प्रतीकात्मक तस्वीर
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बाइपोलर और आत्महत्या का ख्याल
बच्चे जब किशोरावस्था में पहुंच रहे होते हैं तो हॉर्मोन्स में हो रहे बदलाव की वजह से उनके मूड में भी बदलाव होने लगते हैं। जैसे, वो किसी भी बात पर चिढ़ जाते है, नाराज या गुस्सा हो जाते हैं, लेकिन ऐसी स्थिति लंबे समय तक नहीं बनी रहती। ऐसे मामले 'सायक्लोथायमिक डिसऑर्डर' में आते हैं, जहां किसी भी तरह का भाव चाहे वो गुस्सा हो या उदासी, वो माइल्ड (कम) होता है। ऐसा आमतौर पर किशोरावस्था में देखा जाता है और इसे नजरअंदाज किया जा सकता है। लेकिन अगर किसी बच्चे में बाइपोलर डिसऑर्डर होता है तो वो 'क्लासिकल मेनिया' या डिप्रेशन के तौर पर आता है।
इसमें लंबे समय तक उदासी, बहुत गुस्सा होना, आक्रामकता, नींद की जरूरत महसूस न होना, जरूरत से ज्यादा बातें या खर्च करना और सेक्शुअल कॉन्टेन्ट से सामान्य से ज्यादा आकर्षित होना शामिल है। अगर ऐसे लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा समय तक चलते हैं तो बाइपोलर की आशंका हो सकती है।