उत्तर प्रदेश के चुनावी महासंग्राम का परिणाम आ चुका है। यूपी के इन चर्चित चेहरों के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती थी जिसका फैसला हो चुका है। जानिए किसने मारी बाजी और किसकी हुई करारी हार।
शिवपाल यादव
यूपी विधानसभा में सपा कुनबे की रार के बाद शिवपाल यादव के पास कुछ बचा था तो खुद की व्यक्तिगत राजनीतिक करियर की साख को बचाना। शिवपाल सिंह जसवंतनगर विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर पांचवी बार चुनाव लड़ रहे थे और उन्होंने अपना दबदबा बरकरार रखते हुए एकबार फिर जीत हासिल की है।
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यूपी के इन बड़े चेहरों के सामने थी कड़ी चुनौती, ये रहा फैसला
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रीता बहुगुणा जोशी
कांग्रेस को अलविदा कह भाजपा का दामन थामने वाली दिग्गज नेता रीता बहुगुणा जोशी लखनऊ कैंट से चुनाव मैदान में थीं। वो इस सीट पर वर्तमान विधायक भी हैं। ऐसे में इस सीट को बचाना उनकी प्रतिष्ठा की वजह बन गया था। हालांकि इस सीट का इतिहास हमेशा बीजेपी के पक्ष में ही रहा है। साल 2012 के चुनाव में तत्काली कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने इस सीट पर बीजेपी प्रत्याशी को हराकर जीत हासिल की थी। ऐसे में खुद के राजनीतिक तिलिस्म को बचाना रीता बहुगुणा जोशी के लिए सबसे अहम था और उन्होंने इसे साबित करके दिखाया है। अर्पणा यादव को शिकस्त देते हुए उन्होंने जीत हासिल की है।
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अपर्णा यादव
हाईप्रोफाइल चेहरों में समाजवादी पार्टी का सबसे ज्यादा चर्चित चेहरा हैं अपर्णा यादव। 26 साल की अपर्णा मुलायम सिंह यादव की बहू हैं और पार्टी की प्रतिष्ठित सीट लखनऊ कैंट से चुनाव मैदान में थीं। अपर्णा यादव बीजेपी की दिग्गज नेता रीता बहुगुणा जोशी के खिलाफ चुनाव लड़ रही थीं और इसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा है।
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स्वाति सिंह
स्वाति सिंह बीजेपी के पूर्व उत्तर प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह की पत्नी हैं। जिन्हें बसपा सुप्रीमों मायावती के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में बीजेपी ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। हालांकि उन्होंने अपने आप को साबित करते हुए बड़ी जीत हासिल की है।
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रानी पक्षालिका सिंह
रानी पक्षालिका सिंह अपने पति अरिदमन सिंह की जगह बीजेपी के टिकट पर बाह सीट से चुनाव लड़ रही थीं और उन्होंने इस महासंग्राम में जीत हासिल की है।
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मुख्तार अंसारी
यूं तो मऊ जिले की चारों विधानसभा सीटों पर भाजपा-भासपा, सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा के बीच कांटे की टक्कर थी, पर मुख्तार फैक्टर मुकाबले को थोड़ा दिलचस्प बना रहा था। मऊ जिले की सदर सीट पर मुख्य लड़ाई बसपा के प्रत्याशी और माफिया डॉन मुख्तार अंसारी, सपा के अल्ताफ अंसारी और भाजपा और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (भासपा) गठबंधन के महेंद्र राजभर के बीच थी और मुख्तार अंसारी ने इस महासंग्राम में जीत हासिल की है। मुख्तार 1996 से यहां से लगातार चार बार विधायक चुने जा चुके हैं।
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अमनमणि त्रिपाठी
नेपाल सीमा से सटे महराजगंज जिले की नौतनवां विधानसभा सीट सजायाफ्ता पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी के बेटे और पत्नी की हत्या के आरोपी अमनमणि त्रिपाठी के मैदान में होने से चर्चाएं चल रही थीं। पूर्वांचल की यह सीट इसलिए भी चर्चा में थी क्योंकि यहां अमनमणि और सपा प्रत्याशी कुंवर कौशल किशोर सिंह उर्फ मुन्ना के बीच की सियासी जंग दोनों प्रतिद्वंदी परिवारों का भविष्य तय करने वाली साबित होने वाली थी और अमनमणि ने इस जंग में जीत हासिल की है।
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स्वामी प्रसाद मौर्य
बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए दिग्गज नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को भाजपा ने पडरौना सीट से प्रत्याशी बनाया था। पडरौना से भाजपा से बागी परशुराम मिश्र मौर्य के सामने निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे। तो वहीं बसपा और कॉग्रेस से जावाद इकवाल और शिव कुमार देवी चुनावी मैदान में थे। इन सबको पछाड़ते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य ने जीत हासिल की है।
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अंबिका चौधरी
बलिया जिले की फेफना विधानसभा सीट से अंबिका चौधरी इस बार बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे। वह इस सीट पर पिछले दो दशक से अधिक समय से चुनाव लड़ रहे थे जिसमें लगातार चार बार विधायक भी रहे हैं। लेकिन इस बार सीट पर उनका जोर नहीं चला और वो जंग हार गए।
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अमिता सिंह और गरिमा सिंह
अमेठी विधानसभा सीट पर सबकी निगाहें टिकी हुईं थीं क्योंकि यहां दो रानियों की लड़ाई हो रही थी। भाजपा ने राज्यसभा सदस्य डॉ. संजय सिंह की पहली पत्नी गरिमा सिंह को प्रत्याशी बनाया था तो उनकी मौजूदा पत्नी अमीता सिंह कांग्रेस से मैदान में थीं। दोनों ने ही अपनी-अपनी जीत साबित कर दी है।
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गायत्री प्रजापति
अमेठी सीट से ही सूबे के चर्चित मंत्रियों में शुमार यहां के मौजूदा विधायक गायत्री प्रसाद प्रजापति फिर सपा से प्रत्याशी थे। सपा-कांग्रेस में गठबंधन के बावजूद यहां दोनों पार्टियों के बीच दोस्ताना मुकाबला हो रहा था और इसमें गायत्री प्रजापित का हार हुई है।
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आजम खान
तमाम सियासी गठजोड़ के बीच समाजवादी पार्टी में एक शख्स ऐसा रहा जिसका जलवा कभी कम नहीं हुआ। पार्टी के लिए आजम ट्रंप कार्ड हैं और उन्होंने इस बात को हमेशा सिद्ध भी किया है। रामपुर की सीट पर वो लगातार चुनाव जीतते आए हैं। वो सात बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। अब अपने जलवे को अपनी सीट पर फिर से कायम रखना आजम के लिए बेहद जरूरी था और इस बार भी उन्होंने इसे कायम रखा है। इस चुनावी जंग में उन्होंने एकबार फिर जीत हासिल की है।
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गुलाबी गैंग की कमांडर संपत पाल
महिलाओं की आवाज बनने वाली गुलाबी गैंग की कमांडर संपत पाल तीसरी बार विधानसभा मैदान में थे । 2006 में संपत पाल ने महिलाओं की समस्याओं पर आंदोलन शुरू किया और गुलाबी गैंग बनाया था। एक बार फिर से कांग्रेस ने संपत पाल को उम्मीदवार बनाया था लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
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आराधना मिश्रा
रामपुर खास से एक ही पार्टी से लगातार नौ बार विधायक के रूप में रिकॉर्ड बनाने वाले दिग्गज कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी की विरासत अब उनकी बेटी आराधना मिश्रा मोना संभाल रही हैं। वह 2014 में हुए उपचुनाव में पहली बार मैदान में उतरी थीं। इस बार वह कांग्रेस-सपा गठबंधन की उम्मीदवार थीं और उन्होंने जीत दर्ज की है।
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रघुराज प्रताप सिंह ऊर्फ राजा भैया
सुर्खियों में रहने वाले कुंडा के विधायक रघुराज प्रताप सिंह ऊर्फ राजा भैया फिर निर्दल चुनाव लड़ रहे थे। सन 1993 से ही लगातार विधायकी जीतते आए राजा भैया के गढ़ में उन्हें चुनौती देना भाजपा और बसपा के लिए आसान नहीं है और ठीक ऐसा ही साबित हुआ है। राजा भैया ने एकबार फिर जीत हासिल की है।
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पंकज सिंह
वेस्ट यूपी की नोएडा सीट सबसे ज्यादा हॉट बनी हुई थी। उसकी वजह है केंद्रीय गृहमंत्री और मोदी सरकार में नंबर दो माने जाने वाले राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह इस सीट से चुनाव लड़ रहे थे। भाजपा ने मौजूदा विधायक विमला बाथम का टिकट काटकर प्रदेश महामंत्री पंकज सिंह को यहां से टिकट दिया था। उनका मुकाबला सपा के सुनील चौधरी से था जो पंकज को कड़ी टक्कर दे रहे थे। लेकिन पंकज सिंह ने चुनावी जंग जीतते हुए अपना डंका बजा दिया है।
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लक्ष्मीकांत बाजपेयी
वेस्ट यूपी के प्रमुख शहर मेरठ सीट पर भाजपा के दिग्गज और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी लगातार आठवीं बार चुनावी मैदान में थे। यहां से चार बार विधायक रह चुके वाजपेयी इस बार कड़े मुकाबले में थे। सपा के रफीक अंसारी और बसपा के पंकज जौली उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे थे। पिछले चुनावों में भी मुख्य मुकाबला रफीक अंसारी और वाजपेयी के बीच हुआ था, जिसमें वाजपेयी को जीत मिली थी लेकिन इस बार वो चुनाव हार गए हैं।
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संगीत सोम
मेरठ जिले की ही सरधना विधानसभा सीट इन चुनावों में हॉट सीट के तौर पर सामने आई थी। उसकी वजह है भाजपा के फायर ब्रांड नेता और मौजूदा विधायक संगीत सोम और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नजदीकी अतुल प्रधान के बीच यहां कड़ी टक्कर चल रही थी। मुजफ्फरनगर दंगों में भड़काऊ बयान देकर चर्चा में आए संगीत सोम ने इसके बाद से खुद को लगातार भाजपा के फायर ब्रांड नेता के तौर पर स्थापित किया है तो उनके सामने लड़ रहे अतुल प्रधान की छवि जन नेता की मानी जाती है पर संगीत सोम ने जीत का परचम लहरा दिया है।
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मृगांका
शामली जिले की कैराना सीट पर भी इस बार सबकी निगाहें टिकी थीं। कैराना से हिंदुओं के पलायन का मुद्दा उठाकर भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने इस सीट को खास बना दिया था। भाजपा ने हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को इस सीट से टिकट देकर इस मुद्दे को और हवा देने का ही काम किया था। लेकिन ये योजना कामयाब नहीं हो पाई और मृगांका को हार का सामना करना पड़ा।
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श्रीकांत शर्मा
मथुरा जिले को यूं तो रालोद का गढ़ माना जाता है लेकिन बीते लोकसभा चुनावों में मोदी लहर में भाजपा की हेमा मालिनी ने यहां से बड़ी जीत दर्ज की थी। इसके बाद से ही भाजपा इस जिले में अपनी बढ़त बनाने में जुटी हुई थी। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मथुरा सदर सीट से भाजपा ने राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा को टिकट दिया था। उनका मुकाबला कांग्रेस के दिग्गज नेता और विधायक दल के प्रमुख प्रदीप माथुर से था। लेकिन श्रीकांत शर्मा ने मथुरा में अपनी जीत हासिल कर ली है।