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Kyasanur Forest Disease: क्या है मंकी फीवर जिसने कर्नाटक में ले ली एक व्यक्ति की जान, कैसे फैलती है ये बीमारी?

Mon, 02 Feb 2026 07:08 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Kyasanur Forest Disease/Monkey Fever: क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज से हाल ही में कर्नाटक में एक व्यक्ति की मौत हो गई। इस बीमारी की सबसे पहले साल 1957 में कर्नाटक के क्यासानूर जंगल क्षेत्र में हुई थी। क्या ये बंदरों के काटने से होती है? या फिर इस रोग की कोई और वजह है, यहां जानिए सबकुछ विस्तार से...
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मंकी फीवर से कर्नाटक में मौत - फोटो : Amarujala.com
दुनियाभर में जिस तरह से संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है, इसको लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ काफी चिंतित हैं। भारत में संक्रामक रोगों का जोखिम और भी ज्यादा देखा जा रहा है। हाल ही में पश्चिम बंगाल और इससे पहले केरल में स्वास्थ्य संकट बना निपाह वायरस हो या फिर ब्रेन ईटिंग अमीबा संक्रमण और बर्ड फ्लू, इन सभी के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव निरंतर बढ़ता जा रहा है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, इनमें से ज्यादातर जूनोटिक बीमारियां होती हैं। जूनोटिक रोग उन संक्रामक बीमारियों को कहा जाता है जो जानवरों से इंसानों में फैलती हैं। अब कर्नाटक में भी ऐसी ही एक बीमारी को लेकर अलर्ट किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कर्नाटक में हाल ही में 29 साल के एक व्यक्ति की क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (केएफडी) से मौत हो गई। इसे आमतौर पर मंकी फीवर के नाम से भी जाना जाता है। इस घटना ने एक ऐसी बीमारी पर फिर से ध्यान खींचा है, जिसके मामले अक्सर तब तक रिपोर्ट नहीं होते जब तक कि ये बहुत बढ़ नहीं जाते और जानलेवा नहीं हो जाते। खबरों के मुताबिक बीती 28 जनवरी को उडुपी जिले के एक अस्पताल में संक्रमित व्यक्ति की मौत हो गई। 

इस मामले के बाद से लोगों के मन में संक्रमण को लेकर कई तरह के सवाल हैं। क्या ये बंदरों के काटने से फैलता है, किन लोगों को इसका खतरा ज्यादा होता है और इससे बचाव को लेकर क्या उपाय किए जाने चाहिए?
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क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज और उसके खतरे - फोटो : Freepik.com
क्या कहते हैं स्वास्थ्य अधिकारी?

क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज के बारे में जानने से पहले कर्नाटक में संक्रमण से हुई मौत के बारे में जान लेते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से, स्वास्थ्य विभाग के कमिश्नर गुरुदत्त हेगड़े ने बताया कि यह एक असामान्य और दुर्भाग्यपूर्ण मामला है। आमतौर पर अगर वायरस के संपर्क में आने के एक हफ्ते के अंदर संक्रमण का पता चल जाता है और रोगी को इलाज मिल जाए तो इससे मौत का खतरा काफी कम हो जाता है। हालांकि  इस मामले में, लक्षण सामने आने के तुरंत बाद उसे भर्ती कराया गया और एक दिन के अंदर संक्रमण की पुष्टि हो गई। कुछ दिन पहले तक उसकी हालत स्थिर थी, फिर भी जटिलताओं के कारण व्यक्ति की मौत हो गई। 

साल 2024 में कर्नाटक में मंकी फीवर संक्रमण के 100 से ज्यादा मामले रिपोर्ट किए गए थे।
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मंकी फीवर के बारे में जानिए - फोटो : Adobe Stock Photo
मंकी फीवर के बारे में जानिए

क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज को मंकी फीवर भी कहते हैं। अपने नाम के बावजूद ये सीधे बंदरों से इंसानों में नहीं फैलता है।
 
  • यह बुखार हेमोफाइसालिस स्पिनिगेरा नाम के एक जंगल के कीड़े के काटने से होता है। ये कीट बंदरों के शरीर में हो सकते हैं।
  • बीमार या मरे हुए संक्रमित बंदरों के संपर्क में आने से इसके फैलने का खतरा रहता है।
  • संक्रमित व्यक्ति से दूसरों में इसके फैलने का खतरा नहीं होता है।

स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक इस मंकी फीवर के मामले आमतौर पर अक्तूबर या नवंबर में शुरू होते हैं और जनवरी से अप्रैल के बीच चरम पर होते हैं।


(ये भी पढ़िए-  देश की 70% आबादी में इस जरूरी विटामिन की कमी, आप भी तो नहीं हैं शिकार?)

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मंकी फीवर और इसके कारण होने वाली समस्या - फोटो : Adobe Stock
कैसे फैलती है ये बीमारी और क्या हैं लक्षण?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक जंगली इलाकों में रहने वाले लोग, जहां पर बंदरों की आबादी अधिक होती है वहां पर इसके संक्रमण के फैलने का खतरा अधिक हो सकता है।
 
  • मंकी फीवर की समस्या में अचानक से बुखार और अन्य लक्षण शुरू हो सकते हैं। शुरुआत की स्थिति में बुखार के साथ, ठंड लगने, सिरदर्द और गंभीर थकावट की समस्या हो सकती है। 
  • जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है इसके लक्षणों में मतली, उल्टी, पेट दर्द, दस्त, भ्रम की समस्या का खतरा भी हो सकता है। 
  • कुछ स्थितियों में इसके कारण रक्तस्राव की दिक्कत जैसे नाक और मसूड़ों से खून आने का खतरा रहता है।
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संक्रमण से बचाव के लिए वैक्सीन - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
इससे बचाव के लिए क्या किया जाना चाहिए?

मंकी फीवर के लिए कोई खास इलाज उपलब्ध नहीं है। इसके लक्षणों को कम करने के लिए दवाएं और मेडिकल सपोर्ट दिया जाता है। 
  • अच्छी बात ये है कि संक्रमण के खतरे को कम करने के लिए वैक्सीन उपलब्ध है। कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों जैसे जहां इस संक्रमण के मामले ज्यादा होते हैं वहां लोगों को इसकी सलाह दी जाती है। 
  • स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बीमारी की रोकथाम के लिए जंगल वाले इलाकों में जाते समय शरीर को पूरी तरह से ढकने वाले कपड़े पहनने की सलाह दी जाती है।
  • टिक-रिपेलेंट स्प्रे या क्रीम का इस्तेमाल करें, जिससे कीड़े न काटने पाएं। बीमार या मरे हुए बंदरों को छूने से बचें।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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