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खास मुलाकात में बोले स्पेशल ऑप्स में रॉ अफसर बने के के मेनन, सिनेमा को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए

Tue, 17 Mar 2020 11:34 PM IST
Mishra Mishra अमित कुमार सिंह, मुंबई
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KK Menon - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
शौर्य, हजारों ख्वाहिशें ऐसी, गुलाल, हैदर, लाइफ इन अ मेट्रो और सरकार जैसी चर्चित फिल्मों में अपनी अदाकारी के जलवे दिखा चुके के के मेनन निर्देशक नीरज पांडे की पहली वेब सीरीज स्पेशल ऑप्स में रॉ एजेंट हिम्मत सिंह का किरदार निभा रहे हैं।

फिल्में या किसी सीरीज को चुनने का आपका पैमाना क्या है?
मैं कभी भी कोई फिल्म उसकी श्रेणी देखकर नहीं चुनता हूं। मैं खुद को एक कहानीकार मानता हूं। दुनिया में लाखों पुलिस वाले, वकील और डॉक्टर हैं लेकिन दो इंसान कभी भी एक जैसे नहीं हो सकते हैं। स्पेशल ऑप्स में मैं हिम्मत सिंह नामक एक व्यक्ति का किरदार निभा रहा हूं जो रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) में चीफ एनालिस्ट है। उसकी एक थ्योरी है जिसपर वह विश्वास करता है। समय बीतता जाता है लेकिन लोगों ने उसपर विश्वास नहीं किया।
 
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KK Menon - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
रंगमंच ने आपको बेहतर अभिनेता बनाने में किस तरह मदद की?
थिएटर और फिल्मों की कला पूरी तरह से अलग है। जहां थिएटर में हमें आखिरी दर्शक तक पहुंचना होता है वहीं फिल्मों में दर्शक कैमरे के माध्यम से हम तक पहुंचते हैं। थिएटर की कई चीजें काम भी आती हैं जैसे शारीरिक भाषा और आवाज। सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है लोगों के सामने अभिनय करने का आत्मविश्वास। यह आपके हमेशा काम आता है।
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KK Menon - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
आपने एमबीए की पढ़ाई की, फिर विज्ञापन क्षेत्र में काम किया, फिर अभिनय की तरफ कैसे आना हो गया?
मैं नौ साल की उम्र से ही एक्टिंग कर रहा हूं। शुरुआती दौर में मुझे विश्वास नहीं था कि मैं यह कर सकता हूं। इस वजह से जिंदगी को एक दिशा देने के लिए मैंने एमबीए किया। विज्ञापनों में काम भी किया लेकिन इसके समानांतर थिएटर चलता रहा। मुझे एक समय पर आकर अहसास हो गया कि मैं यह कर तो जरूर रहा हूं लेकिन मेरा स्वधर्म एक्टिंग ही है। इसके बाद मैंने सबकुछ छोड़कर इस तरफ आने का निश्चय कर लिया।

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KK Menon - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
आपकी पत्नी निवेदिता भट्टाचार्य भी अभिनय करती हैं। निजी जिंदगी में आपको इससे कितना फायदा हुआ?
मुझे इससे काफी सपोर्ट मिला। दरअसल रिश्ता हमेशा आपके काम से नहीं बल्कि इंसान से बनता है। एक ही व्यवसाय में होने से एक दूसरे को समझने में काफी आसानी हो जाती है। एक दूसरे के काम में हम सुझाव दे सकते हैं। सामने वाला चुप है या अपने काम में व्यस्त है तो उसकी भी गंभीरता समझ सकते हैं। दुनिया से दूर आप एक दूसरे के सबसे अच्छे परामर्शदाता बन जाते हैं।
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KK Menon - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
आपने शुरू में जो फिल्में कीं, अब उसी तरह के सिनेमा का दौर है, इस पर आपकी क्या टिप्पणी है?
मुझे इस बात की खुशी है कि मेरे जैसे कलाकारों ने जिस चीज की नींव डाली है उसका फल आज मिल रहा है। अब लोगों का रुझान इस तरफ हो गया है वह देखकर आनंद आता है। यह बदलाव अभी बिखरा हुआ है। जब ये लगातार 10 साल तक चलेगा तो इसे दौर कह सकते हैं।

सिनेमा को समाजिक संदेश देने का काम कितना करना चाहिए?
मैं हमेशा बोलता हूं कि सिनेमा को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। अगर सिनेमा है तो वह काल्पनिक है, भले ही वह बायोपिक ही क्यों ना हो। सिनेमा का उद्देश्य ही अलग है। इसका मकसद कहानी देना है जैसे बचपन में दादी सुनाया करती थीं। इसपर एकदम से विश्वास करके तरह तरह की टिप्पणियां करना गलत है। जो लोग सिनेमा के ऊपर नैतिक भार डालते हैं उनसे मैं सिर्फ एक ही प्रश्न पूछना चाहूंगा कि मैं अगर राजा हरिश्चंद्र पर बेहतरीन फिल्म बनाऊं तो क्या उसके बाद लोग सच बोलने लगेंगे?

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