सीमावर्ती ग्रामीणों का कहना है कि यदि गांवों में पक्के बंकर होते तो कई जानें बच सकती थीं। चलेआरी गांव के सौदागर के अनुसार बीते वर्ष अक्टूबर महीने में पाक रेंजरों की गोलाबारी के दौरान में एक गोला उनके आंगन में गिरा था, जिसकी चपेट में आने से उनके माता-पिता की मौत हो गई। बेटे-बेटी और वह खुद भी घायल हो गए थे। उन्होंने कहा कि यदि गांव में पक्के बंकर होते तो शायद उनके माता-पिता आज जिंदा होते। कुछ ऐसा ही हाल मंगुचक्क में भी रहा। यहां पोली देवी ने पाकिस्तानी गोलाबारी की चपेट में आकर दम तोड़ दिया। उनके भी आंगन में गोला गिरा था।
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‘बंकर होते तो शायद आज मेरे मां-बाप जिंदा होते’
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अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास बसे ग्रामीणों को अक्सर पाकिस्तानी गोलाबारी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उन्हें परिवार की चिंता सताते रहती है। जब भी फसल की बिजाई और कटाई का समय आता है, पाक रेंजर नापाक हरकत को अंजाम देने पर आमादा हो जाते हैं। अब एक बार फिर धान की रोपाई का समय आ गया है। ग्रामीणों को आशंका है कि रेंजरों की छिटपुट फायरिंग कहीं आगे चलकर भारी गोलाबारी में नहीं बदल जाए। अगर फिर से वैसे हालात बनते हैं, तो उसमें जान बचाने की कोशिश बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि अभी तक सरकार की तरफ से गांवों में बंकर नहीं बनाए गए हैं। तमाम आश्वासन अभी भी आश्वासन ही साबित हुए हैं।
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‘बंकर होते तो शायद आज मेरे मां-बाप जिंदा होते’
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गत लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों के दौरान एनडीए सरकार बनने पर अमित शाह ने आरएस पुरा में बनाए गए शिविरों में रह रहे लोगों से उनकी सुरक्षा के लिए बंकर बनाने के लिए कहा था, जिसे आज तक पूरा नहीं किया गया। इससे ग्रामीणों में रोष है। सीमांत गांव कोटली मीरदिया के जसवीर सिंह, चौधरी संसार चंद, हंसराज भगत का कहना है कि पाकिस्तानी रेंर्जस और पाक के टारगेट पर होने की वजह से ग्रामीणों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। लाईया व चौगा गांव के जनक राज, रघुवीर सिंह, थोडू राम का कहना है कि मोदी सरकार से उन्हें काफी उम्मीदें थी। लेकिन, अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया गया, जिससे सीमावर्ती ग्रामीण राहत की सांस ले सकें। फलोरा गांव के रोशन लाल का कहना है कि पाक गोलाबारी के दौरान घर के बरामदे में शेल गिरने से उन्हें एक पैर कटवाना पड़ा। उनका कहना है कि अगर बंकर होते शायद आज अपंगता का जीवन नहीं जीना पड़ता।
‘बंकर होते तो शायद आज मेरे मां-बाप जिंदा होते’
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सीमावर्ती क्षेत्र रामगढ़ के ग्रामीणों के सब्र का बांध टूटने लगा है। आश्वासनों के भरोसे लगभग एक साल से मुश्किलों में गुजर बसर करने वाले अब सरकार से सवाल करने लगे हैं। उनका कहना है कि सरकार बताए कि बंकर के लिए सीमावर्ती ग्रामीणों को और कितना इंतजार करना पड़ेगा। ग्रामीणों का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्र में रहने वाले आज भी 1971 के समय की स्थितियों का सामना कर रहे। वहीं सुरक्षा के लिए आज भी सभी गुहार लगा रहे। ग्रामीणों की मानें, तो 1965 में सेना द्वारा बनाए बंकर कुछ समय तक सहारा बने। लेकिन स्थानीय स्तर पर देखरेख के अभाव में वह भी साथ छोड़ते गए।
आज उन बंकरों में जंगल-झाड़ उग गए हैं। नंदपुर, नंगा, चमलियाल, कमोर, बरोटा आदि के ग्रामीणों के अनुसार सरकार ने लोगों की सुरक्षा के लिए अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। ग्रामीण का आज भी अचानक मौत से सामना होता है, जिसमें वह अपने का असहाय महसूस करते हैं। सबसे ज्यादा बच्चों को लेकर चिंता लगी रहती है। सीमा पार से गोलाबारी शुरू होते ही कभी किसी के घर तो कभी किसी के घर की दीवार की आड़ लेकर जान बचानी पड़ती है। कई रात जागते बीतती है।