भाजपा और शिवसेना ने आखिरकार एक बार फिर से लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ लड़ने का फैसला लिया है। सोमवार को दोनों पार्टियों के बीच सीटों का बंटवारा तय हुआ और इसी के साथ दोनों में चली आ रही रार खत्म हो गई। भाजपा 25 सीटों पर तो शिवसेना 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। तीन दशक पहले दोनों पार्टियां हिंदुत्व के मुद्दे पर एक हुई थी।
1989 से लेकर दोनों पार्टियों ने कई लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ लड़े, लेकिन पिछले कुछ सालों में दोनों के रिश्ते में दरार आई और पिछले साल तो शिवसेना ने भाजपा से अलग होकर अपने दम पर लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। सोमवार को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने पुरानी रार खत्म करते हुए एक होने की घोषणा की।
विरोधी पार्टियां कहती रही है कि महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना दोनों का गठबंधन मजबूरी का नतीजा है। देखा जाए तो एक तरह से सही ही है, क्योंकि कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखना और हिंदुत्व की राजनीति को जिंदा रखने के लिए यह गठबंधन दोनों पार्टियों के लिए जरूरी था। ऐसे में दोनों पार्टियों ने आपसी मतभेद भुलाते हुए फिर से गठबंधन कर लिया।
आइए, जानते हैं पिछले 30 सालों में किन खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरी दोनों पार्टियां
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Relation of BJP and Shivsena
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भाजपा और शिवसेना का गठबंधन 1989 में शुरू हुआ। तीन दशक पुराने गठबंधन का नेतृत्व शिवसेना ने किया। 1995 में शिवसेना-भाजपा के गठबंधन वाली सरकार जब पहली बार महाराष्ट्र में आई तो शिवसेना के मनोहर जोशी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया।
मनोहर जोशी ने अपने पांच साल के कार्यकाल में इस्तीफा दे दिया जिसके बाद नारायण राणे को आठ महीने के लिए राज्य की कुर्सी की जिम्मेदारी सौंपी गई। उसी साल हुए चुनाव में भाजपा ने बीएमसी की 28 सीटों पर कब्जा जमाया जबकि साल 2017 के बीएमसी चुनाव में भाजपा को शानदार 82 सीटें मिली जो शिवसेना से मात्र 2 सीट कम थी।
1989 में गठबंधन के बाद साल 1995 में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव में शिवसेना-भाजपा गठबंधन को बहुमत मिला। शिवसेना की ओर से पहले मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने और फिर नारायण राणे, जबकि भाजपा की ओर से गोपीनाथ मुंडे को राज्य के गृह मंत्री बनाया। शिवसेना-भाजपा गठबंधन की सरकार 1999 तक चली।
साल 1999 में महाराष्ट्र में फिर कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने शिवसेना-भाजपा गठबंधन को सत्ता से बेदखल किया। साल 2004 और 2009 में शिवसेना-भाजपा ने साथ मिलकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ा। सभी चुनाव में इस गठबंधन को करारी हार झेलनी पड़ी।
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Atal-Adwani-Balasaheb-Modi
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साल 2004 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना करीब-करीब बराबर की हैसियत रखते थे। भाजपा को महाराष्ट्र में 54 सीटें मिली जबकि शिवसेना को 62 सीटें, लेकिन 2014 में मोदी लहर में भाजपा ने शिवसेना को मात देते हुए अपने सीनियर होने की धाक दिखाई।
भाजपा ने यहां की 288 सदस्यीय विधानसभा में से 122 सीटें जीत ली जबकि शिवसेना को 63 सीटें मिली। अब ऐसे में शिवसेना को भाजपा की मौजूदगी अपने अस्तित्व के खतरे के रूप में भी नजर आने लगी।
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Balasaheb, Uddhav Thackarey , Narendra modi
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साल 2014 में हुए आम चुनाव में भी बीजेपी ने शिवसेना के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा। भाजपा को 23 सीटें मिली थी, वहीं शिवसेना 18 सीटों पर जीती थी। भाजपा के इसी शानदार प्रदर्शन के बाद दोनों पार्टियों के रिश्ते में खटास आई। तब, शिवसेना आरोप लगाती थी कि भाजपा दादागिरी करना चाहती है।
उसी साल हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भाजपा गठबंधन करने के लिए 288 में से 144 सीटें चाहती थीं, मगर शिवसेना 119 से अधिक सीटें देने के लिए तैयार नहीं थी। दोनों पार्टियां अपने दम पर चुनाव में उतरी। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी, लेकिन जादुई आंकड़े से दूर ही थी।
ऐसे में शरद पवार की एनसीपी की मदद से देवेंद्र फडणवीस सूबे के मुखिया बने। शिवसेना कुछ दिनों तक विपक्ष में बैठी, लेकिन कुछ ही महीने बाद शिवसेना महाराष्ट्र की सत्ता में शामिल हुई। हालांकि दोनों के रिश्ते में खटास जारी रही।
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Narendra modi, Amit shah and Uddhav Thakre
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साल 2017 में कुछ और महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए, जब मराठा नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने 21 सितंबर को 2017 को कांग्रेस छोड़ दी। इसके बाद कयास लगाए जाने लगे कि वह भाजपा ज्वाइन कर सकते हैं। इसके बाद शिवसेना ने संकेत दिए कि वह सरकार से अलग हो सकते हैं।
नारायण राणे शिवसेना की आंखों में तब से खटकने लगे जब वह पार्टी के अंदर ठाकरे के बढ़ते कद का विरोध करते देखे गए। साल 2005 में शिवसेना ने नारायण राणे को उस वक्त पार्टी से निलंबित कर दिया था।
इस मामले से अलग महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस की नीतियों और फैसलों को लेकर भी शिवसेना का मतभेद रहा। किसानों की ऋण माफी और लंबित पड़े विकास कार्यों को लेकर शिवसेना को कई बार सरकार पर हमलावर होते देखा गया।
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Narendra modi and Uddhav Thakre
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साल 2018 में हुए बीएमसी चुनाव में भाजपा ने सत्ताधारी शिवसेना के खिलाफ मोर्चा खोला। दोनों एक दूसरे के खिलाफ मैदान में उतरे। चुनाव के बाद एक बार फिर दोनों पार्टियां साथ में आ गईं, लेकिन भाजपा और शिवसेना पहले जैसे दोस्त नहीं रहे।
बीते एक साल में देखें तो शिवसेना केंद्र की मोदी सरकार पर हमलावर रही हैं। अपने मुखपत्र सामना में लेखों के जरिए कई बार कड़े शब्दों में भाजपा सरकार की आलोचना करती रही है। चाहे बात नोटबंदी की हो या जीएसटी की, शिवसेना ने मोदी को निशाने पर लेते हुए इसे गलत कदम करार दिया था।
Amit shahm uddhav thakre, devendra fadanvis
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23 जनवरी 2018 को संस्थापक बाला साहेब ठाकरे की जयंती पर शिवसेना ने भाजपा से औपचारिक तौर पर रिश्ता खत्म होने का एलान कर दिया था। तब लोगों का कहना था कि बालासाहेब ठाकरे, प्रमोद महाजन, गोपीनाथ मुंडे जैसे नेता जिंदा होते तो यह गठबंधन कभी नहीं टूटता।
शिवसेना ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी ने बड़ा फैसला लेते हुए 2019 का लोकसभा और विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने का फैसला लिया था, लेकिन एक साल के भीतर दोनों पार्टियां फिर से गठबंधन में बंध गई।