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Chandipura Virus: गुजरात में चांदीपुरा वायरस का अलर्ट, दिमाग पर करता है सीधा हमला; जानिए कैसे करें इसकी पहचान

Fri, 10 Jul 2026 06:03 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

गुजरात में हाल ही में एक बच्चे की मौत के बाद चांदीपुरा वायरस को लेकर स्वास्थ्य विभाग ने सतर्कता बढ़ा दी है। संदिग्ध मामलों की जांच के लिए नमूनों को प्रयोगशालाओं में भेजा गया है और प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी तेज कर दी गई है। जानिए क्या है ये वायरस?
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चांदीपुरा वायरस का बढ़ता खतरा - फोटो : Amarujala.com/AI
मानसून आते ही देश में कई तरह की संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने इन दिनों डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया के खतरों को लेकर लोगों को अलर्ट किया था। इस बीच गुजरात में चांदीपुरा वायरस के मामलों को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को सावधान किया है।

यहां साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर सिविल अस्पताल में इलाज के दौरान राजस्थान के छह वर्षीय बच्चे की मौत की खबर है। इसने राज्य में चांदीपुरा वायरस के फैलने को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। अस्पताल के अधिकारियों के अनुसार, बच्चे को चार दिन पहले भर्ती कराया गया था।

हिम्मतनगर सिविल अस्पताल में पांच संदिग्ध मामले भी सामने आए थे। इनमें से दो बच्चों की रिपोर्ट नेगेटिव आई और उन्हें छुट्टी दे दी गई, जबकि अन्य मरीजों की रिपोर्ट का इंतजार किया जा है। अस्पताल के रिकॉर्ड बताते हैं कि 26 जून से 9 जुलाई के बीच चांदीपुरा वायरस के सात संदिग्ध मरीज भर्ती किए गए थे। इस दौरान तीन बच्चों की मौत हो चुकी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कई चीजें इस वायरस के संक्रमण को गंभीर और घातक बनाने वाली हो सकती हैं।
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चांदीपुरा वायरस का ब्रेन पर होने वाला असर - फोटो : Adobe Stock
संक्रमितों में एन्सेफेलाइटिस का बढ़ जाता है खतरा

चांदीपुरा कोई नया वायरस नहीं है, पहले भी इसके मामले सामने आते रहे हैं। साल 2024 में भी गुजरात के कई शहरों में इसके मामले रिपोर्ट किए गए थे। गुजरात के साथ मध्यप्रदेश और राजस्थान में इसके मामले रिपोर्ट किए गए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चांदीपुरा वायरस मुख्य रूप से बच्चों को प्रभावित करता है। कई मामलों में संक्रमण के एक-दो दिन के भीतर मरीज की हालत गंभीर हो सकती है। इस संक्रमण की शुरुआत साधारण बुखार और सिरदर्द से होती है।

कुछ मरीजों में वायरस तेजी से मस्तिष्क तक पहुंचकर एक्यूट एन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी दिमाग में सूजन पैदा कर सकता है। समय पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा भी साबित हो सकता है।
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छोटे बच्चों में चांदीपुरा वायरस का खतरा - फोटो : Adobe Stock
चांदीपुरा वायरस के बारे में जान लीजिए

चांदीपुरा, रैबडोविरिडे फैमिली का एक वायरस है। इसकी पहचान सबसे पहले 1965 में महाराष्ट्र के चांदीपुर गांव में हुई थी। यह वायरस मुख्य रूप से बच्चों को प्रभावित करता है और इससे  अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम होने का खतरा बढ़ जाता है। मच्छरों, टिक्स और कुछ प्रकार की मक्खियों के काटने से इसका संक्रमण फैलता है।
 
  • इस वायरस से संक्रमण के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे हो सकते हैं। हालांकि धीरे-धीरे मरीज को अचानक तेज बुखार, सिरदर्द, शरीर दर्द और कमजोरी महसूस हो सकती है। 
  • कुछ घंटों या एक-दो दिन के भीतर कई बच्चों में उल्टी, अत्यधिक सुस्ती, चिड़चिड़ापन, दौरे, भ्रम और बेहोशी जैसे लक्षण विकसित हो सकते हैं।
  • यदि वायरस मस्तिष्क को प्रभावित करता है तो इससे ब्रेन में सूजन होने का खतरा बढ़ जाता है।

मानसून के दिनों में बढ़ जाता है खतरा

मेडिकल रिपोर्ट्स के मुताबिक मानसून के मौसम में चंदीपुरा वायरस  का प्रकोप सबसे ज्यादा देखा जाता रहा है। इन दिनों में नमी बढ़ने से फ्लेबोटोमाइन सैंडफ्लाई के पनपने का खतरा काफी बढ़ जाता है। मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में खतरा अधिक होता है, जहां लोग और मवेशी एक-दूसरे के नजदीक रहते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, चांदीपुरा वायरस के खतरे को कम करने के लिए साफ-सफाई, कचरे का उचित निस्तारण और कीट नियंत्रण महत्वपूर्ण माना जाता है। जिन इलाकों में पहले इस वायरस के मामले सामने आ चुके हैं, वहां लोगों को और अलर्ट रहना चाहिए।
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चांदीपुरा वायरस से बचाव के लिए क्या करें? - फोटो : Freepik.com
कैसे करें चांदीपुरा वायरस से बचाव

चांदीपुरा वायरस के लिए अभी कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है, इसलिए बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय है।
 
  • बच्चों को कीटों के काटने से बचाने के लिए पूरी बाजू के कपड़े पहनाने और सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करने की सलाह दी जाती है।
  • इसके अलावा घर के आसपास साफ-सफाई रखें और कीटरोधी का उपयोग करें।

सबसे बड़ा खतरा छोटे बच्चों को माना जाता है क्योंकि उनमें संक्रमण तेजी से गंभीर रूप ले सकता है। यदि तेज बुखार के साथ दौरे, उल्टी, बेहोशी या अत्यधिक सुस्ती दिखाई दे तो तुरंत अस्पताल पहुंचना चाहिए। समय पर चिकित्सा मिलने से जान बचने की संभावना बढ़ जाती है।




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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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