छह दिन तक सियाचिन के बर्फीले इलाके में दबे रहने वाले लांसनायक हनमंथप्पा को निकालने में सेना के दो कुत्तों ‘डाट और मिशा’ ने अहम भूमिका निभाई।
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सियाचिन: ‘डाट और मिशा’ ने खोजा लांसनायक हनुमंथप्पा को
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19,000 फुट पर दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में प्राकृतिक आपदा का शिकार होने वाले दस सैन्य कर्मियों को बचाने के लिए डेढ़ सौ जवानों के साथ डाट और मिशा को भी लगाया गया था। इन कुत्तों को ग्लेशियर में विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।
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सैन्य प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल मनीष मेहता के अनुसार खोजी टीम में शामिल दोनों कुत्ते सेना के अहम अंग हैं। इसके अलावा टीम में शामिल जवान ग्लेशियर क्षेत्र में काम करने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित हैं।
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अभियान दल ने सात दिनों तक माइनस 30 से 50 डिग्री के तापमान में बचाव कार्य किया। इस दल में सियाचिन की हावस टीम भी शामिल रही। छह दिन तक बर्फ के नीचे दबे रहने के बाद लांसनायक थप्पा के जिंदा निकलने को चमत्कार के रूप में देखा जा रहा है।
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सैन्य प्रवक्ता के अनुसार सियाचिन में तैनात होने वाले जवानों को ‘सियाचिन बैटल स्कूल’ में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां तैनात जवान आधुनिक उपकरणों से लैस होते हैं। इसके अलावा किसी भी आपदा के समय खुद को सुरक्षित करने का भी उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है।
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उसी की बदौलत थप्पा खुद को बचाए रखने में सफल रहे। बताया जाता है कि सैनिकों के शिविर के ऊपर गिरी बर्फ का आकार एक कमरे से भी बड़ा था। बर्फ इतनी सख्त थी कि उसके लिए हैवी आइस कटर का उपयोग किया गया, जो घटना के तुरंत बाद विशेष तौर पर सियाचिन पहुंचाई गई थी।
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इसके अलावा घटनास्थल के पास ही एक रेसक्यू कैंप लगाया गया, जिसमें डाक्टरों की विशेष टीम को 24 घंटे तैनात किया गया था, ताकि मौके से निकाले गए जवानों को तत्काल चिकित्सा सुविधा मुहैया करवाई जा सके।