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तिरंगे से जुड़े 16 FACT, जानें कैसे समय-दर-समय हुआ बदलाव

Thu, 11 Aug 2016 07:43 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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तिरंगा
15 अगस्त को देश 70वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे, वहीं देश के कोने-कोने में इसे फहराया जाएगा। हमारे देश के राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना पिंगली वैंकेयानंद ने की थी। इसके वर्तमान स्वरूप को 22 जुलाई 1947 को भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था। आगे आप पढ़िए तिरंगे के बारे में 15 फैक्ट...
 
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झंडा
भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं। सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की प‍ट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्‍वज की चौड़ाई और लंबाई का अनुपात 2:3 का है। 
 
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झंडा
सफेद पट्टी के बीच में गहरे नीले रंग का एक अशोक चक्र है। इसका व्‍यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तिल्लियां है।
 

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झंडा
झंडे के बीच में सम्राट अशोक का धर्म चक्र है। इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं। तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से इसे लिया गया है। इसका आशय गति‍शील जीवन से है। इसके रुकने का अर्थ मौत है।
 
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झंडा
बताया जाता है कि साल 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के सत्र के दौरान आंध्रप्रदेश के एक युवक ने महात्मा गांधी को एक झंडा दिया था। यह लाल और हरे रंग में था। लाल रंग हिंदू समुदाय और हरा रंग मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करता था। इसे देखकर महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
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झंडा
साल 1931 में तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया। केसरिया, सफेद और बीच में महात्मा गांधी के चलते हुए चरखे को रखा गया था। इसमें स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया कि इसका कोई सांप्रदायिक महत्‍व नहीं  है।
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झंंडा
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसका रंग और उनका महत्‍व बना रहा। हालांकि, ध्‍वज में चलते हुए चरखे के स्‍थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। 

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झंडा
खादी बनाने में केवल कपास, रेशम और ऊन का प्रयोग किया जाता है। इसकी बुनाई सामान्य बुनाई से अलग होती है। ये बुनाई बेहद दुर्लभ होती है।
 

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तिरंगा
निर्माण के लिए हाथ से बनी खादी का उत्पादन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के एक समूह द्वारा पूरे देश में मात्र उत्तरी कर्नाटक के धारवाड़ जिले में बेंगलूर-पूना रोड पर स्थि 'गरग' गांव में किया जाता था। इसकी स्थापना 1954 में हुई थी। लेकिन, अब निर्माण ऑर्डिनेंस क्योरिंग फैक्ट्री शाहजहांपुर, खादी ग्रामोद्योग आयोग मुंबई और खादी ग्रामोद्योग आयोग दिल्ली में होने लगा है। 

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तिरंगा
26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया। इसके बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्ट्री में न केवल राष्‍ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के झंडा फहराने की अनुमति मिल गई। 
 

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तिरंगा
सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्‍वज संहिता, 2002 को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का सामान्‍य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्‍थानों के सदस्‍यों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। तीसरे भाग में केंद्रीय और राज्‍य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।

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तिरंगा
इस ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दें या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए।
 

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तिरंगा
इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता।

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झंडा
किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।
 
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तिरंगा
1968 में तिरंगा निर्माण के मानक तय किए गए। ये नियम अत्यंत कड़े हैं। केवल खादी या हाथ से काटे गए कपड़े का ही झंडा बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। कपड़ा बुनने से लेकर झंडा बनने तक की प्रक्रिया में कई बार इसकी टेस्टिंग की जाती है।
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