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अब लंदन देखेगा नैनसुख की कलाकारी का जलवा, ब्रिटिश म्यूजियम में बज रहा जसरोटा का डंका

Sat, 11 Jan 2020 11:54 AM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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नैनसुख की चित्रकारी - फोटो : सोशल मीडिया
उत्तर भारत के अद्वितीय चित्रकार नैनसुख की चित्रकारी का डंका विदेश में भी बज रहा है। ब्रिटिश म्यूजियम लंदन की ओर से खरीदी और सहेजी गई नैनसुख की बेमिसाल चित्रकारी के बारे में अब इस म्यूजियम में आने वाले आम लोग भी जान सकेंगे। जम्मू कश्मीर में कठुआ से मात्र कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित जसरोटा गांव किसी समय पर एक बड़ी रियासत का गढ़ रहा है। यहीं 18वीं शताब्दी में नैनसुख ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था। ब्रिटिश म्यूजियम में इस चित्रकार की प्रतिभा को संजोया जाना पूरे प्रदेश के लिए गर्व की बात है।

 
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नैनसुख की चित्रकारी - फोटो : सोशल मीडिया
नैनसुख 1710 से 1778 के बीच भारत के अद्वितीय चित्रकारों में से एक रहे हैं। मूल रूप से गुलेर हिमाचल के रहने वाले नैनसुख चित्रकार पंडित सेऊ के छोटे पुत्र थे और अपने बड़े भाई माणकू की तरह पहाड़ी चित्रकला को उन्होंने बढ़ावा देने का काम किया। भारतीय चित्रकारों में उन्हें बेमिसाल चित्रकार की उपाधि दी जाती रही है।

 
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नैनसुख की चित्रकारी - फोटो : सोशल मीडिया
इतिहासकारों के अनुसार नैनसुख ने 1740 के आसपास गुलेर में परिवार की कार्यशाला को छोड़ दिया और जसरोटा चले गए। जहां उन्होंने अपने अधिकांश कार्यों को स्थानीय राजपूत शासक मियां जोरावर सिंह और उनके बेटे बलवंत सिंह के लिए 1763 तक चित्रित किया।

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नैनसुख की चित्रकारी - फोटो : सोशल मीडिया
मुगल चित्रकला के तत्वों को अपनाकर 18वीं शताब्दी में नैनसुख ने पहाड़ी चित्रकला को एक नया आयाम दिया। नैनसुख ने अपने जीवन का आखिरी चरण बसोहली में बिताया जहां वो धार्मिक विषय पर 1765 से 1778 के बीच चित्रकारी करते रहे लेकिन अपने शैलीगत नवाचारों को बरकरार रखा।
 
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नैनसुख की चित्रकारी - फोटो : सोशल मीडिया
बसोहली चित्रकला में नैनसुख के भाई माणकू का नाम अधिक लिया जाता है चूंकि उन्होंने अपनी पारिवारिक शैली को बरकरार रखा था लेकिन जसरोटा शासनकाल में अपने काम के लिए नैनसुख को अधिक पहचाना गया है।
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