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विस्थापन की चौथाई सदी बाद भी कश्मीरी पंडितों के दर्द का अंत नहीं

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26 साल। यानी चौथाई सदी से भी ज्यादा। इतना ही अरसा बीत चुका है आतंकवाद के शिकार कश्मीरी पंडितों को अपना घर-द्वार छोड़े हुए। इन बरसों में एक जवान पीढ़ी बुढ़ा गई। और एक नयी पीढ़ी पैदा होकर तमाम मुसीबतों के बीच जवान होकर सवालों के जवाब तलाशते भटक रही है।
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विस्थापन की चौथाई सदी बाद भी कश्मीरी पंड‌ितों के दर्द का अंत नहीं

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इस बीच इनके नाम पर सियासत तो सबने की पर इनकी बिखरी हुई जिंदगी को संवारने का काम किसी से न हो सका। घाटी से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के 26 सालों में हजारों विस्थापित बुजुर्ग घर वापसी की आस मन में लिए ही चल बसे। हजारों बच्चे विस्थापन के दौर में जन्मे और अब युवा हो गए।
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विस्थापन की चौथाई सदी बाद भी कश्मीरी पंड‌ितों के दर्द का अंत नहीं

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करीब 57 हजार परिवारों की सात लाख की आबादी रोजगार, गुजर बसर और परिवार की सुरक्षा के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में चली गई। पूरी बिरादरी के लिए अपने अस्तित्व के साथ सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखना बड़ी च़ुनौती हो गई है।

विस्थापन की चौथाई सदी बाद भी कश्मीरी पंड‌ितों के दर्द का अंत नहीं

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कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववाद की आग में झुलसे कश्मीरी पंडितों की घाटी में घर वापसी की बातें बहुत हुईं लेकिन अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। सरकार ने जम्मू और उधमपुर में कैंप बनाकर अस्थायी तौर पर इनके रहने की व्यवस्थाएं तो की हैं लेकिन उनकी मुश्किलें बनी हुई हैं।
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विस्थापन की चौथाई सदी बाद भी कश्मीरी पंड‌ितों के दर्द का अंत नहीं

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विस्थापित राधे शाम पंडिता का कहना हैं कि हमारे बच्चे कश्मीरी नहीं जानते। वे डर के मारे घाटी में अपने पुश्तैनी घरों को देखने नहीं गए। विरासत खतरे में है। घाटी में मंदिरों पर कब्जा हैं, घरों पर कब्जा हो चुका है। आखिर विस्थापित जाना भी चाहें तो कहां जाएं।
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विस्थापन की चौथाई सदी बाद भी कश्मीरी पंड‌ितों के दर्द का अंत नहीं

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कश्मीरी पंडित विस्थापितों के संगठन पनुन कश्मीर के प्रधान अश्विनी कुमार चुंरगू का कहना हैं कि कश्मीरी पंडित विस्थापितों का नरसंहार सोची समझी साजिश का नतीजा था। उनका कहना हैं कि कश्मीरी पंडित विस्थापितों के मसले का जब तक सियासी हल नहीं निकाला जाता जब तक समस्या का हल संभव नहीं है।
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