नींद की कमी की समस्या
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50 साल में दोगुनी बढ़ गई है समस्या
रिपोर्ट में भारत सहित दुनिया के 1,338 शहरों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के अनुसार, 1970 के दशक की तुलना में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली नींद की कमी लगभग दोगुनी हो चुकी है। साल 2020 से 2025 के बीच दुनिया भर में प्रत्येक व्यक्ति ने औसतन 56 घंटे की नींद के साथ समझौता किया, जिसमें 10 प्रतिशत से अधिक कमी का संबंध सीधे जलवायु परिवर्तन से पाया गया।
- जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवाश्म ईंधनों के बढ़ते उपयोग और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन ने तापमान में लगातार वृद्धि की है। यदि उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर होगी।
वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जब रात का तापमान अधिक रहता है तो शरीर दिनभर की गर्मी से उबर नहीं पाता और गहरी नींद लेने में कठिनाई होती है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने पर हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, स्ट्रोक, डायबिटीज, मोटापा, मानसिक तनाव-अवसाद जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
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स्रोत:
Climate Change is Costing People Sleep
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