तबले के ताल गुरु थे उस्ताद जाकिर हुसैन। वह भारतीय संगीत के सिरमौर और दुनिया की अजीम शख्सियत थे। उन्होंने तीन पीढ़ियों के संगीतकारों के साथ तबले पर अपनी छाप छोड़ी। पंडित रवि शंकर के सितार के साथ तबले पर थाप दी, तो पंडित अजय चक्रवर्ती के गायन को भी सजाया और राकेश चौरसिया की बांसुरी को संवारा। उनके तबले की थाप अनंत काल तक गूंजती रहेगी...
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संगीत की जो विद्या है, वह बहुत तेज बहती हुई नदी है। जिस भी कलाकार के पास आप सीखने जाएंगे, वह यह कहेगा कि इस नदी से एक कप पानी निकालो, एक बाल्टी पानी निकालो या एक टैंकर पानी निकालो, लेकिन निकालना आपको ही है। यह आपकी प्रतिभा है। गुरु शिष्य को सिखाता नहीं है, शिष्य गुरु को सिखाने के लिए प्रेरित करता है। आप आते हैं शिष्य बनकर कि कल कुछ और सीखा था, आज कुछ और सीखेंगे, कल कुछ और सीखेंगे, परसों कुछ और सीखेंगे।
मेरे पिता ही मेरे गुरु थे...
वे कब पिता होते, कब गुरु, कब दोस्त- मेरे लिए ये सब आपस में मिले हुए हैं। दो दिन का था, पिता जी की गोद में मुझे दिया गया। हमारे यहां बच्चे के कान में अजान देने का रिवाज है, ढेर सारे लोगों के यहां मंत्र पढ़ने का रिवाज होगा, लेकिन मेरे पिता जी ने मेरे कान में तबले के बोल पढ़े। मां नाराज भी हुईं। कहा- ‘ये क्या है, आपको कुरान के बोल पढ़ने चाहिए।’ पिता जी ने कहा- ‘यही मेरा कुरान है, यही मेरी इबादत है।’ तब से उनकी रोज यह आदत थी कि वे घंटा-डेढ़ घंटा तबले के बोल पढ़ने लगते। मुझे तो कुछ समझ में क्या आता होगा, लेकिन मेरे कान में कुछ पढ़ा जाता था। यह कुछ वैसी ही कहानी है, जैसे अर्जुन ने अभिमन्यु की मां के जो बताया था, वह कहीं अभिमन्यु की स्मृति में रह गया। इस प्रकार उन्होंने मुझे तालीम दी थी।
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अपने पिता के साथ उस्ताद जाकिर हुसैन (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला / एजेंसी
वाद्य की इज्जत करें...
मेरे पिता जी हमेशा कहते थे कि यह सरस्वती है, इसकी इज्जत करो, इसे रास्ते की कोई चीज न समझो। कभी तबले के पास जूता न रखो, तबले पर कभी अपने कपड़े न रखो, उसको एक पूजा की चीज समझो। हर वाद्य में एक रूह है, एक आत्मा है। अगर आपको एक अच्छा कलाकार बनना है तो आपको उस वाद्य से इजाजत लेनी है कि वह वाद्य आपको स्वीकार करे। मैं 12 साल का था, तब से मैंने तबला बजाने का सफर शुरू किया था। मुंबई से जा रहे हैं, मुगलसराय में उतरकर ट्रेन बदल रहे हैं, पटना या कोलकाता जा रहे हैं। हम छोटे थे और इतने पैसे नहीं होते थे कि आरक्षण वगैरह करा सकें। उस समय बस यह था कि ट्रेन में घुसना है। लेकिन दिमाग में यह भी होता था कि पिता का आदेश है कि यह सरस्वती है, तो तबले को कोई धक्का भी नहीं पहुंचना चाहिए। तो सीट तो मिलती नहीं, अखबार बिछाकर नीचे बैठ जाता और गोद में तबला ले लेता, जिससे उसे धक्का न लगे।
उस्तादजी बेहद सरल इन्सान थे। उनका मन बाल सुलभ था। यह दुर्लभ तस्वीर 1980 के दशक में लखनऊ की है, जिसमें जाकिर रिक्शा चला रहे हैं और महान कथक नर्तक बिरजू महाराज पीछे बैठे हैं।
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Ustad Zakir Hussain Passed Away: उस्ताद जाकिर हुसैन नहीं रहे, 73 की उम्र में निधन | Amar Ujala |
- फोटो : self
तबला संगत का साज है...
तबला वादक को संगत करना आना जरूरी है, क्योंकि एकल तबला वादन तो आप आराम से कर लेंगे। जब आपकी तालीम होती है तो आपकी सोलो की तालीम होती है। आप सीखी हुई चीजें बजा देंगे और आपकी प्रशंसा हो जाएगी, लेकिन जब तक संगत करना नहीं आएगा, तब तक आप तबलिए नहीं बन सकते। आज आप श्रुति सडोलीकर के साथ तबला बजा रहे हैं और 10 दिन बाद अगर आपका किशोरी अमोनकर (अब दिवंगत) के साथ कार्यक्रम है तो आपकी संगत अलग होगी। आपको इसको सीखना होगा। आपको बंदिशों को जानना होगा, उनके भावों को जानना होगा। तबला वादक को गायन की समझ जरूरी है, वाद्य संगीत और नृत्य की समझ जरूरी है। उनकी बंदिशें, गतें याद होनी चाहिए। मैं पंडित रवि शंकर जी के साथ यात्रा पर था। मैं 17 साल का था। एक कार्यक्रम हुआ, दूसरा कार्यक्रम हुआ, मैंने रवि शंकर जी से पूछा कि कैसा हो रहा है? रवि शंकर जी ने कहा कि तुम मेरे साथ तबला बजाते हो, लेकिन मुझे देखते क्यों नहीं? यकीन करिए कि उस दिन जब शाम को कार्यक्रम हुआ, मैं रवि शंकर जी की ओर थोड़ा और घूमकर बैठ गया। उस दिन संगत की एक नई किताब खुल गई।
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पिता और गुरू के साथ परफॉर्म करते उस्ताद जाकिर हुसैन।
- फोटो : instagram: hcmaeofficial
तबले पर डमरू और शंख
कैलाश पर्वत पर शिव जी के डमरू से जो शब्द निकले थे, उसे गणेश जी ने लेकर ताल की जुबान पर बांधा था। वही शब्द हम सब आज बजाते हैं, क्योंकि गणेश जी हमारे गुरु देव हैं। उन्होंने जो पखावज के लिए लिखा था, वही अब तबले पर बजता है। कल्पना कीजिए, कैलाश पर्वत पर शिव जी का डमरू बज रहा है और उनके शिष्यगण शंख बजा रहे हैं, दोनों की एक साथ जो ध्वनि होगी तो क्या वातावरण होगा! यह एक कल्पना है, एक सेवा है, ऊर्जा है तबले में उस वातावरण की। ...उस्ताद जाकिर हुसैन
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स्वर्ग में भी गूंजती रहेगी उनकी थाप: विख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान
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विख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान ने यादें ताजा कीं
- फोटो : अमर उजाला
मेरे पास कहने के लिए शब्द नहीं हैं। जाकिर भाई के बारे में सुनकर मैं पूरी तरह टूट गया हूं और सदमे में हूं। उस्ताद जाकिर हुसैन विलक्षण प्रतिभा के धनी कलाकार थे। वह वास्तव में दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय संगीतकारों और सबसे प्रतिभाशाली तबला वादकों में से एक थे। जाकिर भाई के साथ 1974 के बाद मेरी कुछ संगीत प्रस्तुतियां हुई थीं, तब उनके वालिद उस्ताद अल्ला रक्खा जीवित थे। जाकिर भाई ने दुनियाभर में तबला और भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए जो कुछ किया, वह वास्तव में अभूतपूर्व है। वह धरती पर सबसे ज्यादा पंसद किए जाने वाले संगीतकारों में से एक थे, जिन्होंने दुनिया-जहां में चमक बिखेरी। संगीत प्रतिभा के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व भी बेमिसाल था। संगीत में उत्कृष्टता के साथ जाकिर भाई के व्यक्तित्व का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह था कि वह अपने साथी संगीतकारों और दोस्तों के बेहद मददगार थे। वरिष्ठ संगीतकारों के प्रति सदैव उनका असाधारण सम्मान और समर्पण रहता था। वह हर समय, जब भी जरूरत पड़े, मदद के लिए तैयार रहते थे। यहां तक कि जरूरत पड़ने पर साथी कलाकार का साज उठाने तक में उसकी मदद करते थे। वह वास्तव में एक पूर्ण संगीतकार थे, जो बेहद विनम्र और शालीन स्वभाव के धनी थे। मुझे उनकी बहुत याद आएगी। मैं उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं! स्वर्ग में भी उनकी ताल की थाप गूंजती रहेगी।
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सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित अजय चक्रवर्ती ने बताया जीनियस
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अजय चक्रवर्ती ने उस्ताद से जुड़ी यादें साझा कीं
- फोटो : अमर उजाला
उस्ताद जाकिर हुसैन जैसा कलाकार सौ साल में पैदा होना भी मुश्किल है। उनके साथ मेरा संपर्क करीब 48 वर्षों का रहा। इतने वर्षों से मैंने उनके साथ यात्राएं कीं और कार्यक्रम किए। मैं अमेरिका 1981 में गया था। वह हमारे ड्राइवर थे, सब जगह हमें ले गए, साथ कार्यक्रम किए, एक कमरे में ही हम बहुत दिनों तक साथ रहे। आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी की ओर से हम लोग उन दिनों बहुत यात्राएं करते थे। कह सकता हूं कि वह अपनी कला के शिखर पर रहते हुए हमसे बिछड़ गए। मुझे नहीं मालूम कि ईश्वर ऐसे कलाकारों को इतनी जल्दी हमसे क्यों छीन लेते हैं? उस्ताद जाकिर हुसैन के लिए एक शब्द कहा जा सकता है- जीनियस, ऑल टाइम जीनियस! उन्होंने अपने काम को कभी भी कमजोर नहीं पड़ने दिया। उस्ताद अल्ला रक्खा साहब को ऐसा बेटा, ऐसा शागिर्द मिला, यह बहुत बड़ी बात है। मैं 35-40 सालों से सिखा रहा हूं, ऐसा शागिर्द मिलना बहुत मुश्किल काम है। मुझे लगता है कि अगर गायन में उन्होंने सबसे ज्यादा किसी के साथ संगत की तो वह मेरे साथ ही की, लेकिन वह कभी हावी होने की कोशिश नहीं करते थे। पूरी दुनिया में हमने साथ कार्यक्रम किए, इसी साल फरवरी में पुणे में हमारा साथ कार्यक्रम हुआ। वह गायन के साथ बहुत कम कार्यक्रम करते थे, लेकिन मेरे साथ खूब करते थे। उनकी उपस्थिति ही मुझे बहुत आनंदित करती थी, क्योंकि मैं उन्हें समझता था और वह भी मुझे बहुत अच्छी तरह जानते थे। वह मेरे बुलावे पर तीन बार आए और कोई पारिश्रमिक नहीं लिया। मैं मानता हूं कि आप अच्छे इन्सान नहीं हैं तो भी आप अच्छे कलाकार हो सकते हैं, लेकिन अगर आप अच्छे इन्सान होंगे तो आपको बहुत समय तक याद किया जाता रहेगा। वह श्रेष्ठ कलाकार के साथ ही बहुत भले इन्सान भी थे।
उन्होंने शास्त्र को रुचिकर बना दिया: पं. विश्वमोहन भट्ट
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पंडित विश्वमोहन भट्ट ने जाकिर हुसैन के योगदान को याद किया
- फोटो : अमर उजाला
उस्ताद जाकिर हुसैन के स्वास्थ्य के बारे में मुझे थोड़ा पहले पता चलने लगा था, क्योंकि वह भारत के अपने कुछ संगीत कार्यक्रम रद्द करने लगे थे। फिर वह अस्पताल में भर्ती हो गए। वह महान कलाकार थे। उन्होंने तबले को इतना लोकप्रिय बनाया, जो शायद ही किसी ने बनाया हो। उन्होंने इसे जनता से जोड़ा, शास्त्रीय संगीत के शास्त्र को उन्होंने दर्शकों पर लादा नहीं, बल्कि उसे रुचिकर बनाकर लोगों के सामने प्रस्तुत किया। अपने ग्लैमर और अपनी स्टाइल से वह तबले के सुपर कलाकार बन गए। वह ऐसे कई प्रयोग करते थे, जैसे कि बाएं तबले पर डमरू बजता और दाएं तबले पर मंदिर में घंटी की आवाज आती। कभी ट्रेन की, कभी घोड़े की चाल दिखाने लगते। वह रेला बजाकर दूसरी कठिन रचनाओं को इसी प्रकार लोकप्रिय कर देते थे, लेकिन जब वह संगत करते थे तो बहुत संभल कर बजाते थे और हावी होने का प्रयास नहीं करते थे। मुझे याद है कि मेरा एक कार्यक्रम था चेन्नई में। तबले पर उस्ताद जी, विक्कू विनायक जी घट्म पर और रमणी साहब बांसुरी पर थे, लेकिन उन्होंने ऐसी संगत की कि कार्यक्रम पर अपने ग्लैमर को हावी नहीं होने दिया। कह सकता हूं कि उस्ताद जाकिर हुसैन ने विश्व में तबले और भारतीय संगीत को बहुत लोकप्रिय किया। पंडित रवि शंकर के बाद वही ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने भारतीय संगीत को विश्व स्तर पर इतना लोकप्रिय किया। ---------पं. विश्वमोहन भट्ट, प्रख्यात मोहन वीणा वादक
-आलोक पराड़कर से बातचीत पर आधारित
दस अंगुलियों में दस आंखें
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जाकिर हुसैन के साथ उस्ताद अकरम खान
- फोटो : अमर उजाला
उस्ताद जाकिर हुसैन और मेरा बहुत लंबा साथ रहा। 1978 में जब वह मेरठ आए थे, तब मैं आठवीं क्लास में पढ़ता था। मेरे वालिद साहब ने कहा कि उस्ताद अल्ला रक्खा साहब के बेटे जाकिर आए हैं। उनका तबला सुनकर देखो और फिर कोशिश करना और वैसे ही रियाज करके अपने तबले को आगे बढ़ाना। जब मैंने उनको सुना तो मुझे ऐसा लगा, जैसे कोई फरिश्ता तबला बजा रहा हो। उनकी दस अंगुलियों में दस आंखें थीं। मेरी उनसे आखिरी मुलाकात गुरु पूर्णिमा पर हुई थी, जब मैं और मेरा बेटा जरगाम उनसे मिले थे। उस्ताद अल्ला रक्खा साहब के जन्म शती समारोह में हम छह तबला वादकों ने तीन ताल में एक जुगलबंदी प्रोग्राम पेश किया था। खास बात यह थी कि वह पहले से तय नहीं था। एक दिन पहले जाकिर भाई का मैसेज आया कि अब्बा जी के 100वें साल पर हम एक साथ बैठेंगे और तबला बजाकर अब्बा जी को याद करेंगे। वह उस समारोह का पहला प्रोग्राम था, जिसे मैंने, फजल भाई, जाकिर भाई, शुभांकर भाई, योगेश जी और सुरेश तलवलकर जी ने पेश किया था। एक बार उन्होंने मुझसे कहा था कि तबला वादक एक सारथी होता है, जिसका काम है गड्ढों से बचाके, परेशानियों से बचाके, सफर को अच्छा करके उसको मंजिल तक पहुंचाना। यह बात उनके तबले में हमेशा दिखाई दी। उनकी शख्सियत भी बेमिसाल थी। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम साहब जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने पंडित जसराज जी के निर्देशन में ‘तिरंगा’ नाम से एक कार्यक्रम रखा। मैं कुछ लेट हो गया, सो जल्दी-जल्दी अपना साउंड चेक करने के लिए जाने लगा। तभी रास्ते में जाकिर भाई ने मुझे रोका और बोले, “मैंने आपका साउंड चेक कर दिया। आइए, हम लोग कॉफी पीते हैं।” ------- उस्ताद अकरम खान, मशहूर तबला वादक
-रघुवीर सिंह से बातचीत पर आधारित
वह सुनते बहुत थे...
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उस्ताद शुजात खान ने जाकिर हुसैन से जुड़ी यादें ताजा कीं
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उस्ताद जाकिर हुसैन मेरे बचपन के दोस्त थे। वैसे वह मुझसे बड़े थे, लेकिन हमने बहुत वक्त साथ गुजारा। हमारे माता-पिता एक-दूसरे के गहरे दोस्त रहे। उनके जाने से हमारे परिवारों को ही नहीं, बल्कि पूरा संगीत जगत, पूरा हिंदुस्तान और पूरी दुनिया सदमे में है। कुछ साल पहले दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में हम दोनों ने एक साथ वादन किया था। वह बहुत जिंदादिल इन्सान थे। कई साल पहले वह जब मेरे बेटे की शादी में आए तो डांस करने लगे। जाकिर भाई का एक कमाल था कि जब वह सोलो बजाते थे तो अलग ढंग से बजाते थे। जब वह किसी के साथ संगत करते थे, जैसे उस्ताद विलायत खान साहब, पंडित शिव कुमार शर्मा या मेरे साथ, तो यह ध्यान रखते थे कि वह किस कलाकार के साथ बजा रहे हैं और उसके संगीत को किस तरह उनका तबला निखार सकता है। दरअसल, वह सुनते बहुत थे। एक बार पंडित जसराज जी के साथ संगत कर रहे थे, तो पूरे गायन के दौरान उन्होंने केवल सादा ताल ही बजाई। लोग इंतजार करते रहे कि जाकिर साहब कब कोई टुकड़ा, परन या तिहाई लगाएं! बाद में कुछ जिज्ञासुओं ने पूछा तो उन्होंने समझाया कि यह गाना सुबह के राग में था और सुबह के वक्त एक अलग तरह का अहसास होता है। इसमें टुकड़ा, परन या तिहाई सुनाकर ताली बटोरना बेईमानी है। स्टेज पर ऐसा निस्वार्थ स्वभाव बिरले और गंभीर कलाकारों का ही होता है, जो जानते हैं कि वे क्या हैं। तबला वादन के क्षेत्र में जाकिर भाई ने कई नायाब खोजें कीं। वह शौक से अलग-अलग ताल बजाते थे, लेकिन हमेशा यही कहते थे कि सच में तालों का राजा तीन ताल ही है और उसके अंदर आप क्या कर सकते हैं, वह दिखाइए। ------------उस्ताद शुजात हुसैन खान, प्रसिद्ध सितार वादक
ताल सम्राट जाकिर हुसैन नहीं रहे...उनके तबले की थाप सीमाओं, संस्कृतियों और पीढ़ियों से परे सार्वभौमिक भाषा बोलती थी। अपनी अंगुलियों के हुनर से उन्होंने भारतीय तबले को वैश्विक मंच पर पहुंचाया। संगीत के पुरोधा, रचनात्मकता के दिग्गज, हर पीढ़ी की पसंद उस्ताद जाकिर हुसैन की सांसों की संगत भले टूट गई हो, लोगों के दिलों में उनकी कला और हुनर की गूंज हमेशा रहेगी। देश की एक पूरी पीढ़ी को झुमा देने वाली तबले की थाप अचानक थम गई। महान तबला वादक और तबले को ही जीवनसाथी, भाई व दोस्त करार देने वाले उस्ताद जाकिर हुसैन (73) ने अमेरिका के सान फ्रांसिस्को के अस्पताल में भारतीय समयानुसार सोमवार सुबह 5:30 बजे अंतिम सांस ली। उस्ताद जाकिर की टीम ने बताया कि वह फेफड़ों की बीमारी आईडियोपेथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस से पीड़ित थे। वह दो सप्ताह से अस्पताल में थे। तबीयत बिगड़ने पर रविवार को उन्हें आईसीयू में स्थानांतरित किया था।
पिता उस्ताद अल्लारक्खा की विरासत संभाली
तबला वादन हुसैन को पिता उस्ताद अल्लारक्खा से विरासत में मिला था। अल्लारक्खा भी विश्व प्रसिद्ध संगीतकार थे, पर संगीत की दुनिया में हुसैन ने पिता को कहीं पीछे छोड़ दिया। हुसैन के जन्म के बाद पिता ने उनके कान में तबले की थाप सुनाई थी।
पांच ग्रैमी
इस वर्ष 66वें ग्रैमी पुरस्कार समारोह में तीन पुरस्कार सहित पांच ग्रैमी पुरस्कार जीते। 2024 में एक बार में तीन ग्रैमी आवार्ड जीतने वाले पहले भारतीय। इससे पहले 1992 और 2009 में भी ग्रैमी पुरस्कार मिला।
संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार (1990)
संगीत नाटक अकादेमी फेलोशिप (2018)
अमेरिका से राष्ट्रीय विरासत फेलोशिप (1999)
तीनों पद्म सम्मान
उस्ताद जाकिर हुसैन को भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके अतुल्य योगदान के लिए 1988 में पद्मश्री, 2002 में पद्म भूषण और 2023 में पद्म विभूषण प्रदान किया गया था।
रचे सुरों के नए आयाम
1973 में गिटारवादक जॉन मैकलॉगिन, वायलिन वादक एल शंकर व ताल वादक टीएच, विक्कू विनायकराम के साथ तैयार उनकी जुगलबंदी दुनिया में छा गई। इसमें शास्त्रीय संगीत का पश्चिम के जैज के साथ मिश्रण किया गया।
फिल्मों में भी काम:
साज (1997), थंडुविटेन एननाई (1991),
हीट एंड डस्ट (1984), मिस बीट्टीज चिल्ड्रन (1992),
द परफेक्ट मर्डर (1998), जाकिर एंड हिज फ्रेंड्स (1998),