फाउंडेशन के महासचिव डॉक्टर हरीश भल्ला ने इसकी जरूरत बताते हुए कहा कि दरअसल हिंदुस्तान में कला और कारोबार का रिश्ता सदियों से रहा है। यह इस देश में देह और आत्मा जैसे संबंध की तरह है। तभी तो ढोलक बनाने वाला खुद भी अच्छी ढोलक बजाता है, मृदंग और तबला बनाने वाला उन्हें बजाकर दिखाता है। यही हाल सारंगी, डफली, हारमोनियम, मंजीरे, खड़ताल, जल तरंग, बांसुरी और मटकी बजाने वालों का है।