इस भूतहा गांव में रात को रुकने से लोग खौफ खाते हैं। यह गांव करीब 194 साल से वीरान पड़ा है। इस गांव पर कई डाक्यूमेंट्री बन चुकी हैं। अब इसके दिन फिरने वाले हैं। हम बात कर रहे हैं राजस्थान के जैसलमेर से 18 किलोमीटर दूर स्थित कुलधरा गांव की। इस गांव को पुरातत्व विभाग ने पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की तैयारी शुरू कर दी है।
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फिल्मों की शूटिंग के लिए भी किराये पर देंगे
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इसके तहत यहां घरों को बाजार, दुकान, कॉफी शॉप और फिल्मों की शूटिंग करने के लिए किराये पर दिया जाएगा। जानकारी के अनुसार, राजस्थान की सरकार ने इस गांव को पीपीपी के तहत विकसित करने के लिए एक कंपनी से अनुबंध किया था। जिसके बाद यहां टूरिजम सेक्टर के रूप में कुलधरा गांव को विकसित करने की कवायद शुरू कर दी गई है।
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पालीवाल ब्राह्मणों के थे 84 गांव
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दरअसल, यहां पालीवाल ब्राह्मणों समुदाय के 84 चौरासी गांव थे और उनमें से एक था कुलधरा। पालीवाल ब्राह्मण होते हुए भी उद्यमी समुदाय था। मूलतः पाली जिले से संबधित यह जाति पाली से अपने निर्वासन के बाद इधर-उधर भटक रही थी, तभी जैसलमेर रियासत के तत्कालीन महारावल ने इनसे जैसलमेर में बसने की गुजारिश की।
पालीवालों की बेटी पर मोहित हुआ दीवान
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दीवान सालिम सिंह मोहता महारावल मूलराज सिंह के राज्य काल का सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में एक था। खाभा गांव के पालीवाल हरजल की बेटी मिरगी के रूप पर मोहित होकर इस दीवान ने उसे अपना बनाने के लिये कई प्रलोभन दिए। दीवान ने लड़की के घर संदेश भिजवाया कि यदि उसे लड़की नहीं मिली तो वह गांव पर हमला करके लड़की को उठा ले जाएगा।
ऐसे में पालीवाल ब्राह्मणों को गांव बचाना था या फिर अपनी बेटी। इस विषय पर निर्णय लेने के लिए सभी 84 गांव के पालीवाल काठोड़ी मंदिर पर इकट्ठा हुए। पालीवालों ने विक्रमी संवत् 1880 में यहां एक ही लोटे से नमक मिला पानी पीकर यह संकल्प लिया कि वे अपनी जन्मभूमि-कर्मभूमि भले ही छोड दें, लेकिन सालिम के अत्याचारों के आगे शीश नहीं झुकाएंगे। इसी संकल्प के साथ उन्होंने हमेशा के लिए जैसलमेर को अलविदा कह दिया।