धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही हैं
कश्मीर मुख्य रूप से अपनी खूबसूरत वादियों, घाटियों और प्राकृतिक नजारों के लिए मशहूर है। हालांकि इनके अलावा भी यहां ऐसी कई चीजें हैं, जिनसे प्यार या फिर उनका दीदार हर कोई करना चाहता है। इनमें पश्मीना शॉल, कश्मीरी संगीत, कला और शिल्प, शिकारा और व्यंजनों से लेकर तमाम ऐसी चीजें हैं, जिनका सामना होते ही लोग कह उठते हैं- वाह कश्मीर! वाकई खुदा ने जितनी फुर्सत में कश्मीर को बनाया है, उतनी ही फुर्सत और कलात्मकता से यहां के लोग यहां उपलब्ध चीजों को संवारते हैं। हम आज आपको यहां की ऐसी ही बेइंतहा खूबसूरत चीजों के बारे में बता रहे हैं
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कश्मीर
- फोटो : amar ujala
कुछ खास बातें जो कश्मीर को कश्मीर बनाती हैं
मशहूर सूफी कवि अमीर खुसरो ने खूबसूरत शब्दों के साथ कश्मीर के बारे में कहा कि "गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त/ हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त" (धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही हैं)
कश्मीर जिसको जमीन की जन्नत कहा जाता है, उस का नाम कश्यप ऋषि के नाम पर रखा गया था।
जम्मू का नाम वहां के राजा जम्बू लोचन के नाम पर रखा गया था और कश्मीर का नाम सतीसर अर्थात् कछुओं की झील से पड़ा था।
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कश्मीर: कब, किसने दस्तक दी
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कश्मीर
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कश्मीर: कब, किसने दस्तक दी
12वीं शताब्दी में कश्मीर पूर्ण हिन्दू राज्य रहा था, उसके बाद अलग अलग धर्मों के शासक वहां पर आते गए।
कश्मीर में तीसरी शताब्दी में अशोक का शासन रहा था, और वहां बोध धर्म ने भी अपनी जड़ें फैलाई।
कश्मीर के 48वें सम्राठ अशोक थे, इनको धर्माशोक के नाम से भी परिचय प्राप्त था, कल्हण की 'राजतरंगिणी' के अंतर्गत इसका वर्णन मिलता है।
अशोक के आगमन के साथ ही तीसरी शताब्दी में ही बौद्ध धर्म का आगमन भी कश्मीर में हुआ।
छठी शताब्दी में उज्जैन के महाराज विक्रमादित्य के अधीन फिर से हिन्दू धर्म की वापसी हुई।
यहां मुस्लिम शासन का आरंभ चौदहवीं शताब्दी में हुआ और उसी काल में फारस से सूफी इस्लाम का भी आगमन हुआ था।
जब राजा हरिसिंह ने भारत से मदद मांगी
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कश्मीर के राजा हरि सिंह
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26 अक्टूबर को कश्मीर को भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनाया गया था। कश्मीर के राजा हरि सिंह ने इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 पर हस्ताक्षर किए और इसको कानूनी अनुमति मिली।
राजा हरिसिंह की डोगरा रियासत पर हथियारबंद कबायलियों ने हमला कर दिया, उस वक्त राजा हरिसिंह ने भारत से मदद मांगी, मगर भारत ने कश्मीर के विलय की शर्त रखते हुए कहा कि पहले विलय के कागजों पर हस्ताक्षर होंगे उसके बाद मदद की जाएगी, 26 अक्टूबर को राजा ने विलय पत्र पर दस्तखत कर दिए और कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया।इस बात का वर्णन वीपी मेनन ने अपनी किताब "पॉलिटिकल इंटीग्रेशन आफ इंडिया" मे भी किया है।
वीपी मेनन ने लिखा कि, "24 अक्टूबर को कश्मीर के राजा ने भारत से मदद मांगी थी । इस विषय पर दिल्ली में भारत की सुरक्षा समिति की बैठक हुई और वीपी मेनन को श्रीनगर भेजा गया। उन्होंने सारी रिपोर्ट नेहरू को दी और नेहरू भी पाकिस्तान के कबायलियों से निपटने के लिए भारतीय सेना को कश्मीर भेजना चाहते थे ,मगर माउंटबेटन ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया"।
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जाहंगीर ने कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा तो अशोक ने बनाया श्रीनगर को राजधानी
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जाहंगीर और अशोक की तस्वीरें
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जाहंगीर ने कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा
मुगल शासक जाहंगीर ने कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा था, जाहंगीर कश्मीर की खूबसूरती से बहुत प्रभावित थे और यही वजह थी कि वो कश्मीर एक दो बार नहीं बल्कि 13 बार कश्मीर भ्रमण पर आए थे।
अशोक ने बनाया श्रीनगर को राजधानी
चक्रवती राजा अशोक ने सबसे पहले श्रीनगर को जम्मू कश्मीर की राजधानी के तौर पर स्थापित किया था।
शमसुद्दीन शाह मीर ने कश्मीर में इस्लामिक शासन की नींव रखी
मंगोल के राजा शमसुद्दीन शाह मीर ने कश्मीर में सबसे पहले इस्लामिक शासन की नींव रखी थी। 14वीं शताब्दी में शमसुद्दीन शाह मीर ने राजा अशोक को पराजित करके कश्मीर में अपना शासन स्थापित किया।
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हांजी समुदाय ने बनाई हाउसबोट " शिकारा"
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कश्मीर की हाउसबोट
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हांजी समुदाय ने बनाई हाउसबोट "शिकारा"
कश्मीर की डल झील और झेलम नदी में दिखने वाली खूबसूरत हाउस बोट की शुरुआत हांजी समुदाय ने की थी। हांजी समुदाय झील ने रहने वाली हाउस बोट बनाई थी क्योंकि ब्रिटिश सरकार के समय में अंग्रेजों ने इस समुदाय को राज्य में जमीन खरीदने की इजाजत नहीं दी थी।
कश्मीर : एशिया का स्विटजरलैंड और नेचर्स- शो विंडो
जम्मू- कश्मीर को एशिया के स्विटजरलैंड और नेचर्स- शो विंडो भी कहा जाता है।
बादशाह जहांगीर मंगाते थे कश्मीरी बर्फ
बादशाह जहांगीर अपने लिए कश्मीर से बर्फ मंगाते थे और उस बर्फ को खजाने की तरह कड़े पहरे में लाया जाता था।
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कुछ शब्द और उनसे जुड़ा कश्मीर
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कश्मीर की रोटी
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कुछ शब्द और उनसे जुड़ा कश्मीर
हमाम
जब बर्फ गिरती हैं और जिस कमरे में कश्मीरी लोग सोते हैं उसको हमाम कहा जाता है। यह नाम मुगल काल से ही चला आ रहा है।
कंदरु
कश्मीरी रोटी को कंदरु कहा जाता है और कश्मीर में सुबह की चाय के साथ रोटी को नाश्ते में लिया जाता है।
जानिए क्या हैं, तश्तरी और तरामी
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कश्मीरी थाली
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तरामी
कश्मीर में खाना खाने की थाली को तरामी बोला जाता है और तरामी का आकार एक सामान्य थाली से बहुत बड़ा होता है।
तश्तरी
जिस बर्तन को हाथ धोने के लिए प्रयोग किया जाता है, उसको तश्तरी कहा जाता है।
कश्मीर का स्वाद नून चाय और कहवा
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कश्मीरी नून चाय
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नून चाय
जम्मू- कश्मीर में बनने वाला एक पारंपरिक चाय का पेय है। इस चाय की एक विशेषता यह है कि इसमें शक्कर की जगह पर नमक डाला जाता है, इसलिए इसे नून चाय कहा जाता है।
कहवा
कश्मीर में कहवा बनाना एक परंपरा है। ये एक हरे रंग का पेय प्रदार्थ होता है, जिसमे केसर, बादाम और अखरोट के साथ मसाले मिलाकर बनाया जाता है। कश्मीर के अंतर्गत 20 से ज्यादा किस्मों के कहवा तैयार किए जाते हैं।
कश्मीर की केसर का इतिहास
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कश्मीरी केसर
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कश्मीर की केसर का इतिहास
कश्मीर में केसर कैसे आई, इसकी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। ऐसा बोला जाता है की करीब 800 साल पहले एक सूफी संत कश्मीर आए थे और वो अपने साथ केसर के कुछ पौधे लेकर आए। एक बार वो बीमार पड़ गए, उन्होंने स्थानीय हकीम से अपना इलाज कराया, जिसके बदले में उन्होंने एक पौधा उस हकीम को दे दिया। वह पौधा केसर का था। इस तरह केसर का फूल कश्मीर में आया।
जम्मू-कश्मीर का 'दरबार मूव'
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कश्मीरी केसर
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कैसे खिलता है केसर का फूल
केसर का फूल बैंगनी रंग का होता है।
केसर पंखुड़ियों के अंदर होता है।
फूल के मध्य में तीन लाल धब्बे होते हैं, जिसे मादा हिस्सा कहा जाता है।
दो पुंकेसर होते हैं, जो नर की भूमिका में रहते हैं।
केसर एक लंबे सफेद डंठल के साथ फूल से जुड़ा रहता है।
केसर के पौधे की खासियत हैं कि उसका प्रत्येक भाग काम में लिया जाता है।
पंखुड़ियों का प्रयोग सब्जी के रूप में किया जाता है।
डंठल जानवरों के खाने के काम आ जाता है।
लाल धब्बे वाला केसर सबसे विशुद्ध किस्म का केसर माना जाता है, जिसकी मांग बाजार में सबसे ज्यादा होती है।
श्रीनगर से सिर्फ आधे घंटे की दूरी पर जम्मू-कश्मीर का छोटा सा शहर हैं, पंपोर और इसी पंपोर में केसर की खेती होती है।
जम्मू-कश्मीर का 'दरबार मूव'
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कश्मीर
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जम्मू-कश्मीर का 'दरबार मूव' जम्मू-कश्मीर के मौसम की वजह से इसकी दो राजधानी रही हैं। गर्मी के दिनों में श्रीनगर और सर्दियों में जम्मू इसकी राजधानी होती है।
जैसे ही मौसम करवट लेता है, उस हिसाब से राजधानी बदल जाती है। इस प्रक्रिया को 'दरबार मूव' कहा जाता है।
आइए जानते हैं इसका इतिहास
राजधानी बदलने की यह परंपरा डोगरा शासन काल से शुरू हुई थी।
1862 में डोगरा शासक गुलाब हरि सिंह के वंशज थे।
उस वक्त जम्मू- कश्मीर भारत का अंग हुआ करता था।
यह राजधानी मौसम के हिसाब से तय होती थी।
गुलाब सिंह ने गर्मी में श्रीनगर और ठंड में जम्मू को राजधानी बना दिया।
पश्मीना सदियों से पारंपरिक पहनावे की पहचान रहा है। पश्मीना नाम एक फारसी शब्द “पश्म” से बना है, जिसका अर्थ होता है, एक रीतिबद्ध और व्यवस्थित तरीके से ऊन की बुनाई करना या उसको बनाना। कश्मीर के 15 वीं शताब्दी के शासक रहे जैन-उल-आबदीन, जिन्होंने कश्मीर में ऊन उद्योग की स्थापना की थी। पश्मीना की बुनाई की कला कश्मीर में पीढ़ियों से विरासत के रूप में चली आ रही है और इसकी कताई, बुनाई और कढ़ाई के लिए विशेष हुनर की जरूरत होती है।