद लोग सामान्य तौर पर एक दूसरे से मिलने लगते हैं।
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कोरोना को हराना है
उस वक्त वायरस फिर तेजी से फैलने लगता है। इसलिए वायरस को कमजोर करने के लिए लंबे समय तक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना जरुरी है। जाहिर है सोशल डिस्टेंसिंग का सख्ती से पालन करना इतना आसान नहीं। हर किसी की जिंदगी में ऐसे मौके आते ही हैं जब लोग इकट्ठा होते हैं।

वैसे जानकार खुद भी इस बात को मानते हैं कि ज्यादा वक्त तक एक दूसरे से दूर रहने पर ह्रदय रोग, तनाव और पागलपन का शिकार होने की संभावना बढ़ जाती है। आज हम 1918 के दौर में नहीं हैं जहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना मुश्किल हो।

आज हम तकनीक के सुनहरे दौर में हैं, जहां तकनीक के जरिए हम एक ही वक्त में सारी दुनिया से जुड़ सकते हैं। अगर कोरोना को हराना है और स्वस्थ रहना है, तो एक लंबे वक्त के लिए सोशल डिस्टेंसिंग बनाना जरूरी है।
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