डॉक्टर आर. गंगाखेड़कर
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नवजात वायरस को समझने में कभी गिरे, तो कभी जीते
कोरोना वायरस हमारे लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक नवजात विषाणु था। अभी भी हम लर्निंग प्रोसेस में हैं, लेकिन नवजात वायरस को समझने में कभी हम गिरे भी तो कभी जीत भी हासिल हुई। कोरोना वायरस के विषाणुओं को एक महीना ही हुआ था।
जो भी जानकारी थी, उसी पर पूरी दुनिया चल रही थी। तब हमने खुद की सोची-समझी रणनीति पर काम शुरू किया। मुझे वह दौर भी याद है जब देश एचआईवी संक्रमण से जूझ रहा था और अब कोरोना से। हालांकि एक सबसे बड़ा अंतर समय का है।
हमारी ताकत पहले से कई गुना बढ़ी है। संसाधन भी ज्यादा हैं। इसी की बदौलत हमारी लड़ाई शुरू हुई। हमारे लिए जहां संक्रमण को समझना जरूरी था, वहीं इसका इलाज और जांच भी। लोगों को संक्रमण से जागरूक करना था।
डॉक्टर होने के नाते मैं कह सकता हूं कि देश के हर डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ सहित सभी स्वास्थ्य किर्मयों ने बढ़-चढ़कर योगदान किया। क्या दिन और क्या रात? कोरोना वायरस की जांच को बढ़ाना जरूरी था, जिसमें हम सफल हुए।
यह सच है कि संक्रामक रोगों का सामना करने के लिए भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अधिकांश देशों की एक जैसी स्थिति है। हम बात करते हैं स्पेनिश फ्लू की, लेकिन वह दौर वर्षों पुराना है। तब से अब तक कई पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन अब जो हुआ, वह उस वक्त से कम भी नहीं। -डॉ. रमन आर गंगाखेड़कर, मुख्य महामारी विशेषज्ञ, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद
(डॉ. गंगाखेड़कर ने एमबीबीएस करने के बाद जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ पब्लिक हेल्थ की डिग्री हासिल की। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) में मुख्य महामारी विशेषज्ञ पद से मंगलवार को ही सेवानिवृत्त हुए हैं। अब तक 130 से भी ज्यादा रिसर्च इनकी निगरानी में हो चुकी हैं।)