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कद बढ़ाने की होड़ में ओबामा से पिछड़ गए पुतिन, भारत बना गवाह

Sat, 08 Sep 2018 09:48 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
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दुनिया के दो शक्तिशाली नेताओं में कद बढ़ाने की होड लगी है। इनमें से एक अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा हैं तो दूसरे रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन हैं। खास बात है कि ये दोनों बिल्कुल पास-पास हैं। यूं कहिये कि महज पांच-सात मीटर की दूरी पर खड़े होकर कद बढ़ाने की होड कर रहे हैं। यह भी जान लीजिये कि ओबामा इस होड में 2015 के दौरान शामिल हुए हैं तो पुतिन साल 2000 से इस मशक्कत में लगे हैं। अभी तक का नतीजा देखें तो जीत बराक ओबामा की होती दिख रही है। वे बहुत देर से इस होड में शामिल हुए थे, मगर उन्होंने पुतिन को महज तीसरे साल में ही पछाड़ दिया है। जानिये, आखिर यह राज क्या है...
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बात इतनी सी है कि विभिन्न राष्ट्र अध्यक्षों एवं शासनाध्यक्षों ने अपनी भारत यात्रा के दौरान राजघाट पर बापू यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि के चारों ओर पौधे लगाए थे। अब वे पौधे बड़े होकर वृक्ष बन गए हैं। कोई वट वृक्ष की श्रेणी में आ गया है तो कोई अभी बढ़ना ही शुरू हुआ है। इन्हीं में कुछ पेड़ ऐसे हैं जो कद के हिसाब से बहुत अधिक ऊंचाई पर जा पहुंचे हैं तो कई ऐसे हैं जो दशकों बाद भी कद बढ़ाने की जोर-आजमाइश में लगे हैं, मगर सफलता नहीं मिल पा रही।
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रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन साल 2000 में भारत यात्रा पर आए थे। उन्होंने राजघाट पर तीन अक्तूबर को हिम चम्पा का पौधा लगाया था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब भारत आए तो उन्होंने भी 25 जनवरी 2015 को राजघाट पर ज्ञान वृक्ष यानी पीपल का पौधा लगा दिया। बता दें कि रूसी और अमेरिकी राष्ट्रपतियों के पौधे आसपास ही लगे हैं। आज स्थिति यह है कि बराक का पीपल बहुत तेजी से बढ़ रहा है और अभी तक वह 25 फीट से उपर पहुंच चुका है। दूसरी ओर पुतिन का हिम चम्पा 18 साल बाद भी 15 फीट से ऊपर नहीं जा सका। दोनों को खुराक बराबर की मिलती है, मगर कद बढ़ाने की होड में आखिरकार ओबामा रूसी राष्ट्रपति पुतिन से बाजी मार ही गए।

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जॉर्ज बुश की बात करें तो उनके ‘आम’ ने कई नेताओं को पीछे छोड़ दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति रहे जॉर्ज बुश का भी राजघाट में अपना ही एक अलग जलवा है। जब वे उपराष्ट्रपति थे तो 1984 में भारत आए थे। उन्होंने बापू की समाधि के निकट 14 मई को आम का पौधा लगाया था। आज वह पौधा वट वृक्ष बन चुका है। बुश के आम की खासियत है कि यह करीब सात फीट की ऊंचाई पर जाने के बाद दो शाखाओं में विभाजित हो गया। इस वजह से यह भारी भरकम वृक्ष की श्रेणी में आता है। इसकी ऊंचाई भी अधिक है। एक और अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भी पुतिन जैसा हाल है। उन्होंने खूब जोर लगाया, मगर कद नहीं बढ़ सका। वे भी राजघाट पर पुतिन के साथ ही खड़े हैं। क्लिंटन ने 23 मार्च 2000 को यहां हिम चम्पा का पौधा लगाया था।
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सबसे ऊंचा कद होने की दौड़ में तो अर्जेंटीना के राष्ट्रपति बाजी मार ले गए

अर्जेंटीना के राष्ट्रपति आर्तुरो फ्रोंडीजी ने यहां पांच दिसंबर 1961 को टेबीबुआ का पौधा लगाया था। यह पौधा दूसरों से अलग ही था। आज राजघाट में अगर सबसे ज्यादा ऊंचाई वाला कोई वृक्ष है तो वह टेबीबुआ ही है। यह अपनी प्रजाति का अकेला वृक्ष है। बाकी नेताओं ने जो पौधे लगाए थे, वे किसी न किसी से थोड़ी बहुत समानता रखते हैं, लेकिन आर्तुरो के टेबीबुआ का अपना अलग ही अंदाज है।
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एनजी आयंगर का लगाया पौधा आज जीवन के अंतिम चरण पर है

एक जुलाई 1950 में एनजी आयंगर ने राजघाट पर कचनार का पौधा लगाया था। आज वह पौधा अपने जीवन की सभी अवस्थाएं भोगने के बाद अंतिम चरण में है। आयु ज्यादा होने के कारण यह वृक्ष अब कई जगह से खोखला हो चुका इै। आंधी तूफान में लगभग सभी शाखाएं टूट चुकी हैं। इन्हीं के निकट खड़ा अमलतास का भी कुछ ऐसा ही हाल है। इसे जीएल नंदा ने एक जुलाई 1950 को लगाया था। इनके साथ ही एनवी गाडगिल द्वारा लगाया गया अमलतास खड़ा है। लुआंग फीनिट अकसोर्न के विशेष दूत एवं मंत्री रॉयल थाई लिगेशन टू इंडिया और मंत्री चेकोस्लोवाकिया ने भी इन नेताओं के साथ ही यहां पर अमलतास के पौधे लगाए थे।
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वियतनाम के प्रधानमंत्री के बांस अभी तक सुरक्षित हैं, मंडेला जी भी अच्छे हैं

आठ अप्रैल 1980 को वियतनाम के प्रधानमंत्री फाम वान डोंग दिल्ली आए थे। उन्होंने राजघाट पर पीला बांस लगाया था। हालांकि बाद में वह काफी दूरी तक फैल गया। पुराने बांस के पौधे खत्म हो जाते हैं तो उनकी जगह पर नए पौधे उगते रहते हैं। मतलब, डोंग का बांस बूढ़ा होने का नाम ही नहीं ले रहा है। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रहे डॉ नेलसन मंडेला भी 16 अक्तूबर 1990 को दिल्ली आए थे। हालांकि वे उस वक्त उप राष्ट्रपति थे। उन्होंने यहां पर कदंब लगाया था। आज वह पौधा वट वृक्ष बन चुका है। राजघाट पर इसे भी बड़े कद वाले वृक्षों में गिना जाता है।
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जर्मनी के चांसलर रह गए सबसे छोटे

महामहिम कार्ल कार्सटेंस, जर्मनी के राष्ट्रपति ने चार मार्च 1981 को राजघाट पर स्वर्ण चंपा का पौधा लगाया था। करीब 38 साल बाद अगर उनके लगाए गए पौधे का कद देखें तो आज वह सबसे छोटा रह गया है। जितना लगा था, आज भी उतना ही है। राजघाट समिति के कर्मियों का कहना है कि यह पौधा ज्यादा फैलता नही है। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने 25 जनवरी 2016 को मोलश्री का पौधा लगाया था। यह पौधा अब तेजी से बढ़ रहा है। कर्मचारियों ने बताया कि यहां पर करीब दर्जनभर पौधे हर समय पौधारोपण के लिए तैयार रहते हैं। जब भी कोई विदेशी मेहमान आता है तो गमले में लगे इन पौधों को पानी में नहलाकर सुंदर बना दिया जाता है। हालांकि किसी वीआईपी के आने की सूचना करीब एक सप्ताह पहले उन्हें जाती है। इससे वे पौधा रोपण की तैयारी अच्छे से कर लेते हैं।
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