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Coronavirus: मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थैरेपी क्या है? जानिए कोरोना काल में इसका महत्व

Mon, 28 Dec 2020 08:01 AM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
दुनिया के कई देशों में फैल रहे कोरोना के नए स्ट्रेन (प्रकार) के बीच भारत में इस बीमारी से स्वस्थ होने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, देश में पिछले 24 घंटों में 21 हजार 400 मरीज कोरोना वायरस से ठीक हुए हैं और इसी के साथ अब यहां स्वस्थ होने की दर 95.82 फीसदी हो गई है। भारत में अब तक कुल 97 लाख 61 हजार से अधिक लोग इस बीमारी से ठीक हो चुके हैं। चूंकि इस बीमारी का कोई इलाज तो नहीं है, लेकिन इसको लेकर शोध लगातार चल रहे हैं। आइए जानते हैं कोरोना वायरस और उसके इलाज से संबंधित कुछ जरूरी सवालों के जवाब...
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कोरोना पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
भारत में कोरोना की स्थिति को कैसे देखते हैं? 
  • दिल्ली स्थित एम्स के डॉ. प्रसून चटर्जी कहते हैं, 'भारत में लगातार प्रतिदिन मामलों की संख्या 30 हजार से नीचे बनी हुई है। यह एक अच्छी खबर है। लोग इसी तरह सावधानी बरतते रहें। हाथ धोते रहें और मास्क का प्रयोग करते रहें, तो स्थिति और बेहतर होगी। उम्मीद है 2021 हमारे लिए अच्छा होगा।' 
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कोरोना पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
क्या कोरोना के नए स्ट्रेन से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है? 
  • डॉ. प्रसून चटर्जी बताते हैं, 'नए स्ट्रेन को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है। यहां तक ब्रिटेन में भी नए स्ट्रेन से मृत्युदर बढ़ी नहीं है। यह जरूर है कि यह 70 फीसदी अधिक तीव्रता से फैलता है। बहुत लोग संक्रमित होंगे, तो उसमें अगर मृत्यु हुई, तो कुल मृत्यु दर फिर बढ़ेगी। यह स्ट्रेन अलग है, यह फैलता जल्दी है। अगर आप मास्क पहने हैं और दूसरों के साथ दूरी बनाकर रखे हैं, तो इससे भी बच सकते हैं।' 

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कोरोना पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थैरेपी क्या है? 
  • डॉ. प्रसून चटर्जी बताते हैं, 'मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थैरेपी को कई रोगों के उपचार में पहले भी इस्तेमाल किया जा चुका है। कुछ-कुछ वायरल बीमारियों में भी इस्तेमाल हुई है। इसमें प्रयोगशाला में वायरस के खिलाफ एंटीजेन बनाया जाता है। इसमें संक्रमित को दो इंजेक्शन दिए जाते हैं, जो कोरोना वायरस के प्रोटीन स्पाइक को कमजोर कर देता है। इससे वायरस का लोड कम हो जाता है। इससे मृत्यु दर भी कम हुई है। लेकिन हां, ये सब अभी परीक्षण के तौर पर किया जा रहा है।' 
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कोरोना पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
क्या एंटीबॉडीज कोरोना के मरीजों को छह महीने तक री-इन्फेक्शन से बचा सकते हैं? 
  • डॉ. प्रसून चटर्जी बताते हैं, 'किसके शरीर में कितने एंटीबॉडी विकसित होंगे और कितने दिन तक बने रहेंगे, यह कहना मुश्किल है। किसी के शरीर में ये एक महीने तक रह सकते हैं, तो किसी के शरीर में तीन से छह महीने तक। ऐसी खबरें आई हैं कि लोगों को दोबारा कोरोना हुआ, और तो और कुछ लोगों को तीन बार कोरोना हुआ। मतलब एंटीबॉडी कितने दिन तक शरीर में रहेंगे, कुछ पक्का पता नहीं है। ऐसा मत सोचें कि एक बार कोरोना हो गया तो पुन: नहीं होगा। दोबारा होने में उसके दूसरे स्ट्रेन से संक्रमित हो सकते हैं।' 
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कोरोना पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
जिनको पहले से ही सांस संबंधी बीमारी है, वो मास्क कैसे पहनें? 
  • डॉ. प्रसून चटर्जी बताते हैं, 'अस्थमा व सीओपीडी के मरीजों को अक्सर सांस लेने में तकलीफ होती है। दरअसल, वो मास्क लगाने की वजह से नहीं, बल्कि उनके एयर-वे में सेक्रीशन (स्राव) जमा हो जाता है। उसका इलाज ही अलग है। बेहतर होगा ऐसे लोग सर्दियों में बाहर न निकलें। अगर बहुत जरूरी है, तो मास्क की जगह रुमाल या गमछे का प्रयोग कर सकते हैं। भीड़ में जाने से बचें। एन-95 मास्क या सर्जिकल मास्क में घुटन होती है तो आप कपड़े का मास्क पहनें।' 
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