स्टील से बने कारतूसों के इस्तेमाल की पहली घटना वर्ष 2017 के नए साल की पूर्व संध्या पर सामने आई थी, जब जैश आतंकियों ने दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के लेथपोरा में सीआरपीएफ कैंप पर आत्मघाती हमला किया था। इस हमले में पांच जवान शहीद हो गए। यह सभी जवान बुलेट प्रूफ जैकेट पहने थे, उसके बावजूद उनकी जान नहीं बच सकी थी। अधिकारियों ने कहा कि आतंकी संगठन जैश के असलहे में एम-4 कारबाइन और स्टील की गोलियां भी शामिल हैं। इन गोलियों में आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान उपयोग किए जाने वाले बुलेट प्रूफ बंकरों को भेदने की क्षमता है।
31 दिसंबर, 2017 के हमले के बाद सीआरपीएफ के जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन अतिरिक्त महानिदेशक एसएन श्रीवास्तव, जो अब दिल्ली पुलिस के प्रमुख हैं, ने गहन जांच की थी। इसमें खुलासा हुआ था कि हमलावर ने एके राइफल से गोली चलाई थी। इसके बाद पिछले आत्मघाती हमलों का विश्लेषण भी किया गया। इस दौरान बैलिस्टिक विशेषज्ञों ने कहा था कि अगस्त 2016 में दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में जिला पुलिस लाइनों पर हमले के दौरान आतंकियों ने स्टील की गोलियों का इस्तेमाल किया था। इसमें आठ सुरक्षाकर्मियों की जान चली गई थी।
आतंकियों ने स्टील की गोलियों का कश्मीर घाटी में अंतिम बार जून 2019 में अनंतनाग में आत्मघाती हमले के दौरान प्रयोग किया था, जिसमें सीआरपीएफ के पांच जवान और जम्मू-कश्मीर के एक पुलिस निरीक्षक की जान चली गई थी। सभी शहीद जवानों ने बुलेट प्रूफ जैकेट्स पहन रखे थे लेकिन उनकी जान नहीं बच पाई थी।
स्टील के इन कारतूसों पर पूरी दुनिया में प्रतिबंध है, लेकिन चीन इसका निर्माण करता है और वहीं से पाकिस्तान के रास्ते यह खतरनाक कारतूस आतंकियों तक पहुंचते हैं।