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जीलानी...वह सूफी संत जिसे मुसलमान गौस-ए-आजम तो हिंदू काहनूव संत कहते हैं, जानिए कुछ विशेष बातें

Mon, 09 Dec 2019 04:26 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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सूफी संत शेख सैयद अब्दुल कादिर जीलानी की याद में - फोटो : बासित जरगर
सूफी संत शेख सैयद अब्दुल कादिर जीलानी की याद में सोमवार को श्रीनगर में लोगों का हुजूम उमड़ा। इस दौरान अकीदतमंदों का तांता लगा रहा। कोई मन्नत-मुराद मांगने में मशगूल रहा तो कोई बीमारी से शिफा के लिए अर्जियां लगाता रहा।

 
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सूफी संत शेख सैयद अब्दुल कादिर जीलानी की याद में - फोटो : बासित जरगर
श्रीनगर के खानयार में स्थित 200 वर्षों से भी ज्यादा पुरानी दरगाह जोकि सूफी संत शेख सैयद अब्दुल कादिर जीलानी की यादों को समेटे हुए है, इसका निर्माण 18वीं शताब्दी में किया गया था। इसे सामान्यतः दस्तगीर साहिब दरगाह के नाम से जाना जाता है।
 
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सूफी संत शेख सैयद अब्दुल कादिर जीलानी की याद में - फोटो : बासित जरगर
शेख अब्दुल कादिर को सूफी मत के कदरिया शाखा का जनक माना जाता है। माना जाता है कि शेख अब्दुल कादिर साहब इस दरगाह में कभी नहीं आए, लेकिन उनके एक शिष्य शेख सखी शाह ने उनसे जुड़ी यादगार वस्तुओं को इस दरगाह में संग्रहीत किया था। तबसे इस दरगाह का नाम दस्तगीर साहिब दरगाह पड़ गया।

 

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सूफी संत शेख सैयद अब्दुल कादिर जीलानी की याद में - फोटो : बासित जरगर
11वीं शताब्दी के इस संत को जहां मुसलमान गौस-ए-आजम कहते हैं, वहीं हिंदू काहनूव संत कहते हैं।

 
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सूफी संत शेख सैयद अब्दुल कादिर जीलानी की याद में - फोटो : बासित जरगर
उनकी दरगाह देवदार की लकड़ियों से निर्मित है। इसका बाहरी हिस्सा हलके सफेद और हरे रंग का है, जबकि अंदरूनी हिस्सा कागज की लुगदी (पेपरमैसी) से शानदार ढंग से सुसज्जित किया गया है।

 
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सूफी संत शेख सैयद अब्दुल कादिर जीलानी की याद में - फोटो : बासित जरगर
अरबी भाषा में लिखी पंक्तियां और फूलों की नक्काशी इस दरगाह की खूबसूरती को चार चांद लगाती हैं। इस दरगाह में एक वर्गाकार मुख्य कमरा और कई सहायक कमरे हैं। ये कमरे हॉलनुमा हैं, जिनका उपयोग बैठकों के लिए किया जाता है।

 
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सूफी संत शेख सैयद अब्दुल कादिर जीलानी की याद में - फोटो : बासित जरगर
सदियों से सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक रही यह खूबसूरत दरगाह हिंदू-मुसलिम श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र रही है।
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