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धरती पर वो जगहें, जहाँ सामने दिखती है मौत

Mon, 06 Feb 2017 01:59 PM IST
इला डेविस / बीबीसी
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हम सब कई बार कुदरत के कहर के शिकार हुए हैं। कभी हवा तो कभी पानी ने हम पर जुल्म ढाया है। कभी हम तेज तूफान में फंसे, तो कभी धूप की तुर्शी ने हमें जलाया है। 

हां, इसकी वजह से हमारी जान नहीं गई। मगर धरती में ऐसी कई जगहें हैं जहां कुदरत जान लेने पर आमादा हो जाती है। इन जगहों को हम कुदरत के चार नजरानों के हिसाब से बांट सकते हैं। आगे की स्लाइड्स में जानिए कहां वे जगहें- 
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इनमें से पहला है पानी

पानी के बिना जिंदगी का तसव्वुर भी मुमकिन नहीं। क्योंकि जल ही जीवन है। लेकिन अगर इसे गुस्सा आ जाए तो ये जानलेवा भी हो सकता है।

समुद्र किनारे बसने वाले तो अक्सर ही समुद्र के गुस्से को बर्दाश्त करते हैं। हिंद महासागर के पास बसा देश मालदीव इससे अछूता नहीं है। इसीलिए उसे अल्पकालिक देश कहा जाता है। मतलब आने वाले वक्त में मालदीव, दुनिया के नक्शे से मिट जाने का डर है।
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सुनामी का पता पहले चलेगा

असल में मालदीव समुद्र के स्तर से थोड़ा नीचा है, लिहाजा जब भी समुद्र की लहरें उफान भरती हैं तो इसे अपनी चपेट में ले लेती हैं। हर साल बदलती धरती की आबो-हवा भी इसमें बड़ा रोल निभाती है। सबसे बुरा हाल तो तब होता है, जब अचानक समुद्र में तूफान आता है और सुनामी जैसे हालात पैदा हो जाते हैं।

दरअसल जब समुद्र में एक के बाद एक ऊंची लहरें उठती हैं तो इससे समुद्र की गति में भी बदलाव आता है। और सुनामी आ जाती है जो अपने साथ जान-माल का भारी नुकसान लाती है। अमरीकी नेशनल वेदर सर्विस के मुताबिक प्रशांत महासागर में 71 फीसद मौकों पर सुनामी आने के हालात बने रहते हैं। इसके अलावा भूकंप के चलते भी सुनामी आ सकती है।

हालांकि अब ऐसी तकनीक खोज ली गई हैं, जिससे घातक सुनामी के आने से पहले ही एहतियाती कदम उठाए जा सकते हैं। इसके लिए पहले से ही लोगों को खबर कर दी जाती है।

लेकिन, कई मर्तबा समुद्र में इतनी जल्दी हलचल होती है और सुनामी आ जाती है कि लोगों को हटाने के लिए बीस मिनट तक का समय नहीं मिल पाता। और हजारों जाने पल भर में चली जाती हैं। हाल की वर्षों में सबसे खतरनाक सुनामी हिंद महासागर में साल 2004 में आई थी जिसने करीब 15 देशों में दो लाख अस्सी हजार जानें निगल ली थी।

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सैलाब का कितना डर?

1931 में चीन की यांग्त्सी नदी में आया सैलाब भी कोई भुला नहीं सकता। हालांकि रिकॉर्ड मौत के आंकड़े को कम ही आंकते है। फिर भी कहा जाता है कि इस सैलाब में लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। इस सैलाब की वजह थी भारी बर्फबारी और बारिश। जिसकी वजह से नदी का जल स्तर बढ़ गया था और उसके आस पास रहने वालों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी।

चीन में आज पानी के किनारे लाखों जिंदगियां आबाद हैं। ये पानी इनके जीवन की बुनियादी जरूरत को तो पूरा करता है लेकिन कभी भी ये इस पानी के गुस्से का शिकार हो सकते हैं।
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कुदरत की दूसरी नेमत है हवा

अफ्रीका में बहुत सी कातिल झीलें हैं। लेकिन इन झीलों का पानी मुसीबत नहीं लाता है। दरअसल ये झीलें ऐसे इलाके में हैं, जहां आस-पास ज्वालामुखी हैं और उनमें लगातार हलचल होती रहती हैं।

कैमरून की 'न्योस' और कांगो-रंवाडा की सीमा पर स्थिन 'कीवू' ऐसी ही दो झीलें हैं, जिनमें खतरा बसता है। जिनके इलाके में ज्वालामुखी लगातार सक्रिय रहते हैं।

जिसके नतीजे में यहां की जमीन से कार्बनडाई ऑक्साइड गैस रिसती रहती है।
जब जमीन के अंदर इस गैस का गुबार फटता है तो एक बादल सा बन जाता है। चूंकि गैस हवा के मुकाबले ज्यादा भारी होती है लिहाजा वो जितनी जगह घेरती है, उतनी जगह की ऑक्सीजन को खत्म कर देती है। 1980 में कैमरून की न्योस झील में ऐसे ही दो विस्फोट हुए थे जिसके नतीजे में 1700 लोगों की जान गई थी और करीब 3500 जानवर दम घुटने से मौत की नींद सो गए थे।
 
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हवा का खतरनाक होना

हालांकि जानकारों का कहना है कि गैस के रिसाव को रोकने के नायाब तरीके खोज लिए गए हैं। पाइप लाइन के जरिए इस गैस को झील से बाहर निकालने का इंतजाम कर लिया गया है।

इसी तरह 'कीवू' झील की जमीन से भी मीथेन गैस का रिसाव बड़े पैमाने पर होता है। जो कभी भी जानलेवा साबित हो सकती है। हालांकि इस गैस के इस्तेमाल से बिजली पैदा करने की कोशिशें की जा रही हैं।

लेकिन सिर्फ गैस ही खतरनाक नहीं। अगर हवा ताकतवर होकर अपना तेवर देखाए तो कैसे पल भर में सब कुछ तहस नहस कर सकती है। अंटार्कटिका का 'केप डेनिसन' इलाका धरती पर सबसे तेज हवाओं वाला इलाका है। हालांकि ये एक गैर-आबाद इलाका है।
 
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तबाही का हैती से रिश्ता

लेकिन इस इलाके की हवाएं दूर दूर तक फैले आबादी के इलाकों पर अपना असर डालती हैं। और बर्बादी की दास्तान लिख जाती हैं। समुद्री तूफानों से तबाही का शिकार सबसे ज्यादा अगर कोई होता है तो वो है कैरेबियाई देश हैती। ये देश मेक्सिको की खाड़ी में बनने वाले हरीकेन के हाइवे में पड़ने वाला देश है।

और ये गरीब भी है। आर्थिक रूप से कमजोर देशों को इस तरह की कुदरती आफतों की मार सबसे ज्यादा झेलनी पड़ती है। इस तरह की कुदरती आफतों से बचने के लिए पहले से सूचना का होना जरूरी है। इसके लिए मौसम विभाग का नई तकनीक और मशीनों से लैस होना जरूरी है। और इसके लिए मोटी रकम खर्च होती है जोकि आर्थिक तौर पर कमजोर देशों की पहुंच से बाहर होता है।

जर्मनी की स्टुटगार्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर योर्न बिर्कमैन का कहना है तूफान ज्यादा घातक इसलिए भी होते हैं क्योंकि इनकी भविष्यवाणी करना मुश्किल होता है। इसके अलावा लोगों के पास जानकारी का अभाव होता है जिसकी वजह से नुकसान ज्यादा होता है। हाल ही में 'यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी' ने कुदरत के कहर के जोखिम वाले देशों पर एक रिपोर्ट जारी की जिसकी फेहरिस्त में प्रशांत महासागर में स्थित 'वानुआतू' नंबर एक पर है, जहां साल 2016 में करीब एक तिहाई आबादी कुदरती आफत का शिकार हुई।

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कुदरत के चलते लाखों की मौत

2015 में कुछ ही हफ्तों के अर्से में यहां भूकंप आया, ज्वालामुखी में विस्फोट हुआ, तूफान आया लेकिन फिर भी मरने वालों की संख्या कुल 11 थी। जबकि साल 1970 में जब बांग्लादेश में 'भोला तूफान' आया था तो उसने करीब पांच लाख लोगों की जान ली थी। ये आंकड़े इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि तकनीक की मदद से प्राकृतिक आपदाओं पर नियंत्रण किया जा रहा है।

कुदरत के कहर का तीसरा जरिया है जमीन

धरती के अंदर बहुत सी प्लेंटें तैरती रहती हैं। जिससे बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पन्न होती है। जब ये ऊर्जा अपना दबाव बनाती है या ये प्लेंटें आपस में टकराती हैं तो इससे धरती के अंदर भारी तरंगे पैदा होती हैं जिसके नतीजे में भूकंप आता है।

1556 में चीन के 'शांक्सी' में आया भूकंप अब तक का सबसे खतरनाक भूकंप माना जाता है जिसने करीब आठ लाख लोगों की जान ली थी। जब भी बड़ा भूकंप आता है तो अक्सर अपने साथ सुनामी भी लाता है। इसकी वजह से इंसान को दोहरी मार झेलनी पड़ती है। हालांकि जिन इलाकों में भूकंप आने का अंदेशा ज्यादा रहता है वहां अक्सर ऐसी इमारतें बनाई जाती हैं जिससे भूकंप आने पर कम से कम नुकसान हो।

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भूकंप का खतरा

प्रशांत महासागर के नीचे सेंट आंद्रे फॉल्ट है। जहां पैसिफिक प्लेट और अमेरिकन प्लेट एक दूसरे से मिलती हैं। इनकी वजह से अमेरिका के कैलिफोर्निया में भूकंप आने का खतरा मंडराता रहता है। मगर अमीर देशों के पास कुदरत से लड़ने के ज्यादा जरिए होते हैं। इसीलिए लॉस एंजेलेस और टोक्यो जैसे शहरों में भूकंप रोधी इमारतें बना ली जाती हैं।

वहीं भूकंप के लिहाज से सबसे खतरनाक इलाके पैसिफिक रिंग ऑफ फायर, जहां दुनिया के 81 फीसद भूकंप आते हैं, वहां स्थित ज्यादातर देश संसाधन कम होने से नुकसान झेलते हैं।

इंसान को जो एक और कुदरती चीज नुकसान पहुंचाती है, वो है आग

जमीन के ऊपर जो कुछ होता है उसका सीधा संबंध धरती के अंदर चल रही गतिविधियों से होता है। जब धरती के अंदर टेक्टॉनिक प्लेटें एक दूसरे से टकराती हैं तो उससे भूकंप आता है। मगर जब यही प्लेटें एक दूसरे से दूर जाती हैं तो ज्वालामुखी विस्फोट होता है।

अफ्रीकी देश इथियोपिया में डानाकिल डिप्रेशन ऐसी जगह है जहां का माहौल इंसान के लिए सबसे ज्यादा जानलेवा माना जाता है। यहां का सालाना औसत तापमान 34।4 डिग्री सेल्सियस रहता है।
ये दुनिया का सबसे गर्म और सबसे कम बारिश वाला इलाका है। यहां नमक की झीलें हैं। डानाकिल डिप्रेशन में स्थित पहाड़ आग उगलते हैं। मगर अफार जनजाति के लोग इस इलाके को अपना घर बताते हैं।
 
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ज्वालामुखी के पास बसावट

असल में इंसान की फितरत है कि वो खतरनाक इलाकों में अपना आशियाना बनाता है। मिसाल के तौर पर इटली के माउंट विसूवियस को लीजिए। इस ज्वालामुखी में विस्फोट से पॉम्पियाई नाम का शहर लावे में दब गया था। मगर इसके करीब ही आज नेपल्स शहर बस गया है। मेक्सिको में पोपोकेटेपीटल ज्वालामुखी के पास ही मेक्सिको सिटी शहर बसा है।

2015 में प्रकाशित हुई एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 400 सालों में ज्वालामुखी विस्फोटों से करीब दो लाख लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। ज्वालामुखी विस्फोट के लिहाज से इंडोनेशिया को सबसे खतरनाक देश बताया गया है। 1815 में 'सुंबावा द्वीप' के 'ताम्बोरा ज्वालामुखी' के संपर्क में आने से करीब 70 हजार लोगों की जान चली गई थी।

यही नहीं जब ये ज्वालामुखी फटते हैं, तो, अपने पीछे सूखे के हालात छोड़ जाते हैं। भुखमरी से भी बड़े पैमाने पर लोगों की जान जाती है।

हालांकि अब नई तकनीक के सहारे इस सारी आपदाओं से इंसान ने काफी हद तक खुद को महफूज कर लिया है। लेकिन बहुत बार कुदरत कुछ सोचने तक का समय नहीं देती। और ये तब ज्यादा होता है जब हम उसके साथ खिलवाड़ ज्यादा करते हैं। लिहाजा कुदरत से खिलवाड़ मत करिए।
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