कश्मीर घाटी में सर्दियों के सबसे भीषण 40 दिनों यानी चिल्ले कलां की शुरुआत आज यानी बुधवार से हो गई। ये चालीस दिन लोगों के लिए काफी मुश्किल भरे होते हैं। इन दिनों के लिए लोग काफी समय पहले से तैयारियां शुरू कर देते हैं।
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घाटी में भीषण सर्दियों के दिनों को तीन हिस्सों चिल्ले कलां, चिल्ले खुर्द और चिल्ले बच्चा में बांटा गया है। 21 दिसंबर से सर्दी के सबसे भीषण 40 दिनों की शुरुआत हो जाती है। ये 31 जनवरी तक जारी रहता है। इसके बाद 19 फरवरी तक 20 दिनों का चिल्ले खुर्द आता है। इसमें हलकी ठंउ होती है।
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इसके बाद दो मार्च तक 10 दिनों का चिल्ले बच्चा होता है। इसके साथ ही ठंड एक तरह से समाप्त हो जाती है, लेकिन माना यह जाता है कि इन 10 दिनों की ठंड हड्डियों में धंसने वाली ठंड होती है।
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पुराने जमाने से एक रिवायत के तौर पर इसका स्वागत किया जाता रहा है। ठंड के इन दिनों में बर्फबारी की काफी अधिक संभावना रहती है जो आने वाले गर्मियों के दिनों के लिए अच्छा माना जाता है। दरअसल, पहाड़ों पर जमी बर्फ गर्मियों में पिघल कर पानी का स्रोत बनती है।
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कश्मीर रेलवे
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बुजुर्गों की मानें तो 20 से 30 वर्ष पहले काफी अधिक बर्फबारी होती थी। सड़क संपर्क कट जाया करते थे। इस सबको ध्यान में रखते हुए लोग सर्दियों के इन भीषण दिनों के आने से पहले ही सभी तैयारियां पूरी कर लेते थे।
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घाटी में बर्फबारी
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सर्दियों के लिए सब्जियों को गर्मियों से ही सुखाना शुरू कर देते हैं। कांगड़ी (मिट्टी की हांडी, जिससे गर्मी करते हैं) और उसमें जलाने के लिए कोयला गर्मियों में ही जमा कर लिया जाता है।
बुखारी और इसके लिए लकड़ी का भी इन दिनों से पहले ही प्रबंध करके रखते हैं। गौरतलब है कि चिल्ले कलां, चिल्ले खुर्द और चिल्ले बच्चा के समाप्त होने के बाद घाटी में मौसम में बदलाव आना शुरू हो जाता है। फिर लोगों को इंतजार रहता है ‘मौसम-ए-बहार’ का, जिसके आते ही चारों ओर रौनक लौट आती है।