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इन कारणों से भारतीयों को सबसे अधिक होता है मुंह और गले का कैंसर, न करें नजरअंदाज 

Sat, 17 Apr 2021 10:13 PM IST
तेजस्वी मेहता लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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30-40 प्रतिशत कैंसर मुंह और गले के हैं - फोटो : pixa

Medically Reviewed by Dr. Devavrat Arya
डॉ देवव्रत आर्य

एसोसिएट डायरेक्टर, मेडिकल ऑन्कोलॉजी 

मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, साकेत, नई दिल्ली

डिग्री- एम.बी.बी.एस, एम.डी, डी.एम

साल 2018 में भारत में पुरुषों में मुंह और होंठ का कैंसर सबसे आम कैंसर था। भारत में सभी प्रकार के कैंसरों में 30-40 प्रतिशत कैंसर मुंह और गले के हैं। पूरे विश्व में हर साल मुंह के कैंसर के मामले सबसे ज्यादा भारत में पाये जाते हैं। मुंह और गले के कैंसर के कई बार व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार होता है लेकिन कई बार इसके कई अन्य कारण भी होते हैं। यह तो तय बात है मुंह और गले के कैंसर की बढ़ती रफ्तार को देखते हुए उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। भारत में मुंह तथा गले के कैंसर के मामलों को बढ़ाने में जोखिम के ये कारक होते हैं। 

 

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85 प्रतिशत मुंह और गले के कैंसर मुख्यत: तंबाकू से जुड़े होते हैं - फोटो : Social media

तंबाकू 
धूम्रपान करना और तंबाकू संबंधी अन्य उत्पादों का इस्तेमाल करना मुंह और गले के कैंसर के लिये खतरे के मुख्य कारक होते हैं। लगभग 85 प्रतिशत मुंह और गले के कैंसर मुख्यत: तंबाकू से जुड़े होते हैं। साथ ही सेकंड हैंड स्मोक के संपर्क में आने वाले लोगों को मुंह और गले के कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा होता है। 

शराब
ज्यादा मात्रा में नियमित रूप से शराब पीने से मुंह, ग्रसनी और स्वरयंत्र संबंधी कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। शराब के साथ तंबाकू का सेवन करने से खतरा कई गुना बढ़ जाता है। 

 

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मुंह और गले के कैंसर को बढ़ने में कई साल लग जाते हैं - फोटो : social media

उम्र
ज्यादातर मुंह और गले के कैंसर को बढ़ने में कई साल लग जाते हैं, इसलिये इस प्रकार का कैंसर युवाओं में ज्यादा नहीं पाया जाता है। 40 साल से अधिक उम्र के लोगों को मुंह और गले का कैंसर होने का खतरा ज्यादा रहता है। 

लिंग
वैसे तो हर साल महिलाओं में मुंह और गले के कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन पुरुषों में महिलाओं की तुलना में मुंह और गले के कैंसर का खतरा 2 से 3 गुना ज्यादा होता है। 

 

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अल्ट्रावॉयलेट किरणों के संपर्क में आने से मुंह और गले के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है - फोटो : सोशल मीडिया

यूवी किरणों के संपर्क में आना
लंबे समय तक अल्ट्रावॉयलेट किरणों के संपर्क में आने से मुंह और गले के आस-पास की त्वचा तथा होंठ के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। 

ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी)
एचपीवी इंफेक्शन और ऑरोफैरिंगियल कैंसर, हाइपोफैरिंक्स और टॉन्सिल के कैंसर का खतरा आपस में काफी करीब से जुड़े हुए हैं। इससे स्वरयंत्र के कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है। 

 

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मुंह और दांतों की साफ-सफाई का पूरा ध्यान नहीं रखते हैं - फोटो : Pixabay

मुंह की सही साफ-सफाई ना रखना
जो लोग अपने मुंह और दांतों की साफ-सफाई का पूरा ध्यान नहीं रखते हैं, उन्हें मुंह के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। 

काम से जुड़े खतरे
लकड़ी के कण, पेंट के फ्यूम, कुछ खास प्रकार के केमिकल और एस्बेस्टस का सांस द्वारा अंदर लेने पर मुंह और गले के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। 

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मुंह और गले के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है - फोटो : social media

पोषण का अभाव
विटामिन ए और बी की कमी से मुंह और गले के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। 

अनुवांशिक परेशानियां
कुछ खास प्रकार के जेनेटिक सिंड्रोम जैसे डिस्केरटोसिस कॉन्जेनाइटा और फैनकोनी एनीमिया की वजह से गले और हाइपोफैरिंगियल कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। 

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पेट का एसिड ग्रास नली तक पहुंच जाता है - फोटो : सोशल मीडिया

गैस्ट्रोइंटेस्टइानल रिफ्लक्स डिसीज (जीईआरडी)
जीईआरडी के कारण पेट का एसिड ग्रास नली तक पहुंच जाता है। जिन लोगों को जीईआरडी की समस्या है उन्हें स्वरयंत्र और हाइपोफैरिंगियल कैंसर होने की आशंका रहती है। 

एपेस्टिन-बार वायरस (ईबीवी) इंफेक्शन
ईबीवी के संपर्क में आने से ग्रंथियों का बुखार हो जाता है, जिससे कि नेसोफैरिंगियल कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। 

 

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सूर्य की किरणों से बचाव के लिये सनस्क्रीन का प्रयोग करें - फोटो : अमर उजाला

निम्नलिखित बातों का ध्यान रखने से मुंह तथा  गले के कैंसर के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है: 

-किसी भी प्रकार के तंबाकू वाले उत्पादों का प्रयोग ना करें
-शराब का सेवन ना करें 
-सुरक्षित यौन संबंध बनायें तथा एचपीवी इंफेक्शन से बचे
-एचपीवी वैक्सीनेशन लेकर एचपीवी इंफेक्शन से दूर रहें 
-लंबे समय तक सूरज की रोशनी में जाने से बचें 
-हानिकारक धुएं तथा धूल-मिट्टी से बचने के लिये सुरक्षा मास्क लगायें 
-कहीं बाहर निकलने पर सूर्य की किरणों से पर्याप्त बचाव के लिये ऐसे सनस्क्रीन का प्रयोग करें, जिसमें सन प्रोटेक्शन फैक्टर (एसपीएफ) हो। 

नोट- यह लेख मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के एसोसिएट डायरेक्टर, मेडिकल ऑन्कोलॉजी डॉक्टर देवव्रत आर्य से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। डॉक्टर देवव्रत आर्य को इस क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने अपनी डिग्रियां मौलाना आजाद कॉलेज,दिल्ली यूनिवर्सिटी, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, सूरत एवं गुजरात कैंसर एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, बी.जे मेडिकल कॉलेज, अहमदाबाद से ली है।

अस्वीकरण- अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित अस्वीकरण- बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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