आज हम आपको बताएंगे कि 1952 से लेकर अब तक देश में कब-कब ऐसा हुआ जब कोई उम्मीदवार निर्विरोध उपराष्ट्रपति चुना गया। निर्विरोध उपराष्ट्रपति बनने वाले वो कौन से शख्स हैं और क्या है उनके उपराष्ट्रपति बनने के पीछे की पूरी कहानी
जगदीप धनखड़ देश के अगले उपराष्ट्रपति होंगे। उन्होंने कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को उपराष्ट्रपति चुनाव में हरा दिया है। धनखड़ को चुनाव में 528 मत प्राप्त हुए, वहीं अल्वा को 182 वोट मिले हैं। जबकि 15 वोटों को रद्द कर दिया गया है। आज हम आपको बताएंगे कि 1952 से लेकर अब तक देश में कब-कब ऐसा हुआ जब कोई उम्मीदवार निर्विरोध उपराष्ट्रपति चुना गया।
निर्विरोध उपराष्ट्रपति बनने वाले वो कौन से शख्स हैं और क्या है उनके उपराष्ट्रपति बनने के पीछे की पूरी कहानी... आइए जानते हैं।
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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
- फोटो : Facebook/All India Radio News
जब पहली बार ही निर्विरोध चुने गए उपराष्ट्रपति
ये 1952 की बात है। उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए 21 अप्रैल 1952 तक नामांकन मांगे गए थे। इसमें दो प्रत्याशियों ने नामांकन भरा था। पहले डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन थे और दूसरे शेख खादिर हुसैन। नामांकन पत्रों की जांच के बाद शेख खादिर का नामांकन रिटर्निंग ऑफिसर ने निरस्त कर दिया। इसके बाद केवल डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन बचे। जिन्हें निर्विरोध उपराष्ट्रपति चुन लिया गया।
1957 में लगातार दूसरी बार डॉ. राधाकृष्णन निर्विरोध उपराष्ट्रपति चुने गए। तब उनके खिलाफ किसी ने नामांकन नहीं किया था। इसके बाद 1962 में वह देश के दूसरे राष्ट्रपति चुने गए।
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मोहम्मद हिदायतुल्लाह
- फोटो : अमर उजाला
चीफ जस्टिस जब उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति बने
1979 की बात है। तब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रहे मोहम्मद हिदायतुल्लाह ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन किया। हिदायतुल्लाह के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा हुआ और वह निर्विरोध उपराष्ट्रपति बन गए। हिदायतुल्लाह पहले ऐसे शख्स हैं, जो देश के तीन बड़े संवैधानिक पदों पर रहे।
1968 में उन्होंने देश के चीफ जस्टिस का पद संभाला। इसी दौरान 1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन का निधन हो गया। हुसैन के निधन के बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति वीवी गिरी कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। जब राष्ट्रपति चुनाव का एलान हुआ तो गिरी राष्ट्रपति उम्मीदवार बने। इसके लिए उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा। गिरी के इस्तीफे के बाद प्रोटोकॉल के मुताबिक चीफ जस्टिस हिदायतुल्लाह को देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया। वो 35 दिन इस पद पर रहे। 10 साल बाद 1979 में वो देश के उपराष्ट्रपति बने।
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शंकर दयाल शर्मा
- फोटो : अमर उजाला
जब एक साथ 26 प्रत्याशियों का नामांकन रद्द हो गया
1987 का उपराष्ट्रपति चुनाव भी काफी रोचक था। तब कुल 27 उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया था, लेकिन 26 उम्मीदवारों का नामांकन रद्द कर दिया गया। रिटर्निंग ऑफिसर ने सिर्फ डॉ. शंकर दयाल शर्मा के नामांकन को ही वैध बताया था। नाम वापसी की अंतिम तिथि समाप्त होने के बाद डॉ. शंकर दयाल शर्मा को निर्विरोध देश का उपराष्ट्रपति चुना गया था
डॉ. शर्मा ने तीन सितंबर, 1987 को उपराष्ट्रपति का पद ग्रहण किया। 1987 में मतदाताओं की कुल संख्या 790 थी। मध्य प्रदेश के रहने वाले डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में भी काम किया था। इसके अलावा, उन्होंने महाराष्ट्र, पंजाब और आंध्र प्रदेश के राज्यपाल के तौर पर भी कार्य किया। बाद में डॉ. शंकर दयाल शर्मा राष्ट्रपति भी बने। वेंकटरमण के बाद शंकर दयाल शर्मा दूसरे राष्ट्रपति रहे जिन्होंने चार प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया।
उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, वेंकैया नायडू
- फोटो : Twitter
क्या काम करते हैं उपराष्ट्रपति, क्या शक्तियां मिली हुई हैं?
उपराष्ट्रपति राज्यसभा के अध्यक्ष होते हैं। राज्यसभा के संचालन की जिम्मेदारी उन्हीं की होती है। यह अमेरिकी उपराष्ट्रपति के समान है, जो सीनेट के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य करते हैं।
राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति ही उनके सारे कामकाज संभालते हैं।
उपराष्ट्रपति अधिकतम छह महीने तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर सकते हैं। इस बीच नए राष्ट्रपति का निर्वाचन कराना अनिवार्य होता है।