दशहरे पर पूरे देश में बुराई के प्रतीक रावण के पुतले को हर साल जलाया जाता है, वहीं एक जगह ऐसी भी है जहां रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसे युद्ध में पराजित कर मारा जाता है। यह परंपरा करीब पौने दो सौ साल से चली आ रही है।
हम बात कर रहे हैं सीकर जिले के दांतारामगढ़ तहसील के बाय गांव की। प्रसिद्ध खाटूश्याम जी के नजदीकी छोटे से गांव बाय की पहचान उसके दशहरे मेले के लिए है। दक्षिण भारतीय शैली में होने वाले इस मेले को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। यहां के मेले का माहौल देखते ही बनता है। मेले की विशेषता यह है कि यहां रावण का पुतला नहीं बनाया जाता।
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सेनाएं होती हैं आमने-सामने
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लड़ते हुए राम रावण
- फोटो : अमर उजाला
विजयदशमी के दिन राम-रावण की सेना के बीच युद्ध होता है। इसमें बुराई के प्रतीक रावण का वध किया जाता है। इससे पहले गांव के सीनियर स्कूल के मैदान में दोनों सेना आकर आमने-सामने होती है। यहां दोनों सेनाओं के बीच सीधा युद्ध होता है। इसमें रावण को मार दिया जाता है। इसके बाद शोभायात्रा निकाल कर विजय का जश्न मनाया जाता है। शोभायात्रा भगवान लक्ष्मीनाथ मंदिर पहुंच कर सम्पन्न होती है। यहां भगवान की आरती की जाती है और नाच गाकर उत्सव मनाया जाता है।
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देखने आते हैं हजारों लोग
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मेले में रावण
- फोटो : अमर उजाला
आयोजन समिति के मंत्री नवरंग सहाय भारतीय बताते है कि मेले में करीब 50 हजार से ज्यादा लोग शामिल होते हैं। मेला कोटा के बाद लोकप्रियता में प्रदेश में दूसरा स्थान रखता है। इसमें शामिल होने के लिए दूर दराज के साथ देश के विभिन्न स्थानों से प्रवासी लोग भी आते हैं।
मेले की शुरुआत करीब 162 साल पहले हुई थी। मंदिर के पुजारी रामावतार पाराशर बताते है कि अंग्रेजों ने गांव वालों पर कर लगा दिया था। इसके विरोध में गांववासी एकजुट हो गये ओर अनशन-आंदोलन शुरू कर दिया। गांव वालों के अनशन के आगे अंग्रेजों को झुकना पड़ा और कर को हटाया गया। इस आंदोलन में जीत के उपलक्ष्य में विजयदशमी मेला शुरू किया गया जो अब तक जारी है।
200 लोगों की टीम करती है रिहर्सल
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मेले में वानर सेना
- फोटो : अमर उजाला
मेले में सभी गांव वासी मिलकर काम करते है और जन सहयोग से ही सभी व्यवस्था की जाती है। इसके लिए कोई चन्दा नहीं किया जाता। ग्रामीण अपनी श्रद्धा और हैसियत के अनुसार स्वतः सहयोग देते है। मेले की तैयारी महीने भर पहले शुरू हो जाती है। युद्ध की रिहर्सल में 200 लोगों की टीम काम करती है। ये टीम ग्रामीणों के सहयोग से आर्थिक सहयोग से लेकर मेले की तमाम इंतजाम करती है। इसमें सभी जाति धर्म के लोग खुले दिल से सहयोग करते है।
लक्ष्मीनारायण मंदिर, जहां होती है पूजा
- फोटो : अमर उजाला
बाय का दशहरा मेला कौमी एकता और सदभाव की मिसाल है। मेले में गांव के मुस्लिम लोग भी सक्रिय भागीदारी निभाते है। वे आयोजन की व्यवस्था में हर तरह से खुल कर सहयोग करते है और आर्थिक के साथ व्यवस्था में भी हाथ बंटाते है।