अब पेरेंट्स के लिए और जरूरी हो गया है कि स्कूल से लौटकर आने पर बच्चों से बात करें। सब कुछ कहें और सुनें। कोई अनहोनी होने से पहले स्थिति को समझने की कोशिश करें। यह संवाद आपको न सिर्फ बच्चे के करीब ले आएगा, बल्कि आप स्कूल के बारे में भी बहुत कुछ जान सकेंगी, इसलिए स्कूल से लौटने पर बच्चों से सवाल कीजिए और जानिये कि उनका दिन कैसा बीता? हां, यह ख्याल रहे कि बच्चों से सवाल करने का ढंग सही हो।
इस आपसी बातचीत में पॉजिटिव रहते हुए उनसे वह सब जानें, जो वे स्कूल में एकेडेमिक ही नहीं, पर्सनल फ्रंट पर भी फेस कर रहे हैं। स्कूल से लौटने के बाद बच्चों के मन को टटोलना वाकई जरूरी है। यह आज के समय की दरकार भी है और आपकी जिम्मेदारी भी कि आप बिना झिझक उनसे दिनभर के शेड्यूल के बारे में पूछें। वॉशरूम जाने से लेकर लाइब्रेरी विजिट तक, हर बात के बारे में पूछिए। क्लासरूम की मस्ती से लेकर खेल के मैदान तक, जो भी हुआ वो जानिए।
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कभी खुद से हुई गलती के डर से, तो कभी बिना वजह मिली डांट के कारण, बच्चे पेरेंट्स से कई बातें छुपाते हैं। घर में भी डांट पड़ने और आपके नाराज होने के डर से सब कुछ नहीं बताते। ऐसे में आप खुद दिनभर की बातें समेटिए और उनसे बात कीजिए। स्कूल में यह समय कैसे बीता, यह जानना आपको कई स्तर पर मदद कर सकता है। इससे बच्चों के समुचित विकास से लेकर उनकी सुरक्षा तक, सारी बातें जुड़ी हैं। अगर पेरेंट्स वर्किंग हैं, तो शाम को कुछ समय ऐसी बातों को जरूर दें। घर बड़े-बुजुर्ग भी बच्चों के मन की बातें जानने की कोशिश करें।
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उनकी बातें मन से सुनें
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बच्चों के लौटने के बाद उन पर ध्यान दीजिए। याद रखें, बच्चे अपना मन तभी खोलते हैं, जब उन्हें लगने लगता कि उनकी बातें सुनी जा रही हैं। नकारात्मक सवालों की झड़ी लगाने की बजाय आप उनकी बात सुनकर सही हल सुझाएंगी, यह भरोसा उनके मन में जगाना जरूरी है। ऐसा हुआ तो वे खुद आपको अपने मन की बात कहने लगेंगे। अक्सर अभिभावकों का उपेक्षा भरा व्यवहार देखकर बच्चे अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार को घर पर नहीं बताते हैं। यही बातें आगे चलकर उनके लिए बड़ा खतरा बन जाती है, इसलिए उनके मन की सुनते हुए ही आप ऐसा कुछ जान पाएंगी, जो या तो आपको चेता देगा या यह भरोसा दिलाएगा कि स्कूल परिसर में बच्चा खुश और सुरक्षित है।
पढ़ाई से इतर भी हैं बातें
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आजकल पेरेंट्स बच्चों को लेकर काफी सेंसेटिव हो गए हैं। बच्चों से संवाद भी करते हैं, लेकिन अक्सर देखने में आता है कि अभिभावक जो बातें करते हैं, वे पढ़ाई के आसपास ही घूमती हैं। टेस्ट के रिजल्ट्स और सिलेबस पूरा करने की बातों में वह छूट जाता है, जो उनकी सुरक्षा और असली समझ के विकास की दिशा से जुड़ा है, इसलिए आज तुमसे क्या गलती हुई? जैसे सवाल भी करें और किस बात पर तारीफ मिली यह भी पूछें। अपने संवाद को सिर्फ पढ़ाई के मामलों तक सीमित न रखें। पूरी बातचीत एकेडमिक परफॉर्मेंस को लेकर ही होती रहे, तो बच्चे और तनाव में रहने लगते हैं। स्कूल के थकाऊ रूटीन के बाद घर में उनसे कुछ ऐसी बातें हों, जो उन्हें हर हाल में आपके स्नेह और साथ का अहसास करवाएं। बच्चों को महसूस हो कि आपको उनकी चिंता है, इसलिए बातचीत का फोकस सिर्फ पढ़ाई पर न हो।
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दोस्तों के बारे में बात
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- फोटो : अमर उजाला
आज दोस्तों से बात की? किसी दूसरी क्लास के बच्चे से मिले? या क्लासरूम के अलावा स्कूल में कहां और किसके साथ गए? ऐसे सवाल भी अब जरूरी हो गए हैं। बच्चे बहुत छोटी क्लास के हों, तो टीचर्स के अलावा स्कूल स्टाफ के किसी बड़े ने उनसे क्या कहा, यह भी जानें। ऐसे कई मामले इन दिनों सामने आए हैं, जिनमें स्कूल स्टाफ के ही किसी सदस्य ने बच्चे के साथ दुर्व्यवहार किया है। सीनियर स्टूडेंट्स ने भी छोटे बच्चों पर हमले किए हैं। इतना ही कई बार क्लासमेट्स और टीचर्स का व्यवहार भी बच्चों के लिए बहुत तकलीफदेह होता है। इतना ही नहीं कई तरह का गलत व्यवहार और बुरी भाषा भी बच्चे अपने दोस्तों से सीखते हैं। ऐसी संगत उन्हें चाहे-अनचाहे गलत राह पर धकेल देती है। कुछ बच्चे न चाहते हुए भी ऐसे जाल में फंस जाते हैं। लेकिन घर पर जब तक पता चलता है काफी देर हो चुकी होती है। यकीन मानिए बच्चों से स्कूल की ऐसी बातें उनका विश्वास जीतकर ही पता की जा सकती है। इसके लिए उनके साथ रोजाना कम्युनिकेट करना जरूरी है। यह बातचीत हर अभिभावक के शेड्यूल का हिस्सा होनी चाहिए।
पेरेंट्स ये भी करें
⦁ बच्चों का बैग भी चैक करें।
⦁ बहुत छोटे बच्चों के शरीर की भी जांच करें।
⦁ पेरेंट टीचर मीटिंग में अपने बच्चे के बिहेवियर को भी जानें।
⦁ स्कूल के सभी कार्यक्रमों में शामिल हों।
⦁ अपने बच्चे की शिकायत पर भी सतर्क रहें।