कश्मीर घाटी की तस्वीर बदलने लगी है। अलगाववादियों और उपद्रवियों द्वारा पत्थरबाजी के लिए इस्तेमाल किए जाते रहे बच्चे अब परीक्षा कक्षों की ओर मुखातिब हैं। बच्चों ने अपनी बदनाम छवि को धत्ता बता दिया है। हिंसा के कारण स्कूल चार महीनों तक बंद रहे। उपद्रवियों ने कई स्कूल जला दिए। पर बावजूद इसके तालीम हासिल करने के जज्बे को कुचला नहीं जा सका।
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परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने को परीक्षार्थियों को वाहन नहीं मिल रहे। पर इससे भी उनका जोश कम नहीं हुआ और 99 फीसदी बच्चे परीक्षा देने पहुंच रहे हैं। यह अब तक का रिकार्ड है। तुलनात्मक दृष्टि से अमन के माहौल के दौरान भी परीक्षाओं में ऐसी भागीदारी नहीं रही है।
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12वीं की परीक्षाओं में 94.53 फीसदी की उपस्थिति के रिकार्ड को 10वीं के परीक्षार्थियों ने तोड़ दिया। 10वीं की परीक्षाओं में 99 फीसदी से अधिक छात्र-छात्राएं शामिल हुए। आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद सबसे अशांत रहे दक्षिणी कश्मीर में बच्चों का उत्साह सबसे अधिक है। 12वीं में अनंतनाग में सबसे अधिक 96.8 प्रतिशत बच्चे परीक्षाओं में शामिल हो रहे हैं।
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मंगलवार को शुरू हुई दसवीं की परीक्षाओं में इस जिले से बच्चों की भागीदारी 98.64 फीसदी है। बच्चों ने अपने आने वाले कल के मद्देनजर अलगाववादियों की अपीलें खारिज कर दीं हैं। दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में 86000 से अधिक बच्चे शामिल हो रहे हैं। इस तरह घाटी में लगभग एक लाख परिवारों में पठन-पाठन का माहौल है। बच्चों के भविष्य की खातिर उनके अभिभावकों ने भी अब अलगाववादियों के हड़ताल कैलेंडरों को फाड़ना शुरू कर दिया है। घाटी में स्थिति सामान्य बनाने में परीक्षाएं अहम भूमिका निभा रहीं हैं।
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अलगाववादियों और सभी विपक्षी दलों ने परीक्षाएं स्थगित करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया था। पढ़ाई नहीं होने के तर्क पर सरकार ने प्रश्नपत्रों के लिए कोर्स को 50 प्रतिशत घटाकर रियायत तो दी लेकिन परीक्षाएं स्थगित नहीं कीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह और गवर्नर एनएन वोहरा से बातचीत कर हर हाल में परीक्षाएं समय पर आयोजित करने की सलाह दी थी।
रियासत के शिक्षा मंत्री नईम अख्तर को लश्कर-ए तैयबा से धमकी भी मिली, लेकिन सरकार परीक्षाएं लेने पर अड़ी रही। इस फैसले से सकारात्मक परिणाम दिख रहे हैं। शिक्षा मंत्री का कहना है कि बच्चों ने अपने बेहतर भविष्य को तवज्जो दी है।