मूल रूप से कर्नाटक के मैंगलूर की रहने वाली मार्गरेट अल्वा लंबे समय से कांग्रेस की सदस्य रहीं हैं। रोमन कैथोलिक परिवार में जन्मीं मार्गरेट की उम्र 80 साल हो चुकी है। 1999 में पहली बार अल्वा सांसद चुनी गईं थीं। इसके बाद लगातार पांच बार उन्होंने लोकसभा का चुनाव जीता।
उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए भाजपा की अगुआई वाली एनडीए के बाद अब विपक्ष ने भी उम्मीदवार का एलान कर दिया है। विपक्ष की तरफ से राजस्थान और उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल मार्गरेट अल्वा को प्रत्याशी बनाया गया है।
मूल रूप से कर्नाटक के मैंगलूर की रहने वाली मार्गरेट अल्वा लंबे समय से कांग्रेस की सदस्य रहीं हैं। रोमन कैथोलिक परिवार में जन्मीं मार्गरेट की उम्र 80 साल हो चुकी है। 1999 में पहली बार अल्वा सांसद चुनी गईं थीं। इसके बाद लगातार पांच बार उन्होंने लोकसभा का चुनाव जीता।
कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी की बेहद करीब रहीं अल्वा को उप राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाए जाने की खूब चर्चा हो रही है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर अल्वा को ही क्यों उम्मीदवार बनाया गया? कांग्रेस को इसका क्या फायदा होगा? आइए जानते हैं...
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कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के साथ मार्गरेट अल्वा
- फोटो : अमर उजाला
पहले जानिए कौन हैं मार्गरेट अल्वा
मारग्रेट अल्वा का जन्म 14 अप्रैल 1942 को हुआ था। अल्वा की पढ़ाई बेंगलुरु में हुई। 24 मई 1964 में उनकी शादी निरंजन अल्वा से हुई। उनकी एक बेटी और तीन बेटे हैं। निरंजन अल्वा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और भारतीय संसद की पहली जोड़ी जोकिम अल्वा और वायलेट अल्वा के पुत्र हैं।
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मार्गरेट अल्वा।
- फोटो : Social Media
राजनीतिक सफर कैसा रहा है?
अल्वा 1974 में पहली बार राज्यसभा की सदस्य चुनी गईं। उन्होंने छह-छह साल के चार कार्यकाल लगातार पूरे किए। इसके बाद वे 1999 में वे लोकसभा के लिए चुनी गईं। उन्हें 1984 में संसदीय कार्य राज्यमंत्री और बाद में युवा और खेल, महिला एवं बाल विकास का दायित्व भी मिला। 1991 में उन्हें कार्मिक, पेंशन, जन अभाव अभियोग और प्रशासनिक सुधार राज्यमंत्री का जिम्मा दिया गया था। अल्वा राजस्थान, गोवा जैसे राज्यों की राज्यपाल रह चुकी हैं।
आगे जानिए अल्वा को ही क्यों बनाया गया उम्मीदवार?
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मार्गरेट अल्वा
- फोटो : अमर उजाला
1. कर्नाटक चुनाव में फायदा : अगले साल यानी 2023 में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने हैं। अभी कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। भाजपा की इस जीत में पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। हालांकि, अभी येदियुरप्पा किनारे चल रहे हैं। ऐसे में राज्य के अंदर अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए कांग्रेस पूरी कोशिश कर रही है। मार्गरेट अल्वा ईसाई हैं और कर्नाटक में 1.87 प्रतिशत आबादी ईसाई है। ऐसे में कांग्रेस को इसका फायदा हो सकता है। इसके अलावा अल्पसंख्यक समुदाय से उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर मुस्लिम व अन्य अल्पसंख्यकों का भी भरोसा बढ़ेगा। इसका फायदा भी कांग्रेस को मिल सकता है।
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चिंतन शिविर में राहुल गांधी और सोनिया गांधी।
- फोटो : Social Media
2. दक्षिण और नॉर्थ ईस्ट के अन्य राज्यों पर भी नजर : कर्नाटक की तरह ही कांग्रेस की नजर दक्षिण और नॉर्थ ईस्ट के अन्य राज्यों पर भी है। अगले साल त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड, मिजोरम और तेलंगाना में भी चुनाव होने हैं। इसके अलावा 2024 में आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और महाराष्ट्र में चुनाव है। इन राज्यों में ईसाई वोटर्स की संख्या ठीक-ठाक है। पूर्वोत्तर के कई इलाकों में तो ये निर्णायक भूमिका में हैं। ऐसे में कांग्रेस को मार्गरेट अल्वा का फायदा इन राज्यों में मिल सकता है।
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सोनिया गांधी
- फोटो : अमर उजाला
3. 2024 पर नजर : कांग्रेस की नजर 2024 लोकसभा चुनाव पर भी है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में ईसाईयों की आबादी 2.30% है। हिंदू, मुसलमान के बाद सबसे ज्यादा ईसाईयों की आबादी देश में है। कांग्रेस लोकसभा चुनाव में इसका फायदा उठाने की कोशिश करेगी।
विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश
राष्ट्रपति पद के लिए टीएमसी के सांसद यशवंत सिन्हा के नाम पर विपक्ष ने मुहर लगाया। टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने खुद इसके लिए पहल की थी। अब कांग्रेस से पांच बार की सांसद रह चुकीं मार्गरेट अल्वा को उपराष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार बनाया गया है। यशवंत सिन्हा बिहार के रहने वाले हैं, जबकि अल्वा कर्नाटक की हैं। उत्तर भारत के ज्यादातर बड़े विपक्षी दलों ने यशवंत सिन्हा को समर्थन दिया, जबकि दक्षिण भारत के विपक्षी दल एनडीए के साथ आ गए। अब दक्षिण भारत से उप राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस दक्षिण भारत के अन्य विपक्षी दलों को एकसाथ लाने की कोशिश करेगी।