पाकिस्तानी सेना भी पुकारती थी 'शेरशाह'
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'मैं हमेशा भगवान से एक सवाल पूछती थी कि मैंने तो आपसे एक ही बेटा मांगा था,आपने मुझे दो क्यों दे दिए? जब विक्रम कारगिल की लड़ाई में शहीद हो गए। तब मेरी समझ में आया कि एक बेटा ईश्वर ने देश के लिए दिया था और एक मेरे लिए।''
विक्रम बत्रा की मां के शब्द हमें उस वीर सपूत का समर्पण और एक मां के गर्व की कहानी बयां करते हैं। 8 जुलाई 1999 विक्रम बत्रा की शहादत की खबर उनके घर के दरवाजे पर पहुंची, सेना के दो अफसर घर पर आए और कहा "बत्रा साहब विक्रम अब इस दुनिया में नहीं हैं।"
पिता बेहोश होकर नीचे गिर पड़े और मां ये सुनकर सदियों तक ठहर गई। 15 अगस्त 1999 को उनके अदम्य साहस के लिए भारत सरकार ने उन्हें वीरता के सबसे बड़े पुरस्कार परमवीर चक्र से नवाजा था।
बेशक ये हमारे लिए बहुत गौरव का क्षण था, अपने बेटे की बहादुरी के लिए राष्ट्रपति से परमवीर चक्र का सम्मान ग्रहण करना मगर जब हम इस समारोह के बाद गाड़ी में बैठ कर वापस अपने घर आ रहे थे। मेरा दूसरा बेटा विशाल भी मेरे साथ बैठा हुआ था, रास्ते भर आंख में आंसू थे और साइन गर्व "विशाल ने मुझसे पूछा डैडी क्या बात है ? मैंने कहा बेटा अगर इस अवॉर्ड को विक्रम ने अपने हाथों से लिया होता तो हमारे लिए बहुत ही खुशी की बात होती'।
पिता गिरधारीलाल बत्रा ये बोलकर खामोश हो गए मगर एक वीर सपूत की कहानी अमर हो गई।
कैप्टन विक्रम बत्रा के परमवीर बनने की कहानी
तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा, पर मैं आऊंगा जरूर'
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पालमपुर का एक ग्राउंड जिसका नाम है कैप्टेन विक्रम बत्रा स्टेडियम, शहीद होने के बाद इसी पालमपुर ग्राउंड पर विक्रम का पार्थिव शरीर ले जाया गया था, ऐसा कोई नहीं था। जो इस जाबांज सिपाही को अंतिम विदाई देने ना पहुंचा हो, पूरा शहर उस दिन रोया था बेटे की विदाई में।
शहीद विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को कांगड़ा जिले के पालमपुर के सटे बंदला में हुआ था। 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर सेना की '13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स' में लेफ्टिनेंट के पद पर कैप्टन विक्रम बत्रा को नियुक्ति मिली थी। आइए, इस बहादुर शेर के बारे में जानते हैं...
जब सुबह 4 बजकर 35 मिनट पर वायरलेस पर एक आवाज गूंजी 'ये दिल मांगे मोर'
'ये दिल मांगे मोर'
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जब भी कारगिल के दौरान कोई मिशन सफल होता था तो कैप्टन विक्रम बत्रा जोर से बोलते थे - ‘ये दिल मांगे मोर' और अगले ओप्रशन की तरफ चल पड़ते थे, नाम के आगे जो कैप्टन लगा था उसके सही परिभाषा थे कैप्टन विक्रम बत्रा। मुश्किल और दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद भी विक्रम बत्रा ने अपने जाबांज साथियों के साथ 20 जून 1999 को इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया और पाकिस्तानी घुसपेटियों से मुक्त कराया। हर मुश्किल की घड़ी में भी कैप्टन विक्रम बत्रा के मुंह से मुश्किलों को चुनौती देने के लिए एक ही शब्द निकलता था ‘ये दिल मांगे मोर'।
लेफ्टिनेंट जामवाल ने कहा 'ओ ये ये ये' तो विक्रम बत्रा ने कहा 'ये दिल मांगे मोर'।
प्वॉयंट- 5140 पर पाकिस्तान की पोस्ट पर हमला करना था और उसको अपने कब्जे में लेकर आना था, कर्नल योगेश जोशी के सामने दो जाबांज और युवा अधिकारी नौजवान थे लेफ्टिनेंट जामवाल और कैप्टेन विक्रम बत्रा' और इस मिशन को इन्हें ही अंजाम देना था।
कर्नल योगेश जोशी ने दोनों को बुलाया और उन्हें दिखाया कि, 'देखो, वहां तुम्हें चढ़ाई करनी है, आज रात को ऑपरेशन शुरू होगा। सुबह तक तुम्हें वहां तक पहुंचना ही होगा।' उन्होंने दोनों जवानों से पूछा कि मिशन की सफलता के बाद आपका कोड क्या होगा? दोनों को अलग अलग रस्ते से मिशन को अंजाम देना था।
लेफ्टिनेंट जामवाल ने कहा 'सर मेरा कोड होगा 'ओ ये ये ये' और विक्रम बत्रा ने कहा मेरा कोड होगा 'ये दिल मांगे मोर'।
कारगिल में उनके कमांडिग ऑफिसर कर्नल योगेश जोशी ने उन्हें और लेफ्टिनेंट संजीव जामवाल को 5140 चौकी फतह करने की जिम्मेदारी सौंपी थी, उन दोनों को उन्होंने बुलाया और एक पत्थर के पीछे से उन्हें दिखाया कि वहाँ तुम्हें चढ़ाई करनी है, रात को ऑपरेशन शुरू होगा. सुबह तक तुम्हें वहां पहुंचना होगा"
‘शूरवीर: परमवीर चक्र विजेताओं की कहानियां’
‘या तो मैं लहराते तिरंगे के पीछे आऊंगा, या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा, पर मैं आऊंगा जरूर'
विक्रम बत्रा कारगिल युद्ध के सिपाही का एक चेहरा बन गए थे।
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कैप्टन विक्रम बत्रा के परमवीर बनने की कहानी
‘या तो मैं लहराते तिरंगे के पीछे आऊंगा, या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा, पर मैं आऊंगा जरूर'...आखिरी बार कैप्टन विक्रम बत्रा अपने पिता जी एल बत्रा से फोन पर बात कर रहे थे, पिता से बात करते हुए कहा" यू डोंट वर्री,‘या तो मैं लहराते तिरंगे के पीछे आऊंगा, या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा, पर मैं आऊंगा जरूर'।
गिरधारीलाल बत्रा, कैप्टन विक्रम बत्रा के पिता
विक्रम बत्रा ने दोनों बातें पूरी करके दिखा दी, उन्होंने तिरंगा झंडा वहां पर लहराया और तिरंगे झंडे में लिपटकर वापस लौटकर भी आये "
"तुम हट जाओ, तुम्हारे बीवी-बच्चे हैं' बस ये शब्द कैप्टन विक्रम बत्रा के मुंह से निकलें
"तुम हट जाओ, तुम्हारे बीवी-बच्चे हैं'
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प्वॉयंट 4875 - दुशमन पर लगातार फायर कर रहे थे अचानक उनके एक साथी को गोली लगती है और वो घायल होकर उनके सामने ही गिर जाता है, सिपाही खुले में गिरता है और गोलिया लगातार चल रहीं होती है, विक्रम और रघुनाथ चट्टानों के पीछे बैठकर फायर कर रहे होते हैं।
ऐसे में विक्रम रघुनाथ से कहते हैं,'हम अपने घायल साथी को सुरक्षित स्थान पर लाएंगे
रघुनाथ उनसे कहते है,' कि मुझे नहीं लगता कि वो ऐसा करने पर जिंदा बच पाएंगे,अगर आप बाहर निकलेंगे तो आपके ऊपर फायर आएगा और आपको भी गोली लग सकती हैं '
ये बात सुनलकार विक्रम बत्रा नाराज हो जाते हैं और बोलते हैं "क्या आप डरते हैं?"
रघुनाथ जवाब देते है, "नहीं साहब मैं डरता नहीं हूं, मैं तो सिर्फ आपको आगाह कर रहा हूं' अगर आप आदेश देंगे तो हम बाहर जाएंगे,"
विक्रम बत्रा ने कहा, "हम अपने सिपाही को इस तरह अकेले नहीं छोड़ सकते है '।
आदेश की पलना करते हुए जैसे ही रघुनाथ चट्टान के बाहर कदम रखने वाले थे, तो विक्रम बत्रा ने उन्हें कॉलर से पकड़ कर कहा, "आपके तो परिवार और बच्चे हैं' मेरी अभी शादी नहीं हुई है सिर की तरफ से मैं उठाउंगा,आप पैर की तरफ से पकड़िएगा"
ये कह कर विक्रम आगे चले जाते है और जैसे ही वो उनको उठा रहे होते है , उनको गोली लगती हैं और वो वहीं गिर जाते हैं।'
तुम हट जाओ, तुम्हारे बीवी-बच्चे हैं' बस ये शब्द कैप्टन विक्रम बत्रा के मुंह से निकलें।
7 जुलाई, 1999 को 4875 प्वांइट पर उन्होंने अपनी जान कुर्बान कर दी, मगर जब तक कैप्टन विक्रम बत्रा जिंदा रहे, तब तक अपने साथी सैनिकों की जान बचाते रहे और देश के लिए लड़ते रहे।
"शेरशाह तुम वापस चले जाओ, नहीं तो तुम्हारी लाश वापस जाएंगी'
शेरशाह तुम वापस चले जाओ
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कैप्टन विक्रम बत्रा ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि, 'पाकिस्तानी घुसपैठिये और हम एक ही फ्रीक्वेंसी पर थे, और उन्होंने हमे चुनौती दी।
'शेरशाह ऊपर मत आना...' यह सुनकर मेरे सैनिक गुस्से में आ गए।
उन्होंने कहा, हमें धमकाने की हिम्मत कैसे हुई, हम उनको ठीक कर देंगे।
'दुर्गा माता की जय' बोलकर अपनी पलटन के साथ कैप्टन विक्रम बत्रा टूट पड़े, अपनी बंदूक से पांच सैनिकों को मार गिराया, मगर खुद पाकिस्तानी मशीनरी का शिकार हो गए।
अपने आखिरी इंटरव्यू में उन्होंने यह भी कहा, अगर हम एक पल के लिए कुछ भी यह सोचते तो हमें मार देते, या हम उन्हें मार देते '।
जब कैप्टन विक्रम बत्रा की AK-47 ने पाकिस्तानी घुसपैठिये को जवाब दिया।
‘हमारी चिंता मत करो, अपने लिए प्रार्थना करो'
इस लड़ाई में विक्रम बत्रा का कोड नेम 'शेरशाह' था'
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पाकिस्तानी सैनिक विक्रम बत्रा से कह रहे थे, "शेरशाह तुम वापस चले जाओ, नहीं तो तुम्हारी लाश वापस जाएंगी, विक्रम बत्रा ने पलटकर कहा था, "एक घंटे रुक जाओ, फिर पता चलेगा कि किनकी लाशें यहां से वापस जाती हैं।''
कैप्टन विक्रम बत्रा ने यह भी कहा, ‘हमारी चिंता मत करो, अपने लिए प्रार्थना करो'।
इस लड़ाई में विक्रम बत्रा का कोड नेम 'शेरशाह' था'।
कैप्टन विक्रम बत्रा का आखिरी खत
कैप्टन विक्रम बत्रा का आखिरी खत
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प्रिय कुशु,
मैं पाकिस्तानियों से लड़ रहा हूं,
जिंदगी खतरे में है.
यहां कुछ भी हो सकता है,
गोलियां चल रही हैं|
मेरी बटालियन के एक अफसर
आज शहीद हो गए हैं.
नॉर्दन कमांड के सभी सैनिकों की
छुट्टी कैंसिल हो गई है.
पता नहीं कब वापस आऊंगा?
तुम मां और पिता जी का ख़्याल रखना,
यहां कुछ भी हो सकता है।
ये आखिरी खत कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपने भाई विशाल बत्रा को लिखा, और हमेशा के लिए खत में याद बनकर रह गए।
विशाल बत्रा, कैप्टन विक्रम बत्रा के भाई
जब छोटा था तो किसी भी शव को देखकर डर जाता था,मगर नियति देखिए कैप्टन विक्रम बत्रा का शव जब आया तो मैंने ही पहचाना था । उस पर टिकरंगा था। मैंने खुद उससे ताबूत से बाहर निकला, यह मेरे जीवन का पहला अंतिम संस्कार था।
कैप्टन विक्रम बत्रा की दिलेरी की दास्तां
दिलेरी की दास्तां
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विक्रम बत्रा कारगिल युद्ध के सिपाही का एक चेहरा बन गए थे।
'द ब्रेव' परमवीर चक्र विजेताओं पर लिखी किताब में इस बात का जिक्र हैं कि
"विक्रम बत्रा कारगिल की लड़ाई का सबसे जाना पहचाना चेहरा थे। उनकी शख्सियत ऐसी थी कि जो भी उनके संपर्क में आता था। उन्हें याद रखता था, जब उन्होंने 5140 की चोटी पर जीत हासिल की और कहा 'ये दिल मांगे मोर' तो उस पल उन्होंने पूरे देश की भावनाओं को जीत लिया था' ।
'परमवीर चक्र' सीरियल से मिली सेना में जाने की प्रेरणा
मैदान-ए-जंग में भी मुस्कुराते रहते थे विक्रम बत्रा, भारतीय सेना में जाने की प्रेरणा विक्रम बत्रा को 1985 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले सीरियल 'परमवीर चक्र' देख कर मिली तभी से ठान लिया सेना में जाकर देश की सेवा करनी हैं।
विक्रम के जुड़वां भाई विशाल बत्रा कहते हैं,
उस समय हमारे यहां टेलिविजन नहीं हुआ करता था, इसलिए हम अपने पड़ोसी के यहां जाकर टीवी देखा करते थे, मैं अपने सपने में भी नहीं सोच सकता था कभी कि उस सीरियल में देखी गई कहानियां एक दिन हमारे जीवन का हिस्सा बन जाएंगी '
मर्चेंट नेवी में चयन हो जाने के बाद भी विक्रम ने सेना को चुना
विक्रम का चयन पहले मर्चेंट नेवी में हुआ, लेकिन उन्होंने सेना के करियर को ही प्राथमिकता दी। जब उन्होंने मर्चेंट नेवी नहीं जाने का फैसला किया जब उनकी मां ने उनसे पूछा 'कि तुम ऐसा क्यों कर रहे हो, क्यों मर्चेंट नेवी को छोड़ रहे हो ? '
विक्रम का जवाब था, 'जिंदगी में पैसा ही सब कुछ नहीं होता मां, मैं जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहता हूं, जिससे मेरे देश का नाम रौशन हो'।
जब विक्रम बत्रा तिरंगे में लिपटकर अपने घर पहुंचे
8 जुलाई 1999 घर में विक्रम बत्रा की शहादत की खबर उनके दरवाजे पर पहुंची, सेना के दो अफसर घर पर आए और कहा,
"बत्रा साहब, विक्रम अब इस दुनिया में नहीं हैं।'' पिता बेहोश होकर नीचे गिर पड़े और मां ये सुनकर सदियों तक ठहर गई।
तत्कालीन सेनाप्रमुख जनरल वेदप्रकाश मलिक
विक्रम इतने प्रतिभाशाली थे कि अगर उनकी शहादत नहीं हुई होती तो मेरी कुर्सी पर बैठे होते एक दिन"
बेटे की शहादत पर कैप्टन के पिता जी.एल. बत्रा गर्व करते हैं, सरकार से उन्हें किसी भी प्रकार की कोई समस्या नहीं है, मगर वो चाहते हैं कि देश भर के स्कूल और कॉलेज के सिलेबस में परमवीर चक्र विजेताओं के बारे में छात्रों को पढ़ाना चाहिए और उनकी वीर गाथा बतानी चाहिए।
गिरधारीलाल बत्रा, कैप्टन विक्रम बत्रा के पिता
जिस उम्र में युवाओं को अच्छे बुरे की पहचान भी नहीं होती, उस उम्र में विक्रम ने नेत्रदान करने का निर्णय ले लिया था। उन्हें अपने बेटे पर गर्व है'
जब पाकिस्तानी घुसपैठिये ने विक्रम बत्रा को बोला‘हमें माधुरी दीक्षित दे दो, हम नरमदिल हो जाएंगे’
'परमवीर चक्र' सीरियल से मिली सेना में जाने की प्रेरणा
- फोटो : अमर उजाला
कैप्टन विक्रम बत्रा एक वाकया हैं कि जब एक पाकिस्तानी घुसपैठिये ने युद्ध के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा को बोला, ‘हमें माधुरी दीक्षित दे दो, हम नरमदिल हो जाएंगे। '
इस बात पर कैप्टन विक्रम बत्रा मुस्कुराए और इसका जवाब अपनी AK-47 से फायर करते हुए दिया और बोले, ‘लो माधुरी दीक्षित के प्यार के साथ’ और कई पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया।
गिरधारीलाल बत्रा, कैप्टन विक्रम बत्रा के पिता (‘शूरवीर: परमवीर चक्र विजेताओं की कहानियां’)
उनको देखते ही मेरी पत्नी रोने लगीं, क्योंकि उन्हें अंदाजा था कि इस तरह अफसर कोई दुखद समाचार ही देने आते हैं, उन्होंने भगवान को याद किया और मुझे फोन मिला कर तुरंत घर आने के लिए कहा, मैं जब घर पहुंचा तो ऑफिसर्स को देख कर ही समझ गया कि विक्रम अब इस दुनिया से जा चुके हैं, इससे पहले कि वो अफ़सर मुझसे कुछ कहते, "मैंने उनसे इंतजार करने के लिए कहा. मैं पूजा घर गया, मैंने भगवान के सामने अपना माथा टेका और जब मैं बाहर आया तो उन अफसरों ने मेरा हाथ पकड़ा और अलगआने के लिए कहा, फिर उन्होंने मुझसे कहा, "बत्रा साहब विक्रम अब इस दुनिया में नहीं हैं'
‘जय माता दी’ बोलते हुए शहीद हो गए कैप्टन विक्रम बत्रा
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विक्रम बत्रा अपने साथ घर का बनाया आम का आचार लेकर निकले, पूरा परिवार उनको बस स्टैंड पर छोड़ने गया जैसे ही बस वहा से चली तो विक्रम बत्रा ने खिड़की से अपना हाथ बाहर निकाला और परिवार की तरफ देखते हुए हिलाया, माता -पिता को क्या पता था कि ये उनके लाडले से आखिरी मुलाकात हैं अब विक्रम कभी उनके पास वापस लौटकर नहीं आएंगे। कारगिल युद्ध में मिशन के दौरान एक विस्फोट हुआ और सीने में आकर एक गोली लगी और देश का लाडला हम सभी को 'जय माता दी' कहते हुए कुर्बान हो गया।
ऐसे शहीद हो गया भारत का वीर सपूत ...परमवीर चक्र कैप्टन विक्रम बत्रा।
Bibliography and References-
* Conversation
*Param Vir - Vikram Batra
(Captain Vikram Batra pushed aside his colleague telling him that he had a family and took the bullet himself. Capt. Batra acheived martyrdom on 7 July 1999 fighting for his country durihg the Kargil War. Despite heavy odds and the most difficult terrain, Vikram displayed examplary personal bravery and leadership to recapture Point 5140 and Point 4875. He was awarded the Param Vir Chakra posthumously. Vikram was 24 years old. In Param Vir Vikram Batra : The Sher Shah of Kargil, Vikram s father, GL Batra, chronicles his son s life. He attempts to inspire generations and highlight the rigourous lives of men in uniform.)
*Kargil: Untold Stories from the War
*The Kargil Victory: Battles from Peak to Peak
*Letter From Kargil: The Kargil war through our soldires' eyes.
*Captain Vikram Batra Last Interviews.