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PICS: कश्मीर से कमतर नहीं है कठुआ का सरथल

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समुद्र तल से सात हजार फीट की ऊंचाई पर घास के गलीचों से लकदक विशालकाय मैदान। आसपास देवदार के जंगल और कुदरती नजारों के बीच पल पल बदलता मौसम। 23 वर्ग किलोमीटर तक फैले सरथल में एक से बढ़कर एक विहंगम स्थल देखने वाले को अपना मुरीद बनाते हैं, लेकिन यह स्थल सरकारी नजरें इनायत होने की बाट जोह रहा है। कुछ वर्ष पूर्व प्रदेश स्तरीय मेले के आयोजन से सरथल विकास का नारा दिया गया, लेकिन पर्यटन विकास के लिहाज से सरथल आज भी पिछड़ने पर मजबूर है।
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PICS: कश्मीर से कमतर नहीं है कठुआ का सरथल

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बनी तहसील मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर सरथल इलाका उत्तर में भद्रवाह और पूर्व में हिमाचल से सटा है। प्राकृतिक नजारों से भरेपूरे सरथल में पर्यटन विकास की असीम संभावनाएं हैं। इसी को देखते हुए पर्यटन विकास मंत्रालय ने सरथल विकास के कई वादे किए, लेकिन जमीनी हकीकत में खास अमल नहीं हो पाया है। सरथल में आठ सौ कनाल का एक व छह सौ कनाल के दो विशालकाय टापूनुमा मैदान हैं। यहां बादल मैदान में कुछ पल के लिए आते हैं और फिर हट जाते हैं। हरे-भरे मैदान, पहाड़ियां, नीला आकाश और बर्फ ओढ़े पहाड़ियों में यहां गजब का आकर्षण है।
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PICS: कश्मीर से कमतर नहीं है कठुआ का सरथल

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चिलचिलाती गर्मियों के मौसम में अगर आप ठंडे स्थान पर जाना चाहते हैं तो चले आइए कठुआ जिले की बनी तहसील के सरथल पर्यटन स्थल पर। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर व मनमोहक होने के साथ-साथ ही यह बेहद ठंडा स्थल है। यहां आप बर्फ के साथ अठखेलियां भी कर सकते हैं। जम्मू से 288 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सरथल समुद्र तल से 7200 फुट की ऊंचाई पर है। यहां पहुंचने पर हर कोई एक पल के लिए सबकुछ भुला कर प्रकृति की अनोखी छटा को निहारने लगता है।

PICS: कश्मीर से कमतर नहीं है कठुआ का सरथल

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बनी के लोग सरथल का मतलब जमीन पर स्वर्ग बताते हैं। लोगों का कहना है कि सरथल दो अक्षरों का मेल है सर जिसका मतलब है सबसे ऊपर यानी स्वर्ग और थल का मतलब है जमीन। यहां मई से सितंबर तक का मौसम एडवेंचर के शौकीन लोगों के लिए माकूल है। चारों ओर हरियाली, रंगबिरंगे पंछी, जंगली जानवरों की आवक और मात्र कुछ किलोमीटर पर बर्फ से लदे पहाड़ और प्रदूषण मुक्त स्वच्छ हवा।
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कुदरत की हसीन वादी में बिना बिजली के रहना एक अनोखा अनुभव हो सकता है। पैदल चलकर पहाड़ों पर बर्फ के साथ जून और जुलाई में खेलना एक अद्भुत अवसर है। रहने के लिए अगर अपने साथ टेंट लेकर आया जाए तो मजे ही कुछ और हैं। यहां पर दूध, पनीर, खोया, दही, कलाड़ी और ट्राउट मछली आदि सब कुछ अन्य जगहों से सस्ता मिलता है। यहां का मुख्य व्यंजन जलेबी को दूध में डाल कर खाना है, जिसका आनंद लेने के लिए हर साल लोग आते रहते हैं।
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भद्रवाह से परिवार के साथ आए विंकी भगत, मोहनी देवी, मनोहर कोतवाल ने बताया कि पर्यटकों के लिए यहां न तो रहने का बंदोबस्त है और न ही शौचालयों का प्रबंध। राजन, रितिक और मानिक ने कहा कि न तो यहां झूले हैं और न ही कोई रेस्तरां। दो जिलों को जोड़ने वाले इस स्थल की ओर सरकार ध्यान दे। पर्यटन विकास की यहां असीम संभावनाएं हैं। इस स्थान को विकसित किए जाने की जरूरत है।
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