भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर कभी नागरिकों के लिए बंदूक़ बनाने वाली फैक्ट्रियों का गढ़ हुआ करता था। लेकिन जब से मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर घाटी में बंदूक़ रखने पर पाबंदियां लगी हैं, हालिया वर्षों में तभी से ये उद्योग लगातार गिरावट में रहा है। श्रीनगर में बीबीसी संवाददाता गीता पांडे ने इन फैक्ट्रियों का जायज़ा लिया। शहर के रैनावाड़ी में एक सुबह के वक़्त ज़ारू गन फैक्ट्री में सन्नाटा पसरा हुआ है। मशीने धूल फांक रही हैं, उपकरण ज़मीन पर पड़े हैं और कुछ लोग इंतज़ार में बैठे हुए हैं।
विज्ञापन
2 of 9
- फोटो : BBC
फैक्ट्री के तीन मालिकों में से एक नाज़िर अहमद ज़ारू कहते हैं कि 2012 तक हर साल यहां 540 सिंगल-बैरल और डबल-बैरल राइफलों का निर्माण होता था और सभी बिक भी जाती थीं। ज़ारू लहजे में बेहद कड़वाहट लिए कहते हैं, 'लेकिन 2013 में हम केवल 29 बंदूक़ ही बेच पाएं। पिछले तीन वर्षों में हम एक भी बंदूक़ नहीं बेच पाए हैं। बंदूक़ की क़ीमत अखरोट की लकड़ी से बनी लंबी बट और उसमें खुदे चिनार के पेड़ के पत्तों की वजह से अधिक होती थी।
विज्ञापन
3 of 9
srinagar gun
- फोटो : BBC
घाटी के लोग पहले शिकार करने या आत्मरक्षा के लिए बंदूक़ ख़रीदते थे। वहीं दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश से डीलर्स बंदूक़ ख़रीदने घाटी आते थे। अपनी पुरानी बंदूक़ को ठीक कराने के लिए आज एक पुराना ग्राहक इस फैक्ट्री में आया है।
4 of 9
- फोटो : BBC
ज़ारू का परिवार मुग़ल काल से इस धंधे में है। वह कहते हैं कि भारत की आज़ादी से पहले ही महाराजा हरि सिंह के बुलावे पर उनके दादाजी पाकिस्तान से कश्मीर आ बसे थे। वे राजा के लिए ख़ास तरह की बंदूक़ बनाते थे।
विज्ञापन
5 of 9
srinagar gun
- फोटो : BBC
अभी मौजूद इस फैक्ट्री को नाज़िर अहमद ज़ारू के पिता गुलाम अहमद ज़ारू ने 1953 में स्थापित किया था। मैनेजर मोहम्मद शाफ़ी कहते हैं, 'अच्छे दिनों में क़रीब दो दर्जन लोग यहां नौकरी करते थे, ज़्यादातर स्थानीय लोग, लेकिन कुछ दूर से भी आते थे। फैक्ट्री में काफ़ी हलचल रहती थी।' वह कहते हैं, 'अगर आप उस दौर में यहां आतीं, हम आपको समय नहीं दे पाते, लेकिन आज हमारे पास बहुत ख़ाली वक़्त है।' ज़ारू गन फैक्ट्री, घाटी में बची केवल दो विनिर्माण इकाइयों में से एक है, दूसरी है सुभाना एंड सन्स।
विज्ञापन
6 of 9
- फोटो : BBC
1947 से पहले यहां कम से कम लगभग दर्जन भर फैक्ट्रियां थीं, इनमें सैकड़ों लोग काम करते थे। गुज़रते वक़्त के साथ इनमें से ज़्यादातर या तो बंद हो गई या जम्मू चली गई हैं। इससे सारा व्यापार भी जम्मू चला गया है। बीबीसी से बातचीत में सुभाना एंड सन्स के मालिक ज़हूर अहमद अहंगर ने बताया, 'जम्मू में 30 से अधिक बंदूक़ फैक्ट्रियां हैं जो भारी मात्रा में बंदूक़ें बनाती हैं। वहां हज़ारों हथियार डीलर्स हैं, जिसकी वजह से भारत के दूसरे राज्यों से ख़रीददार हमारे पास नहीं बल्कि जम्मू जाते हैं।' वो आगे कहते हैं, ' बीते दो वर्षों में हमने एक भी बंदूक़ नहीं बेची।'
विज्ञापन
7 of 9
- फोटो : BBC
कश्मीर की बंदूक़ इंडस्ट्री पर 1989 से 1991 तक दो वर्षों के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया था जब इस क्षेत्र में भारतीय शासन के ख़िलाफ़ हिंसक उग्रवाद शुरू हुआ था। इस प्रतिबंध को 1992 में हटाया गया, लेकिन व्यापारी कहते हैं कि इसके बाद से उनके बंदूक़ उत्पादन के कोटे में कटौती कर दी गई थी। उनके मुताबिक़ सुभाना की बंदूक़ उत्पादन के 700 वाले पहले के कोटे में कटौती कर उसे 300 कर दिया था। 1925 में स्थापित हुए ये उद्योग शुरू में शिकारी तीर, तलवार और ख़ंजर बनाते थे।
8 of 9
- फोटो : BBC
इस उद्योग को 1942 में 12 बोर राइफ़ल बनाने का लाइसेंस मिला और बंदूक़ें बनानी शुरू कर दी। ग्राहक नहीं मिलने की वजह से फैक्ट्री के मालिक अब इसे बंद करने की सोच रहे हैं। ज़ारू और अहंगर कहते हैं कि प्रशासन ने कोई कारण नहीं बताया है कि क्यों वो स्थानीय लोगों को अब लाइसेंस जारी नहीं कर रहे हैं। हालांकि उन्हें लगता है कि वर्षों के चरमपंथ और क्षेत्र में अस्थिर हुआ सुरक्षा का माहौल इसका कारण हो सकता है। नज़ीर अहमद ज़ारू के बेटे बुरहान ज़ारू कहते हैं कि 2013 में उन लोगों ने इस उद्योग को बचाने के लिए राज्य के गृह मंत्रालय से गुहार लगाई थी।
उन्हें मदद का आश्वासन दिया गया था, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। वह कहते हैं, 'सुरक्षा प्रतिष्ठानों का डर बेबुनियाद है। उग्रवाद जब चरम पर था तब भी चरमपंथी हमें परेशान नहीं करते थे। उन्हें हमारे पुरानी तरह की बंदूक़ों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनके पास अत्याधुनिक हथियार हैं।' अहंगर जोड़ते हैं, 'प्रशासन को जांच-पड़ताल के बाद सही लोगों को लाइसेंस जारी करना शुरू कर देना चाहिए, नहीं तो ये इंडस्ट्री ख़त्म हो जाएगी। और तब ये शर्म की बात होगी।'