डीपीटी वैक्सीनेशन से दूर होता है खतरा
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कैसे फैलती है ये बीमारी?
संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या नजदीकी संपर्क में आने से ये संक्रमण फैलता है। कुछ मामलों में यह त्वचा को भी प्रभावित कर सकता है, जिसमें घाव और संक्रमण हो जाता है।
- जिन लोगों का टीकाकरण (डीपीटी वैक्सीनेशन) पूरा नहीं हुआ है, उनमें इस बीमारी का खतरा ज्यादा होता है।
- छोटे बच्चे, बुजुर्ग और कमजोर इम्युनिटी वाले लोग इस तरह के संपर्क के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
- भीड़भाड़ वाले इलाकों, खराब स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी वाले क्षेत्रों में यह बीमारी तेजी से फैल सकती है।
क्या है इसकी पहचान और बचाव के तरीके
डिप्थीरिया के लक्षण आमतौर पर संक्रमण के 2 से 5 दिनों के भीतर दिखाई देने लगते हैं। शुरुआत में ये सामान्य सर्दी-खांसी जैसा लगता है जिसमें गले में खराश, बुखार, कमजोरी और सिरदर्द की समस्या होती है।
- बीमारी बढ़ने पर गले में एक मोटी परत बन जाती है, जो सांस लेने और निगलने में कठिनाई पैदा करती है।
- इसके अलावा गर्दन में सूजन, आवाज बैठने और सांस फूलने की भी दिक्कत हो सकती हैं।
- गंभीर मामलों में बैक्टीरिया दिल की मांसपेशियों को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे दिल की धड़कन अनियमित हो सकती है।
- नर्वस सिस्टम पर असर पड़ने से लकवा जैसी स्थिति भी हो सकती है।
डिप्थीरिया से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका टीकाकरण है। बच्चों को डीपीटी (डिप्थीरिया, पर्टुसिस और टेटनस) वैक्सीन समय पर लगवाना बेहद जरूरी है। यह वैक्सीन शरीर को इस संक्रमण से लड़ने की ताकत देती है। अगर किसी में डिप्थीरिया के लक्षण दिखाई दें, तो उससे दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है। विशेषज्ञों ने ऑस्ट्रेलिया में प्रकोप को देखते हुए भारत में भी लोगों को अलर्ट किया है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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