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RSS: 'संभल से सोमनाथ... ऐतिहासिक सत्य को जानने और न्याय तलाशने की लड़ाई', संघ से जुड़ी पत्रिका के लेख में दावा

Thu, 26 Dec 2024 12:59 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

हाल ही में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पुणे में नए मंदिर-मस्जिद विवादों के फिर से उभरने पर चिंता व्यक्त की थी। इसके बाद संघ से जुड़ी पत्रिका ऑर्गनाइजर में संभल से सोमनाथ तक: ऐतिहासिक सत्य को जानने और सभ्यतागत न्याय को तलाशने की लड़ाई शीर्षक से संपादकीय प्रकाशित किया गया है। इस लेख में कांग्रेस पर कई आरोप लगाए गए हैं। 
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संभल मस्जिद सर्वे मामला। - फोटो : PTI
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के 'मंदिर-मस्जिद' विवाद नहीं उठाने के बयान के बाद संघ से जुड़ी पत्रिका ऑर्गनाइजर में संभल से सोमनाथ तक: ऐतिहासिक सत्य को जानने और सभ्यतागत न्याय को तलाशने की लड़ाई शीर्षक से संपादकीय प्रकाशित किया गया है। इस लेख में कांग्रेस पर कई आरोप लगाए गए हैं। साथ ही मौजूदा विवादों को दूर करने पर जोर दिया गया। 

संपादकीय में लिखा गया है कि इन दिनों डॉ. बीआर आंबेडकर के अपमान को लेकर जारी शोरगुल के बीच ऐतिहासिक साक्ष्यों से बिल्कुल स्पष्ट है कि कांग्रेस ने संविधान मसौदा समिति के साथ कैसा व्यवहार किया। वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के संभल में हुए ताजा घटनाक्रम ने जनता के दिल को छू लिया है। उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर में श्री हरिहर मंदिर, जिसे जामा मस्जिद का रूप दिया गया, के सर्वेक्षण को लेकर दायर याचिका के बाद से शुरू हुए विवाद के बाद से लोगों और समुदायों के बीच सांविधानिक अधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हुई है। हमें इस बहस को छद्म धर्मनिरपेक्षता के चश्मे से हिंदू-मुस्लिम तक सीमित नहीं रखना चाहिए। बल्कि समाज के सभी वर्गों को शामिल करते हुए सच्चे इतिहास पर आधारित सभ्यतागत न्याय की खोज पर एक विवेकपूर्ण और समावेशी बहस करने की जरूरत है।  
 
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संभल मस्जिद सर्वे मामला। - फोटो : PTI
कांग्रेस ने चुनावी लाभ के लिए उठाया जातिगत पहचान का फायदा
लेख के अनुसार सोमनाथ से संभल और उससे आगे तक ऐतिहासिक सत्य को जानने की लड़ाई धार्मिक वर्चस्व के बारे में नहीं है। यह हिंदू लोकाचार के खिलाफ है। यह हमारी राष्ट्रीय पहचान और सभ्यतागत न्याय को तलाशने की लड़ाई है। भारत में धार्मिक पहचान की कहानी जाति के प्रश्न से बहुत अलग नहीं है। कांग्रेस ने जाति के सवाल को टालने की कोशिश की, सामाजिक न्याय के कार्यान्वयन में देरी की और चुनावी लाभ के लिए जातिगत पहचान का फायदा उठाया। इसी तरह धार्मिक पहचान की कहानी बहुत अलग नहीं है। कांग्रेस और कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने इस्लामी तर्ज पर भारत का दर्दनाक विभाजन किया। इसके बाद इतिहास की सच्चाई बताने, सभ्यतागत न्याय और सामंजस्यपूर्ण भविष्य के लिए वर्तमान को ठीक से रीसेट करने की बजाय आक्रमणकारियों के पापों को सफेद किया। 
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संभल मस्जिद सर्वे मामला। - फोटो : PTI
डॉ. आंबेडकर के दृष्टिकोण को अपनाने की जरूरत
लेख में कहा गया कि डॉ. आंबेडकर ने जाति आधारित भेदभाव के मूल कारण की तलाश की थी और इसके लिए सांविधानिक उपचार भी दिए थे। अब समय आ गया है कि सभ्यतागत न्याय की खोज की जाए। हमें धार्मिक कटुता और असामंजस्य को समाप्त करने के लिए इसकी जरूरत है। यह दृष्टिकोण इतिहास की सच्चाई को स्वीकार करने, भारतीय मुसलमानों को मूर्ति तोड़ने वालों और धार्मिक वर्चस्व के अपराधियों से अलग करने और सभ्यतागत न्याय की तलाश पर आधारित है। इससे शांति और सद्भाव की उम्मीद है। 

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संभल मस्जिद सर्वे मामला। - फोटो : PTI
कांग्रेस ने पेश की मुगल सम्राटों की गलत छवि
लेख में कहा गया कि न्याय तक पहुंच और सच्चाई जानने के अधिकार से सिर्फ इसलिए इनकार करना क्योंकि कुछ उपनिवेशवादी अभिजात वर्ग और छद्म बुद्धिजीवी घटिया धर्मनिरपेक्षता के प्रयोग को जारी रखना चाहते हैं, इससे कट्टरवाद और शत्रुता को बढ़ावा मिलेगा। लेख में आरोप लगाया गया कि कांग्रेस ने मुगल सम्राट बाबर और औरंगजेब जैसे कट्टर शासकों की बड़ी-से-बड़ी छवि पेश करके भारतीय मुसलमानों को यह गलत धारणा दी कि वे अंग्रेजों से पहले यहां के शासक थे। इसमें कहा गया कि भारत के मुसलमानों को यह समझना चाहिए कि वे भी इस्लामी आक्रमणों के शिकार हैं। उनके पूर्वज हिंदुओं के विभिन्न संप्रदायों से हैं और उन्हें मूर्तिभंजन की विचारधारा को अस्वीकार करना चाहिए।
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संभल मस्जिद सर्वे मामला। - फोटो : PTI
क्या बोले थे मोहन भागवत?
हाल ही में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पुणे में नए मंदिर-मस्जिद विवादों के फिर से उभरने पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था कि अयोध्या के राम मंदिर के निर्माण के बाद कुछ व्यक्तियों को यह विश्वास हो गया है कि वे ऐसे मुद्दों को उठाकर "हिंदुओं के नेता" बन सकते हैं। सहजीवन व्याख्यानमाला में भारत-विश्वगुरु विषय पर बोलते हुए भागवत ने एक समावेशी समाज की आवश्यकता की बात की। उन्होंने कहा कि दुनिया को यह दिखाना चाहिए कि भारत में विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ शांति से रह सकते हैं।

राम मंदिर के निर्माण के बारे में उन्होंने कहा कि यह सभी हिंदुओं की आस्था से जुड़ा मामला था। लेकिन अब कुछ लोग नए विवाद उठाकर समाज में तनाव फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, जो स्वीकार्य नहीं है। भागवत ने यह भी कहा कि ऐसे मुद्दे उठाना और समाज में विवाद फैलाना जारी नहीं रह सकता। हाल ही में मंदिरों के सर्वेक्षण के लिए मस्जिदों से जुड़े मामलों की मांग अदालतों में उठी है, लेकिन भागवत ने इस बारे में किसी का नाम नहीं लिया। 
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