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कोरोना वायरस: कुछ इस तरह बदल जाएगी हमारे काम-धाम की दुनिया

Sun, 05 Jul 2020 03:05 PM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक - फोटो : iStock
वर्क फ्रॉम होम के दौरान पूर्वी अपनी निजी और पेशेवर जिंदगी के बीच तालमेल बिठाने के लिए लगातार कोशिश कर रही हैं। वो कहती हैं, "बेशक घर से काम करना मुश्किल है लेकिन मुझे लगता है कि अब धीरे-धीरे इसकी आदत पड़ रही है। मेरा ऑफिस काफी दूर है इसलिए मैं वहां जाकर काम नहीं करना चाहती लेकिन मैं घर से भी काम नहीं करना चाहती। मुझे ठीक से काम करने के लिए जगह बदलने की ज़रूरत है।" पूर्वी ने अब अपने घर के एक कोने को छोटे से ऑफिस में तब्दील कर दिया है। उन्होंने घर में अपना एक डेस्क, प्रिंटर और इंटरनेट कनेक्शन लगवा लिया है। उनका कहना है कि जिंदगी थोड़ी सामान्य होते ही वो एक को-वर्किंग स्पेस में काम करना शुरू कर देंगी।


 
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work from home - फोटो : Pixabay
वर्क फ्रॉम होम
ब्रैंड कंसल्टेंट हरीश बिजूर कहते हैं, "बड़े ऑफिस अब छोटी-छोटी यूनिट्स में तब्दील हो रहे हैं। लोग अब बिना चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों के काम कर रहे हैं और कइयों के लिए ये अहम का मसला बन रहा है।" लॉकडाउन ने लोगों को उनके घरों में बंद कर दिया है। हरीश कहते हैं, "आजकल लोगों को दो मोबाइल फोन रखना पड़ता है-एक ऑफिस के लिए और एक निजी जिंदगी के लिए। लोगों को अब ऑफिस का कोना बनाने के लिए बड़े घरों की जरूरत पड़ रही है। चूंकि अब यहीं न्यू नॉर्मल है इसलिए प्रिंटर और ऑफिस के लिए बाकी जरूरी चीजों की मांग भी बढ़ गई है।"



 
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Table for work from home - फोटो : social media
समीर जोशी नामी फर्नीचर ब्रैंड गोदरेज इंटीरियो में करते हैं। वो कहते हैं कि ज्यादातर भारतीय घर छोटे होते हैं इसलिए उनमें ऑफिस की चीजें रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती। समीर बताते है कि उनकी कंपनी की वेबसाइट पर कुर्सियों के लिए किए जाने वाले सर्च में 140 फीसदी की बढ़त देखी गई और कुर्सियों के बाद लोगों ने जो चीज सबसे ज्यादा बार ढूंढी है वो है-टेबल। यही वजह है कि गोदरेज ऐसे फर्नीचर को बढ़ावा दे रहा है जो घरों में आसानी से एडजस्ट हो सकें। जैसे कि फोल्डेबल (मोड़ी जा सकने वाली) कुर्सियां और मेजें। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्क फ्रॉम होम सिर्फ काम करने वालों के लिए नहीं बल्कि संस्थानों के लिए भी चुनौती है।



 

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Sitel
सिक्योरिटी सर्विस कंपनी सिक्योरटेक (Sequretek) के को-फाउंडर पंकित देसाई कहते हैं, "सबसे बड़ी चुनौती ये सुनिश्चित करने की है लोग बिना किसी ताकाझांकी के काम कर सके। ये ताकाझांकी डेटा के छेड़छाड़ से लेकर किसी अन्य गोपनीय जानकारी के इधर-उधर होने तक हो सकती है। खासकर जब आपके हाथ में किसी और का डाटा हो तो आपको इसकी सुरक्षा का पूरा ख्याल रखना होता है।" फेसबुक और टीसीएस जैसी बड़ी कंपनियों ने पहले से इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया है कि उनका 30-50 फीसदी से ज्यादा स्टाफ दफ्तर न आए। ये व्यवस्था अगर पूरी तरह लागू हो जाती है तो अगले तीन-चार वर्षों में नए कायदे-कानून भी लागू होंगे। यूनिकॉर्न इंडिया वेंचर्स के मैनेजिंग पार्टनर भास्कर मजुमदार कहते हैं, "आने वाले दिनों में एक बड़ा बदलाव ये होने वाला है कि कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को हफ्ते में सिर्फ एक या दो बार आने को कहेंगे और फिर इसी हिसाब से भुगतान करेंगे।"


 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
दफ्तरों में मूल बदलाव
चूंकि अब घर से काम करना न्यू नॉर्मल बन गया है इसलिए कंपनियां अपने स्टाफ को सुरक्षित रखने के लिए दफ्तरों और काम करने की जगहों में कुछ मूलभूत बदलाव कर रही हैं। कम से कम अभी कुछ दिनों के लिए तो दफ्तरों में कोई भी कर्मचारी साथ-साथ या पास में नहीं बैठेंगे। अभी का जो माहौल है वो कोलैबरेटिव जोन्स बनाने के विचार से बिल्कुल उलट है। कोलैबरेटिव जोन्स का मकसद लोगों को साथ लाना है। अब लोगों को साथ लाने के लिए नए डिजिटल टूल्स की जरूरत है न कि ऐसे जोन्स की। अब दफ्तरों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए ज्यादा जगह बनानी होगी। फिजिकल डिस्टेंसिंग के 'छह फीट दूरी' वाले मानक को देखते हुए भी दफ्तरों में ज्यादा जगह की जरूरत पड़ेगी। इसके साथ ही ग्लास और उससे बनी चीजों की मांग बढ़ेगी क्योंकि उन्हें आसानी से साफ और डिसइन्फेक्ट किया जा सकता है। विषाणुरोधी मटीरियल कोटिंग वाली चीजों की मांग भी बढ़ सकती है।

 
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खेती किसानी - फोटो : अमर उजाला
खेती-बाड़ी कैसे होगी?
भारत की 50 फीसदी जनता कृषि और इससे जुड़े क्षेत्र में काम करती है और जीडीपी में 17 फीसदी योगदान देती है। कोरोना वायरस संक्रमण फैलने की वजह से अन्य व्यवसायों की तरह खेती का तौर-तरीका भी हमेशा के लिए बदल रहा है। किसान अब मिट्टी की गुणवत्ता की जांच और खाद खरीदने के लिए तकनीक की मदद लेने लगे हैं। कृषि तकनीक से जुड़ी कंपनी उन्नति के सह-संस्थापक अमित सिन्हा कहते हैं किसानों को ये नई तकनीकें अपनाने में कम से कम तीन साल का वक्त लगता लेकिन कोरोना महामारी की वजह से ये छह-सात महीनों में ही हो गया।


 
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tracktor
भारतीय किसानों के पास आमतौर पर इतने पैसे नहीं होते कि वो महंगी टेक्नॉलॉजी वाली चीजें खरीद सकें। कई किसान उन्हें इस्तेमाल करना भी नहीं जानते। यहीं पर कृषि तकनीक कंपनियों की एंट्री होती है। मिसाल के तौर पर, अगर कोई किसान फसल काटने वाली मशीन किराए पर लेता है तो वो इसे इस्तेमाल करने के लिए वीडियो कॉल के जरिए विशेषज्ञ की मदद ले सकता है। किसान बारिश का अनुमान लगाने के लिए या मिट्टी की गुणवत्ता परखने के लिए भी गैजेट्स उधार ले सकते हैं। एक इलाके में रहने वाले किसान मिलकर ट्रैक्टर किराए पर ले सकते हैं और अपनी जरूरतों के हिसाब से इसे बारी-बारी इस्तेमाल कर सकते हैं। विशेषज्ञ किसानों को ये भी समझा सकते हैं कि वो अच्छी फसल कैसे पैदा करें और मंडी बंद होने की स्थिति में अनाज सीधे कैसे बेचें।

 

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धान की खेती। - फोटो : अमर उजाला।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में खेती भी काफ़ी हद तक तकनीक पर निर्भर होगी क्योंकि ज्यादा से ज्यादा किसान अब ये समझने लगे हैं कि मशीनों की मदद से काम करना इंसानों की मदद से काम करने के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित है। कोरोना महामारी से पहले किसान और उद्यमी अपनी सुविधा के हिसाब से तकनीक का इस्तेमाल कर रहे थे लेकिन अब उन्हें ये अहसास हो गया है कि ये वक्त का तकाजा है। सस्ते डाटा और स्मार्टफोन्स की उपलब्धता ने इस प्रक्रिया में तेजी ला दी है।

 

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
नौकरियां बदलेंगे लोग?
दुनिया भर की कंपनियां अब नए बिजनेस मॉडल तलाश रहे हैं। कोरोना के बाद दुनिया में कुछ नौकरियां अपने-आप खत्म हो जाएंगी तो कुछ नई नौकरियां जन्म लेंगी। साल 2017 में मैकिन्सी ग्लोबल इन्स्टीट्यूट ने अनुमान लगाया था कि बदलती दुनिया में आधुनिक मशीनों की अधिकता की वजह से साल 2030 तक लगभग 14 फीसदी लोगों को अपनी नौकरियां बदलनी पड़ेंगी। अब महामारी की वजह से ये और ज्यादा जरूरी हो गया है।

 

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शोध करते वैज्ञानिक - फोटो : अमर उजाला
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दिनों में फ्रीलांस काम के प्रति लोगों का नजरिया बदल जाएगा। फ्रीलांस और शॉर्ट टर्म पर नौकरियों की अधिकता वाली अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। 'शेफ ऑन कॉल' जैसी चीजें सच्चाई में तब्दील हो जाएंगी क्योंकि लोग रेस्तरां जाने से तो बचेंगे लेकिन रेस्तरां के जायके वाले खाने को अपनी रसोई में बनवाना चाहेंगे। ऐसी नौकरियां जिनमें आपको ग्राहकों के साथ काम करना पड़ता है, जैसे सैलून और ब्यूटी पार्लर, घर के काम और साफ-सफाई, फिजियो थेरेपिस्ट, जिम ट्रेनर, कोरियोग्राफर और अभिनेताओं के काम को पहले से ही असुरक्षित माना जा रहा है। कई नौकरियां अब डिजिटल मोड में भी जा रही हैं। मिसाल के तौर पर, योग, डांस और संगीत के ट्रेनर लाइव स्ट्रीमिंग और वीडियो क्लास के जरिए अपना काम कर रहे हैं। एचआर के पेशे में काम करने वाले कुछ लोगों का कहना है कि क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और साइबर सिक्योरिटी जैसी स्किल्स की जानकारी वाले इंजीनियर, डाटा एनालिस्ट और डाटा वैज्ञानिकों की ज्यादा जरूरत पड़ेगी। नौकरियों में ऐसे लोगों की जरूरत पड़ेगी जो भावनात्मक रूप से मजबूत हों और दबाव में काम कर सकें।


 

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सांकेतिक तस्वीर
रोबोटिक्स और ऑटोमेशन
भारत रोबोटिक्स के क्षेत्र में साल 2011 से ही काम कर रही है और महामारी ने इसकी जरूरत को और ज्यादा बढ़ा दिया है। होटल, मॉल, हॉस्पिटल और घरों में ऐसे रोबोट्स की जरूरत है जो खिड़की-दरवाजे साफ करने और लॉन की छंटाई करने जैसे काम कर सकें। मिलग्रो रोबोट्स के संस्थापक राजीव करवाल कहते हैं, "उनके हालिया मिलग्रो आईमैप 9 और ह्यूमनॉइड ईएलएफ को दिल्ली के एम्स में फर्श डिसइन्फेक्ट करने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने फोर्टिस, अपोलो और मैक्स अस्पतालों को भी रोबोट दिए हैं। कई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां तो अपना पूरा सेटअप ऑटोमेटिक बना रही हैं ताकि उनका स्टाफ छोटे-मोटे काम मशीनों से करवा सके और ख़ुद ज्यादा महत्वपूर्ण काम करे। यहां तक कि रियल एस्टेट के ब्रोकर भी रिहायशी और कॉमर्शियल प्रॉपर्टी ग्राहकों को दिखाने के लिए ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल करने लगे हैं।

 
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सांकेतिक तस्वीर
निगरानी
भारत में वर्क फ्रॉम होम को शायद ही कोई अच्छा विकल्प मानता था। ज्यादातर मैनेजरों का मानना है कि कर्मचारियों को बेहतर काम करने के लिए देर तक दफ्तर में रहना जरूरी है। यही वजह है कि कोरोना के दौर में मैनेजर और उनकी टीम के बीच के भरोसे की परीक्षा हो रही है। रिसर्च कंपनी गार्टनर के अनुसार लगभग 74 फीसदी सीएफओ (चीफ फाइनैंशियल ऑफिसर) का मानना है कि महामारी खत्म होने के बाद भी कुछ कर्मचारियों को घर से ही काम करना पड़ेगा। अपने स्टाफ पर नजर रखने के लिए कंपनियां अब मोबाइल डिवाइस मैनेजमेंट (MDM) जैसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रही हैं। साइबर सिक्योरिटी फर्म इन्फीसेक के सीईओ विनोद सेंतिल ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बताया था कि एमडीएम में एक ऐसा प्री-बिल्ट ट्रैकिंग मैकेनिज्म होता है जो डाटा एक्सेस कर सकता, लैपटॉप की स्क्रीन देख सकता है और दूर बैठे व्यक्ति के सिस्टम में मौजूद संवेदनशील जानकारी को डिलीट कर सकता है। साइबर सिक्योरिटी कंपनी क्रॉसओवर के पास एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जिसके जरिए मैनेजर, घर से काम कर रहे स्टाफ के कीबोर्ड की ऐक्टिविटी और ऐप के इस्तेमाल पर नजर रख सकते हैं। इस सॉफ्टवेयर से हर 10 मिनट में ऐसी रिपोर्ट बनती है जिससे स्टाफ के एक्टिविटी की वेबकैम फोटो भी होती है। वर्कऐनेलिटिक्स, डेस्ट्रैक, आईमॉनिट और टेरामाइंड जैसी कंपनियों ने भी ऐसे सॉफ़्टवेयर की मांग में बढ़त दर्ज की है। एक आईटी पेशेवर ने नाम जाहिर न किए जाने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "मेरे मैनेजर को ये तक पता होता है कि मैं कितनी बार वॉशरूम गया। मैं इन सबसे सहज नहीं हूं। ये कुछ ज्यादा ही है।" कुछ कंपनियां अपने स्टाफ को काम के दौरान वेब कैमरा ऑन रखने को कहती हैं जो निजता का उल्लंघन है। हालांकि कुल मिलाकर लोगों ने इस न्यू नॉर्मल के साथ जीना सीख लिया है।
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