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नवरात्रि विशेषः ये हैं 'युद्ध की देवी', दुश्मन भी नहीं बिगाड़ पाए थे कुछ

Thu, 21 Sep 2017 12:50 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
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तनोट देवी मंदिर, जैसलमेर
हिन्दुस्तान की धार्मिक संस्कृति जो देश भर के अलग-अलग कोनों में अपने अलग-अलग रंग लिए हुए हैं। आज धर्म और श्रद्धा के इन्ही रंगों से रूबरू होने के लिए हम आपको बता रहे हैं, जैसलमेर में भारत-पाक सीमा पर बने लगभग 1200 साल पुराने तनोट माता मंदिर के बारे में। यह जगह भारत-पाकिस्तान युद्ध से जुड़ी कई अजीबो-गरीब यादें समेटे हुए है, जो देश भर के श्रद्धालुओं को नहीं वरन भारतीय सेना को अपने आप से जोड़े हुए हैं।
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पाकिस्तानी सेना भी मानती है इस देवी का लोहा

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पट्टिका पर लिखा मंदिर का इतिहास
देश की पश्चिमी सीमा के निगेहबान जैसलमेर जिले की पाकिस्तान से सटी सीमा पर बना तनोट माता का मंदिर अपने आप में अद्भुत मंदिर है। सीमा पर बना यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था के केन्द्र के साथ साथ भारत पाक के 65 व 71 के युद्ध का मूक गवाह भी है। ये माता के चमत्कार ही है, जो आज इसे श्रद्धालुओं और सेना के दिलों में विशेष स्थान दिलाए हुए है। तनोट देवी का लोहा तो यहां ही नहीं बॉर्डर के उस पार पाकिस्तान तक में माना जाता है और पाकिस्तानी सेना ने भी माता के चम्तकारों को 65 व 71 की लड़ाई में साक्षात देखा था।
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यहां रखे हुए हैं पाकिस्तान के जीवित बम

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मंदिर में स्थित युद्ध संग्रहालय में रखे पाकिस्तानी बम
इस घटना की याद में तनोट माता मंदिर के संग्रहालय में आज भी पाकिस्तान द्वारा दागे गए जीवित बम रखे हुए हैं। शत्रु ने तीन अलग-अलग दिशाओं से तनोट पर भारी आक्रमण किया। दुश्मन के तोपखाने जबरदस्त आग उगलते रहे। तनोट की रक्षा के लिए मेजर जय सिंह की कमांड में ग्रेनेडियर की एक कंपनी और सीमा सुरक्षा बल की दो कंपनियां दुश्मन की पूरी ब्रिगेड का सामना कर रही थीं। 1965 की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना कि तरफ से गिराए गए करीब 3000 बम भी इस मंदिर पर खरोच तक नहीं ला सके, यहां तक कि मंदिर परिसर में गिरे 450 बम तो फटे तक नहीं।

बीएसएफ के जवानों की रक्षा करती है तनोट देवी

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युद्ध की देवी तनोट माता
जी हां...यह कोई दंत कथा नहीं है और न ही कोई मनगढ़ंत कहानी है, 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों और सीमा सुरक्षा बल के जवानों की तनोट माता है, मां बनकर ही रक्षा करती थी। राजस्थान के जैसलमेर शहर से 120 किलोमीटर दूर तनोट माता मंदिर पाकिस्तानी सेना को परास्त करने में तनोट माता की भूमिका बड़ी अहम मानी जाती है। यहां तक मान्यता है कि माता ने सैनिकों की मदद की और पाकिस्तानी सेना को पीछे हटना पड़ा।
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जब तीन दिशाओं से घिर गई थी भारतीय सेना

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1965 के युद्ध की एक दुर्लभ तस्वीर
बात है 17 से 19 नवम्बर, 1965 के बीच की जब दुश्मन की जबरदस्त आग उगलती तोपों ने तनोट को तीनों ओर से घेर लिया था और तनोट की रक्षा के लिए भारतीय सेना की कमान संभाले मेजर जयसिंह के पास सीमित संख्या में सैनिक और असला था। शत्रु सेना ने इस क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए तनोट से जैसलमेर की ओर आने वाले मार्ग में स्थित घंटियाली के आस पास तक एंटी टैंक माईन्स लगा दिए थे, ताकि भारतीय सेना की मदद के लिए जैसलमेर के सड़क मार्ग से कोई वाहन या टैंक इस ओर न आ सके।
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दुश्मन ने बरसाए थे 450 बम, एक भी नहीं फटा

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पाकिस्तानी टैंक
दुश्मन ने तनोट माता मंदिर के आस-पास के क्षेत्र में करीब तीन हजार गोले बरसाए, लेकिन इनमें से अधिकांश अपना लक्ष्य चूक गए इतना ही नहीं पाक सेना द्वारा मंदिर को निशाना बना कर करीब 450 गोले बरसाए गए, लेकिर माता के चमत्कार से एक भी बम फटा नहीं और मंदिर को खंरोंच तक नहीं आई और फिर माता के इन चमत्कारों से बढे भारतीय सेना के हौंसलों ने पाक सैनिकों वापस लौटने पर मजबूर कर दिया।
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अपने ही सैनिकों को भारतीय समझकर मार रही थी पाक सेना

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लौंगेवाला का युद्ध की तस्वीर
माता के बारे में कहा जाता है कि युद्ध के समय माता के प्रभाव ने पाकिस्तानी सेना को इस कदर उलझा दिया था कि रात के अंधेरे में पाक सेना अपने ही सैनिकों को भारतीय सैनिक समझ कर उन पर गोलाबारी करने लगे और परिणाम स्वरूप स्वयं पाक सेना द्वारा अपनी सेना का सफाया हो गया।

सेना ही करती है मंदिर की देखरेख

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मंदिर में सेना द्वारा की जाती है रोज पूजा
लगभग 1200 साल पुराने तनोट माता के मंदिर के महत्व को देखते हुए बीएसएफ ने यहां अपनी चौकी बनाई है। इतना ही नहीं बीएसएफ के जवानों द्वारा अब मंदिर की पूरी देखरेख की जाती है। मंदिर की सफाई से लेकर पूजा अर्चना और यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं जुटाने तक का सारा काम अब बीएसएफ बखूबी निभा रही है। यहां पर कई धर्मशालाएं, हैल्थ कैंप और दर्शनार्थियों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था की जाती है। नवरात्रों के दौरान जब दर्शनार्थियों की भीड़ बढ़ जाती है तब सेना अपने संसाधन लगा कर यहां आने वाले लोगों को व्यवस्थाएं प्रदान करती है।
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फिल्म 'बॉर्डर' में हुआ था मंदिर का जिक्र

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बॉर्डर फिल्म का सीन
इस मंदिर की ख्याति को हिंदी फिल्म ‘बॉर्डर’ की पटकथा में भी शामिल किया गया था। दरअसल, यह फिल्म ही 1965 युद्ध में लोंगेवाला पोस्ट पर पाकिस्तानी सेना के हमले पर बनी थी और फिल्म में मंदिर के सीन को दिखाकर 1965 के युद्ध की यादों को जीवंत किया गया था।
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