बंटवारे के बाद से ही पाकिस्तान बदनीयती की राह पर रहा। 1962 के बाद उसने 1965 में युद्ध की राह पकड़ी। इस बार उसे मुंहतोड़ जवाब ही नहीं मिला, बल्कि महंगा भी पड़ा।
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जांबाज जवानों ने पाकिस्तानी सेना की भारतीय क्षेत्र में कब्जे की रणनीति का करारा जवाब दिया। न सिर्फ अपने क्षेत्र से खदेड़ा, बल्कि उसकी औकात भी बताई। यह पाकिस्तान को बड़ा तमाचा था।
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पाकिस्तान यह शुरू से मानता रहा है कि अगर उसने जम्मू-कश्मीर को कब्जाने का प्रयास किया, तो उसे स्थानीय लोगों का समर्थन मिलेगा। इसके तहत उसने आपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया। हालांकि यह उसकी गलतफहमी थी।
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युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीर की जनता ने उसका साथ न देकर भारत सरकार का साथ दिया।
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पांच अगस्त को पाकिस्तान ने अपने सैनिकों को बड़ी संख्या में पैराशूट के जरिये कश्मीर घाटी में उतार दिया। इस साजिश करारा जवाब देने के लिए भारतीय सेना ने रणनीति बनाई और 15 अगस्त को एलओसी क्रास कर पहले महत्वपूर्ण पहाडि़यों पर कब्जा किया।
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इसके बाद उड़ी, पुंछ में अपनी स्थिति मजबूत की। 18 अगस्त को पाकिस्तान का आपरेशन जिब्राल्टर पस्त होता नजर आया। भारतीय सेना ने पाक के कब्जे वाले कश्मीर में आठ किलोमीटर अंदर घुसकर हाजी पीर दर्रा पर कब्जा जमा लिया।
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इसके बाद से पाकिस्तान घबरा गया। उसके सैनिकों का मनोबल भी गिरने लगा। उन्हें आशंका सताने लगी कि कहीं मुजफ्फराबाद भी भारत के कब्जे में नहीं चला जाए।
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युद्ध के मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का दो टूक जवाब देश वासियों को ही नहीं, बल्कि जवानों को भी जोश से भरने वाला था।
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उनका कहना था कि हम गरीबी सह लेंगे, भूख भी सह लेंगे, लेकिन दुश्मन को कड़ा जवाब जरूर देंगे।
उनके यह संकल्प, दृढ़ निश्चय और गंभीरता सैनिकों के मनोबल बढ़ाते रहे। जब वह रेडियो से संबोधित करते, तो पूरा भारत एक साथ खड़ा होता नजर आता। अंत में पाकिस्तान को हार का मुंह देखना पड़ा।