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Chandipura Alert: चांदीपुरा वायरस का सबसे ज्यादा खतरा बच्चों में, जानिए संक्रमण हो जाए तो तुरंत क्या करें?

Fri, 07 Aug 2026 09:21 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मानसून के दौरान भारत में चांदीपुरा वायरस फिर चिंता का कारण बन रहा है। जानिए यह वायरस इतना खतरनाक क्यों है, यह कैसे फैलता है, बच्चों को ज्यादा क्यों प्रभावित करता है?
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चांदीपुरा वायरस का बढ़ता खतरा - फोटो : Amarujala.com/AI
पिछले कुछ महीनों में देश के कई राज्यों में चांदीपुरा वायरस के संक्रमण की खबरों ने हड़कंप मचाया हुआ है। हाल ही में गुजरात में चांदीपुरा संक्रमण से करीब 22 बच्चों की मौत ने एक बार फिर लोगों को अलर्ट कर दिया है। अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने जुलाई के आखिरी हफ्तों में राजस्थान के डूंगरपुर और सिरोही जिले बच्चों की मौत की जानकारी दी थी। इससे पहले जुलाई के शुरुआती दिनों में भी गुजरात में संक्रमण के मामले और तीन बच्चों की मौत की खबरें सामने आई थीं।

गौरतलब है कि चांदीपुरा कोई नया वायरस नहीं है, इसकी पहचान पहली बार 1965 में महाराष्ट्र में हुई थी। गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और पश्चिमी व मध्य भारत के कई राज्यों में समय-समय पर इसके मामले रिपोर्ट किए जाते रहे हैं। यह वायरस मुख्य रूप से संक्रमित सैंडफ्लाई (मक्खी) के काटने से फैलता है।

बारिश के मौसम में अधिक नमी और गंदगी के कारण सैंडफ्लाई के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण बन जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी वजह से मानसून के दिनों में इस संक्रमण के मामले काफी ज्यादा देखे जाते रहे हैं।

आइए जानते हैं कि अगर किसी को चांदीपुरा का संक्रमण हो जाए तो उसे क्या करना चाहिए?
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क्या मानसून में बढ़ जाता है चांदीपुरा वायरस का खतरा? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
चांदीपुरा संक्रमण हो सकता है खतरनाक

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, चांदीपुरा से बच्चों को सबसे ज्यादा खतरा रहता है, गंभीर स्थितियों में ये मस्तिष्क में सूजन (एन्सेफलाइटिस) का खतरा बढ़ाने वाला हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने प्रभावित क्षेत्रों में सभी लोगों को इस संक्रमण को लेकर सावधानी बरतते रहने की सलाह दी है।
 
  • संक्रमित कीट के काटने के बाद वायरस शरीर में प्रवेश करता है और तेजी से बढ़ सकता है। 
  • संक्रमण के कारण दिमाग में सूजन आने से सांस लेने और शरीर के अन्य महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित हो सकते हैं। 
  • यदि समय पर इलाज न मिले तो मौत का जोखिम भी बढ़ सकता है, इसलिए इसे मेडिकल इमरजेंसी माना जाता है।
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चांदीपुरा का खतरा - फोटो : Freepik.com
बच्चे क्यों होते हैं सबसे ज्यादा शिकार?

इंटेंसिव केयर के डॉक्टर विक्रम सिंह कहते हैं, कच्चे मकान जिनकी दीवारों में दरारें हों, घरों के आसपास जमा कचरा, घर के बिल्कुल पास पशुओं को रखना और साफ-सफाई की व्यवस्था में कमी चांदीपुरा वायरस के संक्रमण का खतरा बढ़ा देते हैं। जब तक इन पर्यावरणीय परिस्थितियों में सुधार नहीं होगा, तब तक मानसून के दौरान इस वायरस के मौसमी प्रकोप सामने आते रहेंगे।
 
  • चांदीपुरा संक्रमण मुख्य रूप से बच्चों को अधिक प्रभावित करता है।
  • बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली पूरी तरह विकसित नहीं होती। इसलिए वायरस उनके शरीर में तेजी से बढ़ता है और गंभीर संक्रमण पैदा कर सकता है।
  • इसके अलावा, बच्चे वयस्कों की तुलना में अधिक समय बाहर खेलते हैं, जिससे उनके सैंडफ्लाई के संपर्क में आने की आशंका बढ़ जाती है। 
  • कुपोषण, भीड़भाड़ वाले घरों में रहना और समय पर चिकित्सा सुविधा न मिल पाना भी कई प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों में गंभीर बीमारी का खतरा और अधिक बढ़ा देता है।

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छोटे बच्चों को बुखार होना - फोटो : Adobe Stock
कैसे जानें आपको चांदीपुरा वायरस का संक्रमण तो नहीं हुआ?

डॉक्टर कहते हैं, शुरुआत में चांदीपुरा वायरस के लक्षण सामान्य वायरल संक्रमण जैसे दिखाई देते हैं। मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, कमजोरी और उल्टी की शिकायत हो सकती है। लेकिन समय के साथ जब वायरस मस्तिष्क को प्रभावित करने लगे तो बीमारी अचानक गंभीर हो सकती है।
 
  • इस स्थिति में मरीजों को तेज बुखार के साथ-साथ बार-बार उल्टी, सिरदर्द, दौरे पड़ने और बेहोशी, भ्रम-सुस्ती और शरीर में अकड़न जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।
  • यदि बच्चे को तेज बुखार के साथ दौरे पड़ें या वह बार-बार बेहोश होने लगे तो इसे सामान्य वायरल बुखार समझकर घर पर इलाज नहीं करना चाहिए। यह मेडिकल इमरजेंसी हो सकती है।
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चांदीपुरा के कारण जोखिम - फोटो : Adobe stock
संक्रमण हो जाए तो क्या करें?

यदि किसी बच्चे या व्यक्ति में चांदीपुरा वायरस जैसे लक्षण दिखाई दें तो उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाएं। चूंकि इस संक्रमण के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है इसलिए डॉक्टर लक्षणों और संक्रमण के कारण होने वाली जटिलताओं को ठीक करने का प्रयास करते हैं।
 
  • मरीज की सांस, ब्लड प्रेशर, शरीर में पानी की मात्रा और मस्तिष्क की स्थिति की लगातार निगरानी की जाती है। 
  • समय पर अस्पताल पहुंचना जटिलताओं और संक्रमण के कारण मौत के जोखिम को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।
  • डॉक्टर कहते हैं संक्रमण के खतरे को कम करने के लिए सैंडफ्लाई और अन्य कीटों से बचाव के उपाय करते रहना बहुत जरूरी है।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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