पत्थर को ठोस और जड़ माना जाता है। लेकिन पत्थर होने की तमाम कसौटियों को पूरा करने के बाद भी यह बेहद लचीला है। इसे मोड़ा जा सकता है और यह टूटता भी नहीं।
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PICS: क्या आपने देखे हैं रबर की तरह मुड़ने वाले पत्थर
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लकचदार सैंडस्टोन को ईटाकोल्यूमाइट कहते हैं। इसी तरह से एस्बेस्टॉस की संरचना और भी हैरान करती है। वजन में भारी और ठोस होने के बाजूवद एस्बेस्टॉस में से पतले धागे की तरह फाइबर निकलता है।
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यह फाइबर फायर फाइटिंग उपकरण बनाने में काम आता है। यानी आग का इस पर कोई असर नहीं होता। रियासत के सबसे पुराने उच्च शिक्षा संस्थान जीजीएम साइंस कॉलेज के जियोलॉजी विभाग के संग्रहालय में इस तरह के कई अजूबे हैं।
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बेहद पुराने और दुर्लभ श्रेणी के पत्थरों का संग्रह राज्य ही नहीं देश और दुनिया भर के शोधार्थियों को यहां आकर्षित करता है। संग्रहालय के प्रभारी डॉ सीके खजूरिया बताते हैं कि पत्थरों के अजब संसार को समझने के लिए संग्रहालय के पास हजारों सैंपल हैं।
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कुल 25 हजार नमूनों में से ज्यादातर पत्थर ही हैं जिनकी बनावट के पीछे अलग अलग कहानी है। पानी पर तैरते पत्थर हों या फिर आसमान से आए उल्कापिंड। छोटे और बड़े आकार के पत्थर असल में भूगर्भीय क्रियाओं की उपज हैं जिनमें से कई पत्थर शोधार्थियों को भी अचंभित करते हैं। संग्रहालय के पास ऐसा उल्कापिंड भी मौजूद है जो पत्थर के बजाए धातु की शक्ल में है।