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Health Alert: नाम और काम भूलना हो गया है आम? रिसर्च ने खोला दिमाग को डिस्टर्ब करने वाली समस्या का राज

Tue, 17 Mar 2026 08:15 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

वायु प्रदूषण अब सिर्फ फेफड़ों और दिल की बीमारी का मसला नहीं रहा, बल्कि यह सीधे दिमाग को नुकसान पहुंचा रहा है। इससे लोगों में याददाश्त से संबंधित समस्याएं भी बढ़ने लगी हैं।
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याददाश्त कमजोर होने की समस्या - फोटो : Adobe stock
क्या आपको भी छोटी-छोटी चीजें भूलने लगी हैं, लोगों का नाम-रोजाना के काम तक भी याद नहीं रहते? अगर हां, तो ये चेतावनी है कि आपको अलर्ट हो जाना चाहिए। लाइफस्टाइल और खान-पान की गड़बड़ी ने ब्रेन हेल्थ को तो काफी नुकसान पहुंचाया ही है साथ ही अब विशेषज्ञ इन बढ़ती समस्याओं के लिए पर्यावरणीय कारकों को भी जिम्मेदार मान रहे हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि जिस तरह से हाल के दशकों में हवा की गुणवत्ता खराब होती गई है, वायु प्रदूषण और हवा में पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्मकणों की मात्रा बढ़ती जा रही है इसका लोगों की सेहत पर कई तरह से नकारात्मक असर देखा जा रहा है। मस्तिष्क की सेहत के लिए बढ़ते प्रदूषण को और भी खतरनाक पाया गया है।

जर्नल प्लस मेडिसिन में प्रकाशित इससे संबंधित एक रिपोर्ट से पता चला है कि बढ़ता वायु प्रदूषण न सिर्फ लोगों की याददाश्त छीन रहा है साथ ही अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों का खतरा भी बढ़ाता जा रहा है। जिन इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) लगातार खराब रहता है वहां के लोगों में इस तरह की समस्याओं का खतरा सबसे ज्यादा देखा जा रहा है।
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वायु प्रदूषण और इसका खतरा - फोटो : Freepik.com
प्रदूषण से फेफड़ों के साथ दिमाग को भी खतरा

बढ़ते वायु प्रदूषण को आमतौर पर फेफड़े और सांस से संबंधित बीमारियों को बढ़ाने वाला माना जाता रहा है। हालांकि अब वैज्ञानिकों ने सावधान किया है कि प्रदूषण आपकी याददाश्त क्षमता पर भी बुरी तरह से असर डाल रहा है।
 
  • वायु प्रदूषण एक जटिल पर्यावरणीय कारक के रूप में उभरा है जो श्वसन स्वास्थ्य से कहीं अधिक चीजों को प्रभावित करता है। 
  • वैज्ञानिक अनुसंधान महीन कणों, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और अन्य वायुजनित प्रदूषकों के संपर्क में रहने वाले लोगों में  मानसिक स्वास्थ्य और संज्ञानात्मक समस्याओं के खतरे को लेकर सावधान किया है।
  • अध्ययन में शोधकर्ताओ ने पाया है कि प्रदूषित हवा दिमाग में यादों को स्टोर रखने की क्षमता और विचार एवं व्यवहार से जुड़े तंत्रिका मार्गों को प्रभावित कर रही है।
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भूलने की बीमारी का खतरा - फोटो : Adobe stock photos
याददाश्त से संबंधित दिक्कतों का खतरा

अध्ययनकर्ताओं ने साफ किया है कि वायु प्रदूषण को सिर्फ फेफड़ों की समस्याओं को बढ़ाने वाला नहीं माना जाना चाहिए, इसके साइड-इफेक्ट्स और भी खतरनाक हो सकते हैं। भारत जैसे देश में जहां वायु प्रदूषण बड़ी चुनौती रहा है वहां लोगों की दिमागी सेहत में गड़बड़ी को लेकर विशेष सावधान रहने की सलाह दी गई है। 

वायु प्रदूषण के दिमागी क्षमता और याददाश्त पर असर को समझने के लिए विशेषज्ञों ने व्यापक अध्ययन किया।
 
  • साल 2000 से 2018 के बीच 65 वर्ष से अधिक उम्र के 2.78 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया। 
  • अध्ययन में स्पष्ट संकेत मिले कि जो लोग लंबे समय तक पीएम2.5 के संपर्क में रहे उनमें याददाश्त और संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट देखी गई।

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अल्जाइमर-डिमेंशिया का जोखिम - फोटो : Freepik.com
अल्जाइमर-डिमेंशिया का भी हो सकते हैं शिकार

डब्ल्यूएचओ के अनुसार सालाना औसत पीएम 2.5 का स्तर पांच माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए, जबकि भारत, चीन और अफ्रीका के कई हिस्सों में यह इससे कई गुना ज्यादा है। वायु प्रदूषण से याददाश्त तो कमजोर होता है ही साथ ही लंबे समय में इसके कारण ब्रेन से संबंधित कई अन्य दिक्कतें भी हो सकती हैं।
 
  • जिनका मस्तिष्क पहले से कमजोर था, उनके लिए जहरीली हवा और भी अधिक खतरनाक साबित हो सकती है। 
  • जिन इलाकों में यह अध्ययन किया गया, वहां पीएम 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से लगभग दोगुना था। 
  • यहां रहने वाले लोगों में अल्जाइमर और डिमेंशिया का मामलों में भी तेजी से वृद्धि रिपोर्ट की गई।

 
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प्रदूषण का गर्भवती महिला की सेहत पर असर - फोटो : Adobe Stock Photo
गर्भ में पल रहे शिशु को भी खतरा


वायु प्रदूषण के जोखिम कई तरह से गंभीर हो सकते हैं। अमर उजाला में इससे संबंधित एक रिपोर्ट में हमने बताया था कि बढ़ता प्रदूषण गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी खतरनाक हो सकता है। दूषित माहौल में रहने वाली गर्भवती महिलाओं में समय से पहल प्रसव, जन्म के समय बच्चे का वजन कम होने साथ ही शिशु में हृदय रोगों का खतरा बढ़ने तक का खतरा हो सकता है। 



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स्रोत: 
Air quality improvement and cognitive decline in community-dwelling older women in the United States: A longitudinal cohort study

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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